बहुकोशिकीय संरचना : ऊतक
यह अध्याय कोशिकाओं के समूह, जिन्हें ऊतक कहा जाता है, और उनके कार्यों पर केंद्रित है। यह पादप और जंतु ऊतकों के विभिन्न प्रकारों, जैसे त्वचीय, भरण, संवहन, संयोजी, पेशीय और तंत्रिका ऊतक, की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। छात्र ऊतकों के समूहीकरण, उनकी संरचना और कार्यों के बीच संबंध को समझेंगे, और बहुकोशिकीय जीवों में श्रमविभाजन के महत्व को जानेंगे।
ऊतक: परिभाषा और अवलोकन
ऊतक (Tissue) बहुकोशिकीय जीवों में कोशिकाओं का एक समूह है जो संरचना और कार्य में समान होता है और एक विशिष्ट कार्य करता है।
- ऊतक की अवधारणा:
- बहुकोशिकीय जीवों में श्रम विभाजन (Division of Labour) होता है।
- प्रत्येक विशिष्ट कार्य कोशिकाओं के एक समूह द्वारा किया जाता है।
- कोशिकाओं का यह समूह एक विशिष्ट ऊतक का निर्माण करता है।
- उदाहरण: पौधों में पानी के संवहन के लिए विशिष्ट कोशिकाएँ (जाइलम) और वृद्धि के लिए विशिष्ट कोशिकाएँ (प्रविभाजी ऊतक)।
- ऊतक की परिभाषा:
- ऊतक कोशिकाओं के समूह और उनके चारों ओर पाए जाने वाले वातावरण (द्रव) का सम्मिलित रूप है।
- इनकी आपसी क्रियाओं के फलस्वरूप एक प्रकार के ऊतक एक या एक से अधिक कार्यों को संपन्न करते हैं।
- ऊतक का महत्व:
- श्रम विभाजन को संभव बनाता है, जिससे दक्षता बढ़ती है।
- बहुकोशिकीय जीवों में जटिल कार्यों का निष्पादन होता है।
- कोशिका → ऊतक → अंग → अंगतंत्र → जीव का संरचनात्मक संगठन बनाता है।
- क्रियाकलाप 1: पौधों में पानी का संवहन
- उद्देश्य: पौधों में पानी के संवहन के लिए जिम्मेदार ऊतकों का अवलोकन करना।
- विधि:
- कोमल तने वाली शाखा को लाल स्याही वाले पानी में रखें।
- कुछ समय बाद तने की आड़ी और खड़ी काट का अवलोकन करें।
- अवलोकन: तने के कुछ भाग लाल/गुलाबी हो जाते हैं, जो यह दर्शाता है कि ये कोशिकाएँ पानी का संवहन कर रही हैं। ये कोशिकाएँ अन्य कोशिकाओं से भिन्न व्यवस्था में होती हैं।
- क्रियाकलाप 2: पौधों में वृद्धि का अवलोकन
- उद्देश्य: पौधों में वृद्धि के लिए जिम्मेदार ऊतकों की पहचान करना।
- विधि:
- अंकुरित चने/मूंग के बीजों के मूलांकुरों की लंबाई मापें (कटोरी 'अ' और 'ब')।
- कटोरी 'ब' के मूलांकुरों के सिरे काट दें।
- कुछ दिनों बाद दोनों कटोरियों के मूलांकुरों की लंबाई पुनः मापें।
- अवलोकन: कटोरी 'अ' के मूलांकुरों की लंबाई बढ़ती है, जबकि कटोरी 'ब' के मूलांकुरों की लंबाई नहीं बढ़ती।
- निष्कर्ष: पौधों में वृद्धि करने वाली कोशिकाओं का समूह मूलांकुरों के सिरे पर होता है।
- क्रियाकलाप 3: मूलांकुर के सिरे की कोशिकाओं का अवलोकन
- उद्देश्य: वृद्धि करने वाली कोशिकाओं की संरचना का अवलोकन करना।
- विधि: कटे हुए मूलांकुर के सिरे की स्लाइड बनाकर सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करें।
