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ध्वनि
Chhattisgarh · Class 9 · 🔬 Science · Chapter 14

ध्वनि

ध्वनि का उत्पादनध्वनि का संचरणअनुदैर्ध्य तरंगेंतरंगदैर्ध्यआवृत्तिआयाम

अध्याय 'ध्वनि' हमें दैनिक जीवन में सुनाई देने वाली विभिन्न ध्वनियों से परिचित कराता है और बताता है कि ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है, यह हमारे कानों तक कैसे पहुँचती है। यह ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता, ध्वनि तरंगों के प्रकार (अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ), और तरंगों के अभिलक्षणों जैसे तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति, आयाम और वेग की विस्तृत व्याख्या करता है। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय मानव श्रव्यता परास, अवश्रव्य और पराश्रव्य ध्वनियों के बारे में जानकारी देता है, और चिकित्सा तथा औद्योगिक क्षेत्रों में पराश्रव्य ध्वनि के महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों जैसे अल्ट्रासोनोग्राफी और सोनार पर प्रकाश डालता है। यह छात्रों को ध्वनि के वैज्ञानिक सिद्धांतों को समझने में मदद करता है।

ध्वनि की उत्पत्ति

ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है जो हमारे कानों में सुनने की संवेदना उत्पन्न करती है।

  • उत्पत्ति का मूल कारण: ध्वनि हमेशा कंपन करती हुई वस्तुओं से उत्पन्न होती है।
  • उदाहरण:
  • स्वरित्र द्विभुज की भुजाओं का कंपन।
  • सितार या गिटार के तार का कंपन।
  • मनुष्य में वाक तंतुओं (vocal cords) का कंपन।
  • ढोल या तबले की झिल्ली का कंपन।
  • कंपन और ध्वनि की प्रकृति:
  • जब कोई वस्तु कंपन करती है, तो वह अपने आसपास के माध्यम (जैसे वायु) के कणों को विस्थापित करती है।
  • यह विस्थापन माध्यम में दाब परिवर्तन उत्पन्न करता है, जिससे ध्वनि तरंगें बनती हैं।
  • प्रत्यास्थता का प्रभाव:
  • वस्तु की प्रत्यास्थता ध्वनि की प्रकृति को प्रभावित करती है।
  • प्रत्यास्थता वह गुण है जिसके कारण कोई पदार्थ अपनी आकृति या आकार में परिवर्तन का विरोध करता है और बल हटाने पर अपनी मूल स्थिति में वापस आने का प्रयास करता है।
  • उच्च प्रत्यास्थता: अधिक प्रत्यास्थ पदार्थ (जैसे धातु) तेजी से अपनी मूल स्थिति में आते हैं, जिससे वे तीव्र गति से कंपन करते हैं और विशिष्ट ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं।
  • कम प्रत्यास्थता: कम प्रत्यास्थ पदार्थ (जैसे रबर) धीरे-धीरे अपनी मूल स्थिति में आते हैं।
  • कंपन की लंबाई का प्रभाव:
  • कंपन करती हुई वस्तु की लंबाई भी उत्पन्न ध्वनि को प्रभावित करती है।
  • एक सीमा से कम लंबाई पर कंपन करती वस्तु की ध्वनि सुनाई नहीं देती
महत्त्वपूर्ण

