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कोयला, पेट्रोलियम एवं पेट्रोरसायन
Chhattisgarh · Class 9 · 🔬 Science · Chapter 16

कोयला, पेट्रोलियम एवं पेट्रोरसायन

जीवाश्म ईंधनकोयले के प्रकार (पीट, लिग्नाइट, बिटुमिनस, ऐन्थ्रासाइट)पेट्रोलियम और प्रभाजी आसवनपेट्रोरसायनप्लास्टिक का पुनः चक्रणईंधन का दहन

यह अध्याय कोयला, पेट्रोलियम और पेट्रोरसायन जैसे महत्वपूर्ण जीवाश्म ईंधनों की उत्पत्ति, उनके विभिन्न प्रकारों और उपयोगों की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। छात्र कोयले के निर्माण की प्रक्रिया, पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन और पेट्रोरसायन के दैनिक जीवन में महत्व को समझेंगे। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों और उनके संरक्षण की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है।

ऊर्जा स्रोत और जीवाश्म ईंधन की परिभाषा

हमें दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है।

  • ऊर्जा के स्रोत:
  • ईंधन: लकड़ी, मिट्टी का तेल, एल.पी.जी., कोयला, पेट्रोल, डीजल, सी.एन.जी. आदि।
  • विद्युत: कारखानों और घरों में उपयोग।
  • जीवाश्म ईंधन:
  • परिभाषा: करोड़ों वर्षों तक पृथ्वी की सतह के नीचे दबे हुए मृत जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के अवशेषों के रूपांतरण से बने ईंधन को जीवाश्म ईंधन कहते हैं।
  • उदाहरण: कोयला और पेट्रोलियम।
  • निर्माण प्रक्रिया: उच्च ताप, उच्च दाब और ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ये अवशेष जीवाश्म ईंधन में परिवर्तित होते हैं।
  • महत्व: ये ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं और आधुनिक औद्योगिक समाज की रीढ़ हैं।
📖परिभाषा

जीवाश्म ईंधन: वे ईंधन जो लाखों वर्षों तक पृथ्वी के भीतर दबे हुए मृत जीवों और वनस्पतियों के अवशेषों से बनते हैं।

महत्त्वपूर्ण

जीवाश्म ईंधन के निर्माण के लिए उच्च ताप, उच्च दाब और ऑक्सीजन की अनुपस्थिति आवश्यक है।

कोयले की उत्पत्ति की प्रक्रिया

  • काल: लगभग 36 से 28 करोड़ वर्ष पूर्व कार्बोनिफेरस काल में।
  • स्रोत: वनस्पतियों (पेड़-पौधों) के मृत शरीर।
  • प्रक्रिया:
  1. करोड़ों वर्ष पूर्व विशाल वृक्ष और पौधे प्राकृतिक आपदाओं (जैसे बाढ़, भूकंप) के कारण पृथ्वी की सतह के नीचे दब गए।
  2. धीरे-धीरे इन पर मिट्टी और रेत की परतें जमती गईं।
  3. भू-गर्भ में गहराई बढ़ने के साथ उच्च ताप और उच्च दाब का अनुभव हुआ।
  4. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में, इन दबी हुई वनस्पतियों का धीरे-धीरे विघटन (decomposition) हुआ।
  5. यह विघटन प्रक्रिया अंततः उन्हें कोयले में परिवर्तित कर देती है। इस प्रक्रिया को कार्बनीकरण (Carbonisation) कहते हैं।
  • प्रमाण: कोयले की परतों में पत्तियों और पौधों के नाजुक अंगों की छापें (जीवाश्म) मिलना इस बात का प्रमाण है कि कोयला वनस्पतियों से बना है।
महत्त्वपूर्ण