- अवलोकन: कोशिकाओं की व्यवस्था और संरचना अन्य भागों से भिन्न दिखाई देती है।
ऊतक (Tissue): कोशिकाओं का एक समूह जो संरचना, कार्य और उत्पत्ति में समान होता है तथा एक विशिष्ट कार्य को संपन्न करता है।
बहुकोशिकीय जीवों में श्रम विभाजन ऊतकों के कारण ही संभव हो पाता है।
ऊतक विज्ञान का ऐतिहासिक विकास
ऊतकों के अध्ययन का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है, जिसमें विभिन्न वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
- मॉरी फ्रेन्कोइस जेवियर बिछट (1799):
- इन्होंने मनुष्यों के शरीर में रोगग्रस्त क्षेत्रों की आंतरिक संरचना के अवलोकन के दौरान 'टिश्यू' (ऊतक) शब्द का प्रयोग किया।
- बिछट ने ऊतकों को मुख्य रूप से 3 भागों में बांटा:
- फाइब्रस (रेशेदार): रेशे के समान ऊतक।
- सिरस (तरल): पानी जैसे तरल ऊतक।
- म्यूकस (चिपचिपा): चिपचिपे ऊतक।
- इन्होंने सूक्ष्मदर्शी का उपयोग नहीं किया था, फिर भी इनके वर्गीकरण आज के जंतु ऊतकों के नामकरण से काफी मिलते-जुलते हैं।
- नेहमिया ग्रीव (1641-1712):
- इन्होंने पौधों के ऊतकों का अध्ययन किया।
- मुख्य निष्कर्ष: प्रत्येक पौधे में दो प्रकार के जैविक भाग होते हैं - पिथी (मज्जा) और वुडी (काष्ठीय)।
- सर्वप्रथम पतली झिल्ली वाली, स्पंजी और द्रव से भरी कोशिकाओं को पैरेन्काइमा कहा।
- श्लीडेन व श्वान (1838):
- इनके अध्ययन ग्रीव के अध्ययनों से मिलते-जुलते थे।
- इन्होंने पक्षी के पंख की आड़ी काट में और शिशु भेड़ के पेट की आंतरिक सतह के ऊतकों में पैरेन्काइमा जैसी कोशिकाओं को देखा।
- पादप और जंतु ऊतकों में समानता व असमानता के आधार पर कोशिका सिद्धांत (Cell Theory) का प्रतिपादन किया।
- नगेली:
- वनस्पतिशास्त्री, जिन्होंने 'फॉर्मेटिव' (प्रविभाजी) और 'स्टेबल' (स्थायी) ऊतकों की संकल्पना दी।
- फॉर्मेटिव ऊतक (मेरीस्टेमेटिक): तेजी से वृद्धि करने वाले ऊतक, जैसे पौधों की जड़ों व तने के शीर्ष भाग में। इनकी कोशिकाएँ छोटी, केंद्रक बड़े और स्पष्ट होते हैं, कोशिकाद्रव्य कम होता है।
- इन्होंने पौधों में पानी, खनिज व भोजन का संवहन करने वाले नलिका जैसे ऊतकों को क्रमशः जाइलम और फ्लोएम नाम दिया।
- श्लीडेन और श्वान के अवलोकन (नगेली के साथ):
- तेजी से वृद्धि करने वाले ऊतकों की कोशिकाएँ छोटी, केंद्रक बड़े व स्पष्ट थीं, कोशिकाद्रव्य कम था।
- परिपक्व होने पर कोशिकाएँ आकार में बड़ी, केंद्रक छोटा, पर्याप्त कोशिकाद्रव्य और मोटी कोशिका भित्ति वाली हो जाती हैं।
- पादप और जंतु ऊतकों में अंतर:
- पौधे: अधिकांश संवहन और सहारा देने वाले ऊतक मृत होते हैं। विभाजित होने वाले और अविभाजित क्षेत्रों में स्पष्ट अंतर होता है।
- जंतु: प्रायः ऊतक जीवित होते हैं। विभाजित होने वाले और अविभाजित क्षेत्रों में अंतर करना मुश्किल होता है।