ध्वनि का मूल कारण वस्तु का कंपन है।

ध्वनि का संचरण और यांत्रिक तरंगें

  • ध्वनि का संचरण:
  • जब कोई वस्तु कंपन करती है, तो वह अपने संपर्क में आने वाले माध्यम के कणों पर बल लगाती है।
  • ये कण अपनी संतुलित स्थिति से विस्थापित होते हैं और अपने समीप के अन्य कणों पर बल लगाते हैं, जिससे वे भी विस्थापित हो जाते हैं।
  • इस प्रकार, ऊर्जा एक कण से दूसरे कण में स्थानांतरित होती है, और ध्वनि आगे बढ़ती है।
  • माध्यम के कण स्वयं आगे नहीं बढ़ते, बल्कि अपनी माध्य स्थिति के इर्द-गिर्द कंपन करते हैं
  • संपीड़न (Compression) और विरलन (Rarefaction):
  • जब कंपन करती वस्तु आगे की ओर बढ़ती है, तो वह अपने सामने के माध्यम के कणों को धक्का देती है, जिससे वे पास-पास आ जाते हैं। इस क्षेत्र को संपीड़न (C) कहते हैं, जहाँ माध्यम का घनत्व और दाब अधिकतम होता है।
  • जब कंपन करती वस्तु पीछे की ओर आती है, तो वह अपने पीछे के माध्यम के कणों को खींचती है, जिससे वे दूर-दूर हो जाते हैं। इस क्षेत्र को विरलन (R) कहते हैं, जहाँ माध्यम का घनत्व और दाब न्यूनतम होता है।
  • स्वरित्र द्विभुज के लगातार कंपन से वायु में संपीड़न और विरलन की एक श्रृंखला बनती है, जो एक तरंग के रूप में संचरित होती है।
  • यांत्रिक तरंगें (Mechanical Waves):
  • चूंकि ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम के कणों की आवश्यकता होती है (ऊर्जा का स्थानान्तरण कणों द्वारा होता है), ध्वनि को यांत्रिक तरंग कहा जाता है।
  • यांत्रिक तरंगों को संचरण के लिए भौतिक माध्यम (ठोस, द्रव या गैस) की आवश्यकता होती है।
  • विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की चाल:
  • ध्वनि का संचरण माध्यम के कणों के घनत्व और प्रत्यास्थता पर निर्भर करता है।
  • घनत्व जितना अधिक होगा, ध्वनि का संचरण उतना ही तीव्रता से होगा
  • ठोस और द्रव माध्यम के कण गैस की तुलना में अधिक पास-पास होते हैं, इसलिए उनका घनत्व अधिक होता है।
  • चाल का क्रम: ठोस > द्रव > गैस
  • कारण:
  • ठोस में कण सबसे पास होते हैं और प्रबल आकर्षण बल से बंधे होते हैं, जिससे विक्षोभ का स्थानांतरण तेजी से होता है।
  • द्रव में कण गैस से पास होते हैं लेकिन ठोस से दूर होते हैं।
  • गैस में कण सबसे दूर होते हैं, जिससे विक्षोभ का स्थानांतरण धीमा होता है।
  • अधिक प्रत्यास्थ माध्यम में ध्वनि तेजी से संचरित होती है (जैसे स्टील में रबर की अपेक्षा)।
महत्त्वपूर्ण

ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है क्योंकि इसे संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है।

याद रखें

ध्वनि की चाल:

  • ठोस में सबसे अधिक
  • द्रव में मध्यम
  • गैस (वायु) में सबसे कम

ध्वनि संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता

  • बेलजार प्रयोग (Bell Jar Experiment):
  1. एक विद्युत घंटी को काँच के बेलजार में लटकाया जाता है।
  2. बेलजार को एक निर्वात पंप से जोड़ा जाता है।
  3. जब घंटी का स्विच दबाया जाता है, तो उसकी आवाज सुनाई देती है।
  4. निर्वात पंप से बेलजार की वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है।
  5. जैसे-जैसे वायु निकाली जाती है, घंटी की ध्वनि धीमी पड़ने लगती है, भले ही उसमें विद्युत धारा पहले जैसी ही प्रवाहित हो रही हो।
  6. जब बेलजार से लगभग सारी वायु निकाल दी जाती है (निर्वात उत्पन्न हो जाता है), तो घंटी की ध्वनि सुनाई देना बंद हो जाती है।
  • निष्कर्ष:
  • यह प्रयोग सिद्ध करता है कि ध्वनि के संचरण के लिए एक भौतिक माध्यम (जैसे वायु) की आवश्यकता होती है
  • निर्वात में ध्वनि संचरित नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ संपीड़न और विरलन के लिए कोई कण उपस्थित नहीं होते।
  • व्यावहारिक अनुप्रयोग: अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्री सीधे बात नहीं कर सकते क्योंकि वहाँ कोई वायुमंडल (माध्यम) नहीं होता।
महत्त्वपूर्ण

ध्वनि निर्वात में यात्रा नहीं कर सकती।

तरंगों के प्रकार: अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ

तरंग संचरण की दिशा के सापेक्ष माध्यम के कणों के कंपन की दिशा के आधार पर तरंगें दो प्रकार की होती हैं:

1. अनुदैर्ध्य तरंगें (Longitudinal Waves)

  • परिभाषा: वे तरंगें जिनमें माध्यम के कणों का कंपन (दोलन) तरंग संचरण की दिशा के समांतर होता है, अनुदैर्ध्य तरंगें कहलाती हैं।
  • उदाहरण: ध्वनि तरंगें।
  • विशेषताएँ:
  • इनमें संपीड़न (उच्च घनत्व/दाब) और विरलन (निम्न घनत्व/दाब) के क्षेत्र बनते हैं।
  • ऊर्जा का स्थानांतरण संपीड़न और विरलन के माध्यम से होता है।
  • माध्यम के कण अपनी माध्य स्थिति के इर्द-गिर्द आगे-पीछे कंपन करते हैं।
  • स्लिंकी प्रयोग: स्लिंकी को आगे-पीछे धक्का देने और खींचने पर उस पर लगा चिन्ह भी विस्थापन के संचरण की दिशा के समानांतर गति करता है।

2. अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse Waves)

  • परिभाषा: वे तरंगें जिनमें माध्यम के कण अपनी माध्य स्थितियों पर तरंग संचरण की दिशा के लंबवत् दोलन या कंपन करते हैं, अनुप्रस्थ तरंगें कहलाती हैं।
  • उदाहरण: पानी की सतह पर उत्पन्न तरंगें, प्रकाश तरंगें (हालांकि प्रकाश को माध्यम की आवश्यकता नहीं होती)।
  • विशेषताएँ:
  • इनमें शृंग (Crest - उच्चतम बिंदु) और गर्त (Trough - निम्नतम बिंदु) बनते हैं।
  • माध्यम के कण ऊपर-नीचे कंपन करते हैं।
  • स्लिंकी प्रयोग: स्लिंकी के एक सिरे को स्थिर रखकर दूसरे सिरे को ऊपर-नीचे हिलाने पर कणों का कंपन तरंग संचरण की दिशा के लंबवत् होता है।
📖परिभाषा

अनुदैर्ध्य तरंग: कणों का कंपन तरंग संचरण के समांतरअनुप्रस्थ तरंग: कणों का कंपन तरंग संचरण के लंबवत्

ध्वनि तरंग के मूलभूत अभिलक्षण

ध्वनि तरंग के स्वरूप को समझने के लिए चार मुख्य राशियों का उपयोग किया जाता है:

1. तरंगदैर्ध्य (Wavelength, \(\lambda\))

  • परिभाषा: दो क्रमागत संपीड़नों (शृंगों) अथवा दो क्रमागत विरलनों (गर्तों) के बीच की दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं।
  • प्रतीक: \(\lambda\) (लेमडा)
  • SI मात्रक: मीटर (m)
  • यह तरंग के एक पूर्ण चक्र की लंबाई को दर्शाता है।

2. आयाम (Amplitude, A)

  • परिभाषा: ध्वनि तरंग के कारण माध्यम के घनत्व में मूल स्थिति से होने वाले अधिकतम उतार-चढ़ाव का मान तरंग का आयाम कहलाता है।
  • प्रतीक: A
  • यह ध्वनि की तीव्रता (loudness) से संबंधित है। जितनी ऊँची या तीव्र ध्वनि होगी, आयाम उतना ही अधिक होगा।
  • उच्च आयाम = अधिक ऊर्जा = तीव्र ध्वनि।

3. आवर्तकाल (Time Period, T)

  • परिभाषा: माध्यम में घनत्व के एक संपूर्ण दोलन (एक संपीड़न और एक विरलन) को पूरा करने में लगा समय ध्वनि तरंग का आवर्तकाल कहलाता है।
  • प्रतीक: T
  • SI मात्रक: सेकंड (s)
  • यह एक पूर्ण तरंग को बनने में लगने वाला समय है।

4. आवृत्ति (Frequency, n या \(\nu\))