कोयले के निर्माण की धीमी प्रक्रिया को कार्बनीकरण कहते हैं।

पेट्रोलियम की उत्पत्ति की प्रक्रिया

  • स्रोत: समुद्र में रहने वाले सूक्ष्म जीव (प्लवक)।
  • प्रक्रिया:
  1. लाखों वर्ष पूर्व जब ये समुद्री जीव मृत हुए, तो उनके शरीर समुद्र के पेंदे (तल) में जमा हो गए।
  2. इन मृत जीवों के ऊपर रेत और मिट्टी की कई परतें जमा हो गईं।
  3. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में, उच्च ताप और दाब के कारण, ये मृत जीव धीरे-धीरे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में परिवर्तित हो गए।
  • नामकरण: पेट्रोलियम शब्द दो लैटिन शब्दों से बना है:
  • पेट्रा (Petra): चट्टान
  • ओलियम (Oleum): तेल
  • अतः, पेट्रोलियम का अर्थ है चट्टान का तेल
  • विशेषताएँ: तैलीय, गहरे रंग का और एक विशिष्ट गंध वाला द्रव।
महत्त्वपूर्ण

पेट्रोलियम मुख्य रूप से समुद्री जीवों (प्लवक) के अवशेषों से बनता है।

कोयले के विभिन्न प्रकार और निर्माण प्रक्रिया

कोयला भू-गर्भ में दबी वनस्पतियों के विघटन से बनता है। यह प्रक्रिया चरणों में होती है, जिससे विभिन्न प्रकार के कोयले बनते हैं। कार्बन की प्रतिशत मात्रा के आधार पर कोयले को वर्गीकृत किया जाता है।

  • कोयले के प्रकार (निर्माण के क्रम में):
  1. पीट (Peat):
  • विशेषता: कोयला बनने की पहली अवस्था
  • कार्बन मात्रा: लगभग 25-35%
  • उपयोग: अधिकतर ईंधन के रूप में।
  1. लिग्नाइट (Lignite):
  • विशेषता: भूरा कोयला के नाम से भी जाना जाता है। पीट से अधिक संपीड़ित।
  • कार्बन मात्रा: लगभग 35-45%
  • उपयोग: विद्युत उत्पादन में।
  1. बिटुमिनस (Bituminous):
  • विशेषता: प्रकृति में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला और सर्वाधिक उपयोग में आने वाला कोयला।
  • कार्बन मात्रा: लगभग 45-85%
  • उपयोग: तापीय और सीमेंट संयंत्रों, पेपर कारखानों, ऑटोमोबाइल, वस्त्र उद्योगों, इस्पात संयंत्रों में कोक के रूप में।
  • अन्य: इसमें सल्फर की मात्रा सर्वाधिक पाई जाती है।
  1. ऐन्थ्रासाइट (Anthracite):
  • विशेषता: कठोर कोयला, उत्तम श्रेणी का कोयला। कोयले का सबसे परिष्कृत रूप।
  • कार्बन मात्रा: 85% से अधिक
  • उपयोग: घरेलू ईंधन के रूप में (कम धुआँ और राख)।
  • लाभ: अधिक कार्बन प्रतिशत के कारण अधिक समय तक जलता है।
  • कार्बन प्रतिशत का महत्व: कोयले में कार्बन की प्रतिशत मात्रा जितनी अधिक होती है, उसकी गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होती है और वह उतनी ही अधिक ऊष्मा उत्पन्न करता है।
  • कोयले की संरचना: कोयले में मुख्यतः कार्बन होता है, लेकिन इसमें हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर और आर्द्रता (नमी) भी पाई जाती है।
💡सुझाव

कोयले के प्रकारों को कार्बन प्रतिशत के बढ़ते क्रम में याद रखें: पीट < लिग्नाइट < बिटुमिनस < ऐन्थ्रासाइट

महत्त्वपूर्ण

ऐन्थ्रासाइट कोयले में कार्बन की मात्रा सर्वाधिक (85% से अधिक) होती है, जबकि पीट में सबसे कम (25-35%)।

कोयले के ग्रेड और ऊष्मीय क्षमता

कोयले की गुणवत्ता और व्यापारिक उपयोगिता का निर्धारण उसकी ऊष्मीय क्षमता के आधार पर किया जाता है, जिसे 'ग्रेड' में मापा जाता है।