कोशिका सिद्धांत: श्लीडेन और श्वान द्वारा प्रतिपादित, जिसके अनुसार सभी जीव कोशिकाओं और कोशिका उत्पादों से बने होते हैं, और सभी कोशिकाएँ पूर्व-मौजूदा कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं।
ऊतक विज्ञान के ऐतिहासिक विकास में बिछट, ग्रीव, श्लीडेन, श्वान और नगेली के योगदान को याद रखना महत्वपूर्ण है।
ऊतकों का वर्गीकरण: आधार और प्रकार
वैज्ञानिकों ने ऊतकों के कार्यों, स्थिति, संगठन, व्यवस्था और विभाजन क्षमता आदि गुणों को आधार बनाकर उनका समूहीकरण किया है।
पादप ऊतकों का समूहीकरण
पादप ऊतकों को मुख्य रूप से उनकी विभाजन क्षमता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- 1. प्रविभाजी ऊतक (Meristematic Tissue):
- विशेषताएँ: इनकी कोशिकाओं में लगातार विभाजन की क्षमता होती है। ये पौधे की वृद्धि के लिए जिम्मेदार होते हैं। कोशिकाएँ छोटी, पतली भित्ति वाली, सघन कोशिकाद्रव्य और बड़े केंद्रक वाली होती हैं।
- उदाहरण: तने व जड़ के शीर्ष (एपिकल मेरिस्टेम), तने के पार्श्व भाग (लैटरल मेरिस्टेम), पर्वसंधियों पर (इंटरकैलेरी मेरिस्टेम) पाए जाने वाले ऊतक।
- 2. स्थायी ऊतक (Permanent Tissue):
- विशेषताएँ: इनकी कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता नहीं होती या बहुत कम होती है। ये प्रविभाजी ऊतकों से विकसित होते हैं और विशिष्ट कार्य करने के लिए विभेदित (differentiated) हो जाते हैं।
- स्थायी ऊतकों का आगे वर्गीकरण (संगठन के आधार पर):
- अ) सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue):
- विशेषताएँ: एक ही प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं।
- प्रकार (स्थिति व कार्य के आधार पर):
- त्वचीय ऊतक (Dermal Tissue):
- कार्य: पौधे के विभिन्न अंगों का बाह्य आवरण बनाना और सुरक्षा प्रदान करना।
- उदाहरण: एपिडर्मिस।
- भरण ऊतक (Ground Tissue):
- कार्य: पौधे के विभिन्न भागों का निर्माण करना और अन्य ऊतकों को व्यवस्थित करने में मदद करना।
- प्रकार:
- मृदूतक (Parenchyma): जीवित कोशिकाएँ, पतली भित्ति, अंतर्कोशिकीय स्थान, भोजन भंडारण, प्रकाश संश्लेषण (क्लोरेन्काइमा), उत्प्लावन (ऐरेन्काइमा)।
- स्थूलकोणतक (Collenchyma): जीवित कोशिकाएँ, कोनों पर मोटी भित्ति, लचीलापन और यांत्रिक सहारा प्रदान करना।
- दृढ़ोतक (Sclerenchyma): मृत कोशिकाएँ, मोटी और लिग्निन युक्त भित्ति, कठोरता और यांत्रिक सहारा प्रदान करना (जैसे नारियल के रेशे)।
- ब) जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue):
- विशेषताएँ: एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं, जो मिलकर एक इकाई के रूप में कार्य करते हैं।
- प्रकार (संवहन के आधार पर):
- जाइलम (Xylem):
- कार्य: पानी और खनिज लवणों का जड़ों से पौधे के अन्य भागों तक संवहन करना।