  • परिभाषा: एकांक समय (प्रति सेकंड) में होने वाले दोलनों की कुल संख्या ध्वनि तरंग की आवृत्ति कहलाती है।
  • प्रतीक: n या \(\nu\)
  • SI मात्रक: हर्ट्ज (Hz) या प्रति सेकंड (s⁻¹)
  • यह ध्वनि की तीक्ष्णता (तारत्व/pitch) पर निर्भर करती है। उच्च आवृत्ति = उच्च तारत्व (तीखी ध्वनि)।
  • आवृत्ति और आवर्तकाल में संबंध: \(n = \frac{1}{T}\) या \(T = \frac{1}{n}\)

5. ध्वनि तरंगों की चाल (Speed of Sound Waves, v)

  • परिभाषा: एक संपीड़न या एक विरलन द्वारा एकांक समय में तय की गई दूरी को तरंग की चाल कहते हैं।
  • प्रतीक: v
  • SI मात्रक: मीटर प्रति सेकंड (m/s)
  • चाल का सूत्र: \(v = \frac{\text{दूरी}}{\text{समय}}\)
  • एक दोलन पूर्ण करने में तरंग द्वारा चली गई दूरी = \(\lambda\)
  • एक दोलन पूर्ण करने में लगा समय = T
  • अतः, \(v = \frac{\lambda}{T}\)
  • चूंकि \(\frac{1}{T} = n\), इसलिए \(v = n\lambda\)
  • चाल = आवृत्ति \(\times\) तरंगदैर्ध्य
  • महत्वपूर्ण बिंदु: ध्वनि तरंगों की चाल केवल माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करती है, न कि उसकी तरंगदैर्ध्य या आवृत्ति पर।
🧮सूत्र
  1. आवृत्ति (n) और आवर्तकाल (T) संबंध: \(n = \frac{1}{T}\)
  2. ध्वनि की चाल (v) संबंध: \(v = n\lambda\) (चाल = आवृत्ति \(\times\) तरंगदैर्ध्य)
💡सुझाव

याद रखें: ध्वनि की चाल माध्यम पर निर्भर करती है, आवृत्ति या तरंगदैर्ध्य पर नहीं।

ध्वनि तरंग के वेग, आवृत्ति और तरंगदैर्ध्य में संबंध

यह संबंध ध्वनि तरंग के मूलभूत अभिलक्षणों को एक साथ जोड़ता है और ध्वनि के व्यवहार को समझने में महत्वपूर्ण है।

संबंध का व्युत्पन्न (Derivation)

  1. चाल की परिभाषा से:

चाल \((v) = \frac{\text{तय की गई दूरी}}{\text{लिया गया समय}}\)

  1. एक पूर्ण दोलन के लिए:
  • तरंग द्वारा एक पूर्ण दोलन में तय की गई दूरी तरंगदैर्ध्य (\(\lambda\)) के बराबर होती है।
  • एक पूर्ण दोलन को पूरा करने में लिया गया समय आवर्तकाल (T) के बराबर होता है।
  1. सूत्र में प्रतिस्थापन:

अतः, \(v = \frac{\lambda}{T}\) ...(समीकरण 1)

  1. आवृत्ति और आवर्तकाल के बीच संबंध:

हम जानते हैं कि आवृत्ति \((n)\) आवर्तकाल \((T)\) का व्युत्क्रम होती है: \(n = \frac{1}{T}\) या \(T = \frac{1}{n}\) ...(समीकरण 2)

  1. समीकरण 2 को समीकरण 1 में प्रतिस्थापित करने पर:

\(v = \lambda \times \frac{1}{T}\) \(v = \lambda \times n\) या \(v = n\lambda\)

निष्कर्ष

  • यह संबंध बताता है कि ध्वनि की चाल उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्ध्य के गुणनफल के बराबर होती है।
  • किसी दिए गए माध्यम में ध्वनि की चाल स्थिर रहती है। यदि आवृत्ति बढ़ती है, तो तरंगदैर्ध्य घटती है, और इसके विपरीत, ताकि उनका गुणनफल (चाल) स्थिर रहे।
  • यह संबंध संख्यात्मक प्रश्नों को हल करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🧮सूत्र

ध्वनि की चाल (v) = आवृत्ति (n) \(\times\) तरंगदैर्ध्य (\(\lambda\)) \(v = n\lambda\)

🧮सूत्र

यह व्युत्पत्ति बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछी जाती है। चरणों को ध्यान से समझें।