  • ग्रेडिंग का आधार: सकल कैलोरी मान (Gross Calorific Value - GCV)
  • इकाई: किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम (kcal/kg)।
  • ग्रेड का महत्व: कोयले का उपयोग उसकी ग्रेडिंग के अनुसार किया जाता है। उच्च ग्रेड का कोयला अधिक ऊष्मा देता है और कम अशुद्धियाँ छोड़ता है।
  • कोयले के ग्रेड (उदाहरण):

| ग्रेड | सकल कैलोरी मान (GCV) (kcal/kg) | ग्रेड | सकल कैलोरी मान (GCV) (kcal/kg) | |---|---|---|---| | G-1 | 7000 से ऊपर | G-10 | 4301 से 4600 तक | | G-2 | 6701 से 7000 तक | G-11 | 4001 से 4300 तक | | G-3 | 6401 से 6700 तक | G-12 | 3701 से 4000 तक | | G-4 | 6101 से 6400 तक | G-13 | 3401 से 3700 तक | | G-5 | 5801 से 6100 तक | G-14 | 3101 से 3400 तक | | G-6 | 5501 से 5800 तक | G-15 | 2801 से 3100 तक | | G-7 | 5201 से 5500 तक | G-16 | 2501 से 2800 तक | | G-8 | 4901 से 5200 तक | G-17 | 2201 से 2500 तक | | G-9 | 4601 से 4900 तक | | |

  • निष्कर्ष: GCV जितना अधिक होगा, कोयले का ग्रेड उतना ही बेहतर होगा और वह उतना ही अधिक ऊर्जावान होगा।
📖परिभाषा

सकल कैलोरी मान (GCV): किसी ईंधन की एक इकाई मात्रा के पूर्ण दहन से उत्पन्न कुल ऊष्मा की मात्रा।

छत्तीसगढ़ में कोयला भंडार और उपयोग

भारत में कोयले के भंडारण और उत्खनन में छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण स्थान है।

  • प्रमुख कोयला क्षेत्र:
  • कोरबा
  • रायगढ़
  • सरगुजा
  • कोरिया
  • खदानों के प्रकार: भूमिगत एवं खुली खदानें।
  • कोरबा जिले की खदानें और कोयले का ग्रेड:
  • रजगामार, बगदेवा, सुराकछार, बाँकीमोंगरा: G-4 एवं G-5 ग्रेड का कोयला।
  • गेवरा, दिपका, कुसमुंडा: G-11 ग्रेड का कोयला।
  • छत्तीसगढ़ में कोयले के प्रमुख उपयोग:
  • विद्युत उत्पादन: एन.टी.पी.सी. (नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन) और सी.एस.ई.बी. (छत्तीसगढ़ स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड) के तापीय संयंत्रों में।
  • औद्योगिक उपयोग:
  • ऐलुमिनियम संयंत्र (बालको)
  • इस्पात संयंत्र (भिलाई)
  • तापीय एवं इस्पात संयंत्र (रायगढ़ व रायपुर के सिलतरा में स्थित औद्योगिक संयंत्रों में)।
  • अन्य नाम: कोयले को उसके विभिन्न उपयोगों और महत्व के कारण काला हीरा भी कहते हैं।
महत्त्वपूर्ण

छत्तीसगढ़ में कोयले के प्रमुख उत्पादक जिले कोरबा, रायगढ़, सरगुजा और कोरिया हैं।

याद रखें

कोयले को काला हीरा कहा जाता है क्योंकि यह ऊर्जा और उद्योगों के लिए अत्यंत मूल्यवान है।

पेट्रोलियम की प्रकृति और प्रभाजी आसवन

पेट्रोलियम एक जटिल मिश्रण है, जिसे उसके घटकों में अलग करने के लिए विशेष विधि का उपयोग किया जाता है।