- घटक: वाहिनिकाएँ (Tracheids), वाहिकाएँ (Vessels), जाइलम पैरेन्काइमा, जाइलम फाइबर।
- फ्लोएम (Phloem):
- कार्य: पत्तियों में बने भोजन को पौधे के अन्य भागों तक संवहन करना।
- घटक: चालनी नलिकाएँ (Sieve Tubes), सह कोशिकाएँ (Companion Cells), फ्लोएम पैरेन्काइमा, फ्लोएम फाइबर।
जंतु ऊतकों का समूहीकरण
जंतु ऊतकों को मुख्य रूप से उनके कार्यों के आधार पर चार प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया जाता है।
- 1. त्वचीय ऊतक (Epithelial Tissue):
- कार्य: शरीर के अंगों की सुरक्षा, आवरण बनाना, स्राव और अवशोषण।
- स्थान: त्वचा, मुँह की आंतरिक सतह, रक्त वाहिनियों की परतें, फेफड़ों की वायु कूपिकाएँ, वृक्क की नलिकाएँ।
- विशेषताएँ: कोशिकाएँ कसकर सटी होती हैं, अंतर्कोशिकीय स्थान कम होता है।
- 2. संयोजी ऊतक (Connective Tissue):
- कार्य: शरीर के अंगों को जोड़ना, सहारा देना, भरना और सुरक्षा प्रदान करना।
- प्रकार:
- अंतराली ऊतक (Areolar Tissue): आंतरिक अंगों को सहारा देना, त्वचा और मांसपेशियों के बीच, रक्त वाहिनियों के चारों ओर।
- वसीय ऊतक (Adipose Tissue): वसा का भंडारण, ताप नियंत्रण, अंगों को झटकों से बचाना (त्वचा के नीचे)।
- तरल ऊतक (Fluid Connective Tissue):
- रक्त (Blood): ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पोषक तत्वों और अपशिष्ट पदार्थों का संवहन, ताप नियंत्रण, रोग प्रतिरोधक क्षमता।
- लसिका (Lymph): प्रतिरक्षा में सहायक।
- कंकालीय ऊतक (Skeletal Tissue):
- अस्थि (Bone): शरीर का ढाँचा बनाना, अंगों की सुरक्षा, गति में सहायता।
- उपास्थि (Cartilage): हड्डियों की सतहों को चिकना बनाना, लचीलापन प्रदान करना (नाक, कान, श्वासनली)।
- 3. पेशीय ऊतक (Muscular Tissue):
- कार्य: शरीर के विभिन्न अंगों में गति उत्पन्न करना।
- प्रकार:
- रेखित पेशी (Striated/Skeletal Muscle): ऐच्छिक गति (हाथ, पैर, गर्दन)। कोशिकाएँ बेलनाकार, बहुकेंद्रकीय, धारियों वाली।
- अरेखित पेशी (Unstriated/Smooth Muscle): अनैच्छिक गति (आहार नली, श्वास नली, रक्त वाहिनियाँ)। कोशिकाएँ तर्कु रूपी, एककेंद्रकीय, धारियों रहित।
- हृदय पेशी (Cardiac Muscle): अनैच्छिक गति (हृदय)। कोशिकाएँ शाखित, एककेंद्रकीय, धारियों वाली। जीवन पर्यंत कार्य करती हैं।
- 4. तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue):
- कार्य: संवेदनाओं और उद्दीपनों का शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक संवहन करना।
- घटक: न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिकाएँ) और न्यूरोग्लिया कोशिकाएँ।
- स्थान: मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और तंत्रिकाएँ।
पादप ऊतकों में प्रविभाजी ऊतक वृद्धि के लिए जिम्मेदार होते हैं, जबकि स्थायी ऊतक विशिष्ट कार्य करते हैं।