श्रव्यता परास: श्रव्य, अवश्रव्य और पराश्रव्य ध्वनि

मनुष्यों में ध्वनि की श्रव्यता के आधार पर ध्वनियों को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:

1. श्रव्य ध्वनि (Audible Sound)

  • परिभाषा: वे ध्वनियाँ जिन्हें मनुष्य सुन सकते हैं।
  • आवृत्ति परास: लगभग 20 Hz से 20,000 Hz (या 20 kHz) तक।
  • यह परास व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य के साथ थोड़ा भिन्न हो सकता है।
  • 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे और कुछ जंतु (जैसे कुत्ते) 25 kHz तक की ध्वनि सुन सकते हैं।

2. अवश्रव्य ध्वनि (Infrasound)

  • परिभाषा: वे ध्वनियाँ जिनकी आवृत्ति 20 Hz से कम होती है।
  • मनुष्य द्वारा श्रव्यता: मनुष्य इन ध्वनियों को सुन नहीं सकते।
  • उदाहरण:
  • भूकंप के समय पृथ्वी के भीतर उत्पन्न तरंगें।
  • रासायनिक तथा नाभिकीय विखंडन में उत्पन्न ध्वनियाँ।
  • कुछ जानवर (जैसे व्हेल, हाथी, गैंडा) अवश्रव्य ध्वनियों का उपयोग संचार के लिए करते हैं।
  • लोलक के कंपन से उत्पन्न ध्वनि।

3. पराश्रव्य ध्वनि या पराध्वनि (Ultrasound)

  • परिभाषा: वे ध्वनियाँ जिनकी आवृत्ति 20 kHz (20,000 Hz) से अधिक होती है।
  • मनुष्य द्वारा श्रव्यता: मनुष्य इन ध्वनियों को सुन नहीं सकते।
  • उदाहरण:
  • डॉल्फिन, चमगादड़, पोरपोइज़ जैसे जंतु पराध्वनि उत्पन्न करते हैं और उसका उपयोग करते हैं (इकोलोकेशन)।
  • शलभ (कीट-पतंगे) चमगादड़ों द्वारा उत्पन्न उच्च आवृत्ति की ध्वनि को सुन सकते हैं और उनसे बचने के लिए प्रतिक्रिया करते हैं।
  • विशेषताएँ:
  • उच्च आवृत्ति के कारण इनकी तरंगदैर्ध्य कम होती है।
  • ये अवरोधों की उपस्थिति में भी एक निश्चित पथ पर गमन कर सकती हैं
  • इनका उपयोग उद्योगों और चिकित्सा के क्षेत्रों में व्यापक रूप से किया जाता है।
याद रखें

श्रव्य परास: 20 Hz - 20 kHz अवश्रव्य: < 20 Hz पराश्रव्य: > 20 kHz

महत्त्वपूर्ण

चमगादड़ और डॉल्फिन पराध्वनि का उपयोग करके अपना शिकार ढूंढते हैं और बाधाओं से बचते हैं।

पराश्रव्य ध्वनि का अनुप्रयोग

पराध्वनि (अल्ट्रासाउंड) की उच्च आवृत्ति और अवरोधों के बावजूद सीधे पथ पर गमन करने की क्षमता के कारण इसके कई महत्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं:

1. सफाई (Cleaning)

  • उपयोग: उन भागों को साफ करने में जहाँ सामान्य विधियों से पहुँचना कठिन होता है, जैसे विषम आकार के पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सर्पिल नलिकाएँ।
  • कार्यविधि:
  1. वस्तुओं को साफ करने वाले विलयन में रखा जाता है।
  2. विलयन में पराध्वनि तरंगें भेजी जाती हैं।
  3. उच्च आवृत्ति के कारण ये तरंगें विलयन में कंपन उत्पन्न करती हैं, जिससे धूल, चिकनाई और गंदगी के कण अलग होकर नीचे गिर जाते हैं।
  4. इस प्रकार वस्तु पूर्णतया साफ हो जाती है।

2. धात्विक पिंडों में दोषों का पता लगाना (Detecting Flaws in Metal Blocks)