  • पेट्रोलियम की प्रकृति:
  • यह कई हाइड्रोकार्बन का मिश्रण होता है।
  • इसका कोई निश्चित रासायनिक सूत्र नहीं होता है।
  • इसके घटकों के क्वथनांक में बहुत कम अंतर होता है।
  • प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation):
  • परिभाषा: दो या दो से अधिक मिश्रणीय द्रवों को, जिनके क्वथनांक के मध्य बहुत कम अंतर होता है, पृथक करने की विधि को प्रभाजी आसवन कहते हैं।
  • आवश्यकता: पेट्रोलियम के विभिन्न घटकों (जैसे पेट्रोल, डीजल, केरोसिन) को अलग करने के लिए साधारण आसवन विधि पर्याप्त नहीं होती क्योंकि उनके क्वथनांक बहुत करीब होते हैं।
  • प्रक्रिया:
  1. कच्चे तेल को गर्म करना: सर्वप्रथम कच्चे तेल को भट्टी में उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे यह वाष्प में बदल जाता है।
  2. प्रभाजक स्तंभ में प्रवेश: गर्म वाष्पों को प्रभाजक स्तंभ के निचले भाग में पहुँचाया जाता है।
  3. ऊपर की ओर उठना: वाष्पों का मिश्रण स्तंभ में ऊपर की ओर उठता है।
  4. संघनन और पृथक्करण: स्तंभ में ऊपर की ओर तापमान घटता जाता है। विभिन्न हाइड्रोकार्बन अपने-अपने क्वथनांक के अनुसार अलग-अलग ऊँचाइयों पर संघनित होकर द्रव रूप में एकत्रित होते हैं।
  • निम्न क्वथनांक वाले यौगिक स्तंभ के ऊपरी भाग में संघनित होते हैं (जैसे पेट्रोलियम गैस)।
  • उच्च क्वथनांक वाले यौगिक स्तंभ के निचले भाग में संघनित होते हैं (जैसे डीजल, ईंधन तेल, अवशेष)।
  1. लगातार प्रक्रिया: आसवन की क्रिया लगातार चलती रहती है, क्योंकि गर्म वाष्प के कारण संघनित द्रव पुनः वाष्प में बदल सकता है।
  • प्रभाजी आसवन से प्राप्त उत्पाद (क्वथनांक के बढ़ते क्रम में):
  1. पेट्रोलियम गैस (ब्यूटेन, प्रोपेन): सबसे ऊपर, निम्न क्वथनांक (लगभग 65°C तक)।
  • उपयोग: एलपीजी ईंधन, टायर उद्योग।
  1. पेट्रोल: (लगभग 65°C - 170°C)।
  • उपयोग: मोटर, कार में ईंधन, शुष्क धुलाई।
  1. किरोसिन (मिट्टी का तेल): (लगभग 170°C - 250°C)।
  • उपयोग: घरेलू ईंधन, जेट वायुयान।
  1. गैस तेल (डीजल): (लगभग 250°C - 340°C)।
  • उपयोग: भारी वाहन, रेलगाड़ी के इंजन, जनरेटर में ईंधन।
  1. स्नेहक तेल और मोम: (लगभग 340°C - 500°C)।
  • उपयोग: मशीनों में स्नेहक तेल, मोमबत्ती, वैसलीन, ग्रीस, जूता पॉलिश।
  1. ईंधन तेल: (लगभग 500°C - 600°C)।
  • उपयोग: जहाजों में, भट्टियों तथा बॉयलरों में ईंधन।
  1. अवशेष (टार/एस्फाल्ट): सबसे नीचे, उच्च क्वथनांक।
  • उपयोग: एस्फाल्ट बनाने में (सड़क निर्माण)।
📖परिभाषा

प्रभाजी आसवन: वह प्रक्रिया जिसमें विभिन्न क्वथनांक वाले द्रवों के मिश्रण को उनके क्वथनांक के अंतर के आधार पर अलग किया जाता है।

💡सुझाव

प्रभाजक स्तंभ में सबसे ऊपर पेट्रोलियम गैस और सबसे नीचे टार (अवशेष) प्राप्त होता है। यह क्वथनांक के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