जंतु ऊतकों को उनके कार्य के आधार पर त्वचीय, संयोजी, पेशीय और तंत्रिका ऊतकों में वर्गीकृत किया जाता है।
पादप ऊतकों का प्रायोगिक अवलोकन
विभिन्न क्रियाकलापों के माध्यम से पादप ऊतकों की संरचना और व्यवस्था का अवलोकन किया जा सकता है।
- क्रियाकलाप 4: त्वचीय ऊतक (एपिडर्मिस) का अवलोकन
- उद्देश्य: पत्ती की निचली सतह की एपिडर्मल कोशिकाओं और रंध्रों का अवलोकन करना।
- विधि: रियो की पत्ती की निचली झिल्ली को निकालकर स्लाइड पर रखकर सूक्ष्मदर्शी से देखें।
- अवलोकन:
- कोशिकाएँ पतली, केंद्रक युक्त और आपस में सटी हुई होती हैं, इनके बीच अंतर्कोशिकीय स्थान नहीं होता।
- रंध्र (Stomata) दिखाई देते हैं, जो दो वृक्क के आकार की रक्षी कोशिकाओं (Guard Cells) से घिरे होते हैं।
- रक्षी कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट पाए जा सकते हैं।
- कार्य: सुरक्षा, वाष्पोत्सर्जन (Transpiration), गैसों का आदान-प्रदान।
- अनुकूलन: शुष्क स्थानों पर मोम जैसी प्रतिरोधी सतह (क्यूटिकल) बनाती है, जलीय पौधों में भी मोम जैसी परत होती है।
- क्रियाकलाप 5: मृदूतक (पैरेन्काइमा) का अवलोकन
- उद्देश्य: केले के गूदे में पैरेन्काइमा कोशिकाओं का अवलोकन करना।
- विधि: केले के नर्म हिस्से को मसलकर आयोडीन विलयन से अभिरंजित कर स्लाइड बनाकर सूक्ष्मदर्शी से देखें।
- अवलोकन:
- कोशिकाएँ छोटी, केंद्रक स्पष्ट, कोशिकाद्रव्य कम व कणिकामय होता है।
- कोशिका झिल्ली स्पष्ट व बारीक रेखा की तरह होती है।
- इन कोशिकाओं के बीच रिक्त स्थान (अंतर्कोशिकीय अवकाश) पाया जाता है।
- आयोडीन से अभिरंजित करने पर स्टार्च के कण गहरे-नीले रंग के दिखाई देते हैं।
- प्रकार:
- क्लोरेन्काइमा (Chlorenchyma): जब पैरेन्काइमा में पर्णहरिम (क्लोरोफिल) पाया जाता है, प्रकाश संश्लेषण का कार्य करता है।
- ऐरेन्काइमा (Aerenchyma): जलीय पौधों में पैरेन्काइमा की कोशिकाओं के मध्य बड़ी गुहिकाएँ होती हैं, जो उत्प्लावन में मदद करती हैं।
- क्रियाकलाप 6: दृढ़ोतक (स्क्लेरेन्काइमा) का अवलोकन
- उद्देश्य: अमरुद/नाशपती में दृढ़ोतक कोशिकाओं का अवलोकन करना।
- विधि: अमरुद के नर्म भागों को नीडल से निकालकर आयोडीन विलयन से अभिरंजित कर स्लाइड बनाकर सूक्ष्मदर्शी से देखें।
- अवलोकन:
- गहरे रंग की रचनाएँ दिखाई देती हैं, जो पैरेन्काइमा से घिरी होती हैं।
- ये कोशिकाएँ लंबी, पतली और मृत होती हैं।
- इनकी भित्ति लिग्निन के जमाव के कारण मोटी होती है।
- कोशिकाओं के मध्य आंतरिक स्थान नहीं होता।
- कार्य: पौधे को कठोरता और यांत्रिक सहारा प्रदान करना।
- उदाहरण: नारियल के रेशे, संतरों के बीजों का आवरण, सूखी तोरई के रेशे।
पादप ऊतकों में त्वचीय ऊतक सुरक्षा, मृदूतक भोजन भंडारण, और दृढ़ोतक कठोरता प्रदान करते हैं।
लिग्निन: एक रासायनिक पदार्थ जो स्क्लेरेन्काइमा कोशिकाओं की भित्ति में जमा होकर उन्हें दृढ़ और कठोर बनाता है।