  • उपयोग: धात्विक पिंडों (जैसे मशीन के पुर्जे, पुलों के बीम) में छुपी दरारों, छिद्रों या अन्य दोषों का पता लगाने के लिए।
  • कार्यविधि:
  1. पराध्वनि तरंगों को धात्विक पिंड में प्रेषित किया जाता है।
  2. यदि पिंड में कोई दोष (दरार, छिद्र) होता है, तो पराध्वनि तरंगें वहाँ से परावर्तित हो जाती हैं।
  3. परावर्तित तरंगों का विश्लेषण करके दोष की स्थिति और आकार का पता लगाया जा सकता है।
  4. यह विधि एक्स-रे की तुलना में अधिक सुरक्षित और सटीक है।

3. चिकित्सा अनुप्रयोग (Medical Applications)

  • अल्ट्रासोनोग्राफी (Ultrasonography):
  • उपयोग: मानव शरीर के आंतरिक अंगों (यकृत, पित्ताशय, गर्भाशय, गुर्दे आदि) का प्रतिबिम्ब प्राप्त करने के लिए।
  • कार्यविधि:
  1. पराध्वनि तरंगें शरीर के ऊतकों में गमन करती हैं।
  2. जहाँ ऊतक के घनत्व में परिवर्तन होता है (जैसे अंगों की सीमाएँ, ट्यूमर, पथरी), वहाँ से ये तरंगें परावर्तित हो जाती हैं।
  3. परावर्तित तरंगों को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करके अंग का प्रतिबिम्ब बनाया जाता है।
  • लाभ: पथरी, ट्यूमर का पता लगाना; गर्भकाल में भ्रूण की जांच, जन्मजात दोषों और वृद्धि की अनियमितताओं का पता लगाना।
  • ईकोकार्डियोग्राफी (Echocardiography):
  • उपयोग: हृदय के कंपन का प्रतिबिम्ब बनाने और उसकी कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करने के लिए।
  • कार्यविधि: पराध्वनि तरंगों को हृदय के विभिन्न भागों से परावर्तित कराकर हृदय की संरचना और गति का चित्र बनाया जाता है।
  • गुर्दे की पथरी का उपचार: गुर्दे की छोटी पथरी को बारीक कणों में तोड़ने के लिए पराध्वनि का उपयोग किया जाता है, जिन्हें बाद में मूत्र के माध्यम से बाहर निकाला जा सकता है।

4. सोनार (SONAR - Sound Navigation and Ranging)

  • उपयोग: जल में स्थित पिण्डों (जैसे पनडुब्बियां, डूबे हुए जहाज, समुद्री तल की गहराई) की दूरी, दिशा और चाल मापने के लिए।
  • घटक: एक प्रेषित्र (transmitter) और एक संसूचक (receiver)।
  • कार्यविधि:
  1. प्रेषित्र पराध्वनि तरंगें उत्पन्न करता है और उन्हें जल में प्रेषित करता है।
  2. ये तरंगें जल में गमन करती हैं और किसी पिण्ड (जैसे समुद्र तल) से टकराकर परावर्तित होती हैं।
  3. परावर्तित तरंगों को संसूचक द्वारा ग्रहण किया जाता है और विद्युत संकेतों में परिवर्तित किया जाता है।
  4. प्रेषण और अभिग्रहण के बीच के समय अंतराल (t) को मापकर पिण्ड की दूरी (d) की गणना की जाती है।
  • सूत्र: यदि समुद्री जल में ध्वनि की चाल \(v\) है, तो संकेत द्वारा तय की गई कुल दूरी \(2d\) होगी (जाना और आना)।

\(2d = v \times t\) अतः, \(d = \frac{v \times t}{2}\)

  • लाभ: समुद्री अन्वेषण, मछली पकड़ने, सैन्य अनुप्रयोगों में महत्वपूर्ण।
महत्त्वपूर्ण

पराध्वनि के अनुप्रयोगों में उच्च आवृत्ति और अवरोधों के बावजूद सीधा संचरण महत्वपूर्ण है।

🧮सूत्र

सोनार द्वारा दूरी ज्ञात करने का सूत्र: \(d = \frac{v \times t}{2}\) जहाँ \(d\) = दूरी, \(v\) = ध्वनि की चाल, \(t\) = समय अंतराल।

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