पेट्रोरसायन की परिभाषा और उपयोग

पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन से प्राप्त होने वाले विभिन्न महत्वपूर्ण पदार्थों को पेट्रोरसायन कहते हैं।

  • परिभाषा: पेट्रोलियम से उत्पन्न होने वाले रसायन पेट्रोरसायन कहलाते हैं।
  • ऐतिहासिक उपयोग:
  • प्राचीन काल में: खाड़ी क्षेत्रों में गड्ढों से स्वतः निकलने वाले पेट्रोलियम के चिपचिपे अवशेष का उपयोग नावों को जलरोधी बनाने और मकानों में ईंट-पत्थर जोड़ने के लिए किया जाता था।
  • 200 वर्ष पूर्व: पेट्रोलियम से मिट्टी का तेल (केरोसिन) पृथक किया गया, जिसका उपयोग ईंधन और प्रकाश के लिए होने लगा।
  • 19वीं शताब्दी: पेट्रोलियम से प्राप्त जैली का उपयोग जख्मों और जलने के उपचार में, और बाद में सौंदर्य प्रसाधन (वैसलीन) में शुरू हुआ।
  • आधुनिक उपयोग: पेट्रोरसायन का उपयोग विभिन्न उद्योगों में होता है, जिससे आधुनिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं।
  • अपमार्जक (Detergents): सफाई उत्पादों में।
  • रेशे (Fibers): पॉलिएस्टर, नाइलॉन, ऐक्रिलिक जैसे मानव निर्मित रेशों के निर्माण में।
  • प्लास्टिक: पॉलिथीन और अन्य प्रकार के प्लास्टिक के औद्योगिक निर्माण में।
  • महत्व: आज कई उद्योग पेट्रोरसायन पर आधारित हैं, और प्लास्टिक उत्पादों ने देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
📖परिभाषा

पेट्रोरसायन: पेट्रोलियम से प्राप्त होने वाले रासायनिक पदार्थ, जो विभिन्न उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग होते हैं।

महत्त्वपूर्ण

पेट्रोरसायन आधुनिक जीवन के कई उत्पादों (जैसे प्लास्टिक, रेशे, अपमार्जक) के आधार हैं।

प्लास्टिक का पुनः चक्रण और पहचान कोड

प्लास्टिक एक उपयोगी सामग्री है, लेकिन इसका अपघटन न होने के कारण इसके निपटान की समस्या गंभीर है। पुनः चक्रण इसका एक महत्वपूर्ण समाधान है।

  • पुनः चक्रण (Recycling):
  • परिभाषा: अनुपयोगी प्लास्टिक की वस्तुओं को उपयोगी उत्पादों में बदलने की प्रक्रिया को प्लास्टिक का पुनः चक्रण कहते हैं।
  • आवश्यकता: प्लास्टिक मिट्टी में अपघटित नहीं होता, जिससे पर्यावरण प्रदूषण होता है। पुनः चक्रण से कचरा कम होता है और संसाधनों का संरक्षण होता है।
  • प्लास्टिक पहचान कोड:
  • उद्देश्य: पुनः चक्रण प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए विभिन्न प्लास्टिक उत्पादों को पहचान कोड दिए गए हैं।
  • संस्था: सन् 1988 में प्लास्टिक उद्योग संस्था द्वारा ये कोड दिए गए।
  • प्रतीक: पहचान कोड में संख्या को तीन तीरों के प्रतीक (पुनः चक्रण प्रतीक) के मध्य रखा जाता है।
  • वर्गीकरण: प्लास्टिक उत्पादों को उनके पहचान कोड के अनुसार सात समूहों में बाँटा गया है।
  • प्रक्रिया: समान कोड वाले प्लास्टिक का पुनः चक्रण एक साथ किया जाता है।
  • कुछ सामान्य प्लास्टिक पहचान कोड और उनके उपयोग:

| पहचान कोड | वस्तुओं के नाम | |---|---| | 1 | पानी बोतल, शीतल पेय बोतल, जूस हेतु बोतल | | 2 | पानी का जार, शैम्पू तथा क्रीम हेतु बोतल | | 3 | पीवीसी पाइप, बच्चों के खिलौने | | 4 | पाइप, जैम का बोतल | | 5 | जूस हेतु बोतल | | 6 | (पॉलीस्टाइरीन - कप, प्लेट) | | 7 | (अन्य प्लास्टिक - सीडी, डीवीडी, कुछ खाद्य कंटेनर) |