जंतु ऊतकों का प्रायोगिक अवलोकन
जंतु ऊतकों की संरचना और कार्य को समझने के लिए विभिन्न प्रकार की स्थायी स्लाइडों का अवलोकन किया जा सकता है।
- क्रियाकलाप 7: त्वचीय ऊतक (एपिथीलियल ऊतक) का अवलोकन
- उद्देश्य: गाल की आंतरिक सतह की कोशिकाओं का अवलोकन करना।
- विधि: गाल की आंतरिक सतह की स्लाइड बनाकर सूक्ष्मदर्शी से देखें। (या रुसी, एड़ी से उतरने वाली चमड़ी का अवलोकन करें।)
- अवलोकन:
- कोशिकाएँ पतली, केंद्रक युक्त और अपेक्षाकृत सटी होती हैं।
- इनके बीच अंतर्कोशिकीय स्थान नहीं होता।
- कार्य: अंगों की सुरक्षा, संवहन, स्रावण और मरम्मत।
- स्थान: त्वचा, मुँह की आंतरिक सतह, रक्त वाहिनियों की परतें, फेफड़ों की वायु कूपिकाएँ।
- क्रियाकलाप 8: पेशीय ऊतक (हृदय पेशी) का अवलोकन
- उद्देश्य: हृदय पेशीय कोशिकाओं की संरचना का अवलोकन करना।
- विधि: प्रयोगशाला में उपलब्ध हृदय पेशीय कोशिका की स्थायी स्लाइड का सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करें।
- अवलोकन:
- कोशिकाएँ शाखित, एककेंद्रकीय और धारियों वाली दिखाई देती हैं।
- ये कोशिकाएँ अनैच्छिक रूप से कार्य करती हैं।
- कार्य: हृदय की लयबद्ध गति को बनाए रखना।
- अन्य जंतु ऊतकों का अवलोकन (सामान्य जानकारी):
- संयोजी ऊतक:
- रक्त: विभिन्न रक्त कणिकाएँ (लाल रक्त कोशिकाएँ, श्वेत रक्त कोशिकाएँ, प्लेटलेट्स) प्लाज्मा में तैरती हुई दिखाई देती हैं।
- अस्थि ऊतक: कठोर मैट्रिक्स में अस्थि कोशिकाएँ (ओस्टियोसाइट्स) व्यवस्थित होती हैं।
- वसीय ऊतक: वसा कोशिकाओं (एडिपोसाइट्स) का समूह, जिनमें वसा की बड़ी बूँदें होती हैं।
- तंत्रिका ऊतक:
- न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिका): इसमें एक कोशिका काय (साइटॉन), डेंड्राइट और एक लंबा एक्सॉन होता है।
जंतुओं में पेशीय ऊतक गति के लिए, त्वचीय ऊतक सुरक्षा के लिए, संयोजी ऊतक जोड़ने और सहारा देने के लिए, और तंत्रिका ऊतक संवेदनाओं के संवहन के लिए जिम्मेदार होते हैं।
रक्त को संयोजी ऊतक क्यों कहते हैं? रक्त शरीर के विभिन्न भागों को जोड़ता है (पोषक तत्व, गैसें, हार्मोन का परिवहन करके) और इसमें एक तरल मैट्रिक्स (प्लाज्मा) होता है, जो इसे अन्य संयोजी ऊतकों से अलग करता है लेकिन फिर भी इसे संयोजी ऊतक की श्रेणी में रखता है।
ऊतकों के कार्य और श्रम विभाजन
ऊतक कोशिकाओं के समूह और उनके बाहरी वातावरण का सम्मिलित रूप हैं, जो मिलकर विशिष्ट कार्य करते हैं। बहुकोशिकीय जीवों में यह श्रम विभाजन उनके अस्तित्व और दक्षता के लिए महत्वपूर्ण है।
- श्रम विभाजन का महत्व:
- प्रत्येक ऊतक एक या एक से अधिक विशिष्ट कार्य करता है।
- यह जीवों को अधिक जटिल और कुशल कार्य करने में सक्षम बनाता है।
- उदाहरण: प्रजनन के लिए अलग व्यवस्था, उत्सर्जन के लिए अलग व्यवस्था।