  • महत्व: पुनः चक्रण से प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन होता है, नए प्लास्टिक के उत्पादन में कमी आती है और ऊर्जा की बचत होती है।
याद रखें

प्लास्टिक के पुनः चक्रण के लिए पहचान कोड का उपयोग किया जाता है, जो तीन तीरों के प्रतीक के भीतर एक संख्या होती है।

ईंधन के दहन की प्रक्रिया और उसके उत्पाद

दहन एक रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें कोई पदार्थ ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलकर ऊष्मा और प्रकाश उत्पन्न करता है।

  • दहन (Combustion):
  • परिभाषा: किसी वस्तु का ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलना दहन कहलाता है।
  • प्रकृति: यह एक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है, क्योंकि इसमें ऊष्मा उत्पन्न होती है।
  • कोयले के दहन के उत्पाद:
  1. पूर्ण दहन (पर्याप्त ऑक्सीजन की उपस्थिति में):
  • कोयला (कार्बन) ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड और ऊष्मा उत्पन्न करता है।
  • अभिक्रिया: \(C + O_2 \rightarrow CO_2 + \text{ऊष्मा}\)
  • उत्पाद: कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) और ऊष्मा।
  1. अपूर्ण दहन (आंशिक ऑक्सीजन की उपस्थिति में):
  • कोयला (कार्बन) ऑक्सीजन की आंशिक मात्रा में अभिक्रिया करके कार्बन मोनोऑक्साइड और ऊष्मा उत्पन्न करता है।
  • अभिक्रिया: \(C + \frac{1}{2}O_2 \rightarrow CO + \text{ऊष्मा}\)
  • उत्पाद: कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)) और ऊष्मा।
  • राख (Ash): कोयले के दहन के बाद बचे अवशेष को राख कहते हैं।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: दहन से उत्पन्न \(CO_2\), \(CO\) और राख की अधिक मात्रा पर्यावरण को प्रदूषित करती है।
📖परिभाषा

दहन: वह रासायनिक प्रक्रिया जिसमें कोई पदार्थ ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके ऊष्मा और प्रकाश उत्पन्न करता है।

महत्त्वपूर्ण

पर्याप्त ऑक्सीजन में कोयले का दहन \(CO_2\) उत्पन्न करता है, जबकि अपर्याप्त ऑक्सीजन में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) उत्पन्न होती है।

जीवाश्म ईंधन के बढ़ते उपयोग का पर्यावरण पर प्रभाव

जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक दहन से पर्यावरण पर कई गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।

  • कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) और पौधाघर प्रभाव (Greenhouse Effect):
  • उत्पत्ति: ईंधन के दहन से बड़ी मात्रा में \(CO_2\) उत्पन्न होती है।
  • प्रभाव: \(CO_2\) एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है। यह वायुमंडल में ऊष्मा को रोककर पौधाघर प्रभाव उत्पन्न करती है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है। इसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।
  • परिणाम: जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र के स्तर में वृद्धि, चरम मौसमी घटनाएँ।
  • कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)):
  • उत्पत्ति: ईंधन के अपूर्ण दहन से।
  • प्रभाव: यह एक विषैली गैस है। यह रक्त में पाए जाने वाले हीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक तीव्रता से जुड़ती है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
  • परिणाम: सिरदर्द, चक्कर आना, बेहोशी और अत्यधिक मात्रा में मृत्यु तक हो सकती है।
  • उड़न राख (Fly Ash):
  • उत्पत्ति: तापीय संयंत्रों में कोयले के दहन से उत्पन्न बारीक राख।
  • प्रभाव: यह हवा में उड़कर आसपास के क्षेत्रों को प्रदूषित करती है। इसके कणों को साँस लेने से फेफड़ों में संक्रमण होता है और सिलिकोसिस जैसी बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे फेफड़ों को गंभीर क्षति पहुँचती है।
  • अम्ल वर्षा (Acid Rain):
  • उत्पत्ति: ईंधन में पाए जाने वाले नाइट्रोजन और सल्फर दहन के पश्चात् उनके ऑक्साइड (जैसे \(NO_x\) और \(SO_x\)) में बदल जाते हैं।
  • प्रभाव: ये ऑक्साइड वर्षा के जल में घुलकर नाइट्रिक अम्ल (\(HNO_3\)) और सल्फ्यूरिक अम्ल (\(H_2SO_4\)) बनाते हैं, जिससे अम्ल वर्षा होती है।
  • परिणाम: इमारतों (विशेषकर संगमरमर), फसलों, मिट्टी और जलीय जीवन को नुकसान।
  • निष्कर्ष: जीवाश्म ईंधन का अनियंत्रित उपयोग न केवल वायु प्रदूषण बढ़ाता है, बल्कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।
🚧ग़लत धारणा

कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) और कार्बन मोनोऑक्साइड (\(CO\)) के प्रभावों को भ्रमित न करें। \(CO_2\) मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग का कारण है, जबकि \(CO\) एक अत्यधिक विषैली गैस है।

महत्त्वपूर्ण

अम्ल वर्षा का मुख्य कारण नाइट्रोजन और सल्फर के ऑक्साइड हैं जो ईंधन के दहन से उत्पन्न होते हैं।

जीवाश्म ईंधन का संरक्षण

जीवाश्म ईंधन के सीमित भंडार और उनके पर्यावरणीय प्रभावों को देखते हुए उनका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

  • संरक्षण की आवश्यकता:
  • जीवाश्म ईंधन बनने में करोड़ों वर्ष लगते हैं, जबकि इनके ज्ञात भंडार कुछ सौ वर्षों में समाप्त हो सकते हैं।
  • इनके दहन से पर्यावरण पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हैं।
  • भावी पीढ़ी के लिए ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • संरक्षण के उपाय:
  1. जन जागरूकता: समुदाय को जीवाश्म ईंधनों के दुरुपयोग को रोकने के उपायों की जानकारी देना।
  2. वैज्ञानिक खनन: कोयला खनन हेतु नए वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करना ताकि कोयले की संपूर्ण मात्रा प्राप्त हो सके और अनावश्यक हानि न हो।
  3. वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग:
  • वाहनों में संपीडित प्राकृतिक गैस (CNG) के उपयोग को प्राथमिकता देना।
  • लाभ: CNG में नाइट्रोजन व सल्फर नहीं पाया जाता, जिससे वायु प्रदूषण कम होता है।
  1. प्लास्टिक का सीमित उपयोग: प्लास्टिक उत्पादों का उपयोग कम करना और उनके पुनः चक्रण को बढ़ावा देना।
  2. वाहनों में ईंधन की बचत:
  • पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान समिति (PCRA) की सलाह:
  • गाड़ी मध्यम और एक समान गति से चलाइए।
  • यातायात सिग्नल पर या प्रतीक्षा करते समय गाड़ी का इंजन बंद कर दीजिए।
  • टायरों का दाब सही रखिए।
  • गाड़ी का नियमित रख-रखाव सुनिश्चित कीजिए।
  1. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत आदि का अधिक उपयोग करना।
💡सुझाव

जीवाश्म ईंधन के संरक्षण के उपाय बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं। PCRA की सलाह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

याद रखें

CNG को एक स्वच्छ ईंधन माना जाता है क्योंकि इसमें नाइट्रोजन और सल्फर नहीं होते, जो अम्ल वर्षा का कारण बनते हैं।

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