- पादप और जंतु ऊतकों के कार्यों में समानताएँ:
- सहारा और संरचनात्मक सहायता:
- पौधे: जाइलम और दृढ़ोतक पौधे को सहारा देते हैं।
- जंतु: अस्थि और उपास्थि शरीर का ढाँचा बनाते हैं और सहारा देते हैं।
- संवहन:
- पौधे: जाइलम पानी और खनिज लवणों का संवहन करता है; फ्लोएम भोजन का संवहन करता है।
- जंतु: रक्त ऑक्सीजन, पोषक तत्वों और अपशिष्ट पदार्थों का संवहन करता है।
- सुरक्षा:
- पौधे: त्वचीय ऊतक (एपिडर्मिस) बाहरी आवरण प्रदान करता है।
- जंतु: त्वचीय ऊतक (एपिथीलियल) त्वचा और आंतरिक अंगों की सुरक्षा करता है।
- भरण पदार्थ:
- पौधे: पैरेन्काइमा भरण ऊतक के रूप में कार्य करता है।
- जंतु: अंतराली ऊतक और वसीय ऊतक अंगों के बीच भरण पदार्थ के रूप में कार्य करते हैं।
- ऊतकों की वृद्धि और मरम्मत:
- कुछ ऊतकों में अतिशीघ्र वृद्धि और विभाजन की क्षमता होती है, जैसे त्वचा और आंतरिक सतह बनाने वाले ऊतक।
- ये ऊतक वृद्धि और मरम्मत की प्रक्रियाओं को सरल बनाते हैं।
- स्टेम कोशिकाएँ (Stem Cells): जंतुओं में कुछ कोशिकाएँ ऐसी होती हैं जो विभाजित होने की क्षमता रखती हैं। ये क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की क्षतिपूर्ति करती हैं।
- स्टेम कोशिकाएँ विभेदित होकर विशिष्ट ऊतक की कोशिकाएँ बना सकती हैं।
- ये अस्थिमज्जा और नवजात शिशु की गर्भनाल (आँवल) में पाई जाती हैं।
- ऊतक और वातावरण:
- ऊतक एक प्रकार के द्रव से घिरे रहते हैं।
- इस द्रव के संगठन और आयतन में परिवर्तन ऊतक के क्रियाकलापों को प्रभावित करता है।
- विभिन्न लवणों की निश्चित मात्रा इस द्रव के उचित माध्यम के लिए आवश्यक है।
बहुकोशिकीय जीवों में कोशिका → ऊतक → अंग → अंगतंत्र का संगठन पाया जाता है, जो श्रम विभाजन को दर्शाता है।
स्टेम कोशिकाएँ अविभेदित कोशिकाएँ होती हैं जिनमें स्वयं को नवीनीकृत करने और विभिन्न प्रकार की विशिष्ट कोशिकाओं में विभेदित होने की क्षमता होती है।
ऊतक संरचना और कार्य का विकास
बहुकोशिकीय संरचना का विकास लगभग 580 मिलियन वर्ष पहले हुआ, जिससे कोशिकाओं की संरचना और कार्यों में परिवर्तन आया।
- जलीय से स्थलीय जीवन में अनुकूलन:
- पौधे:
- जलीय पौधों से स्थलीय वातावरण में आने पर सूखने से बचने की चुनौती।
- जड़ों का विकास: अधिक पानी अवशोषित करने के लिए शाखित जड़ें विकसित हुईं।
- संवहन ऊतकों का विकास: जाइलम और फ्लोएम जैसी नलिका रूपी संरचनाएँ विकसित हुईं, जो पानी, खनिज लवण और भोजन का संवहन करती हैं।
- त्वचीय ऊतक: क्यूटिकल जैसी मोम की परत विकसित हुई ताकि पानी की हानि कम हो।
- रंध्र: गैसों के आदान-प्रदान और वाष्पोत्सर्जन के लिए रंध्र विकसित हुए।
- जंतु:
- जलीय जंतुओं में शरीर की सतह से श्वसन होता था।
- स्थलीय वातावरण में आने पर शरीर की सतह सूखने लगी।
- फेफड़ों का विकास: हवा के संपर्क में आने पर सूखने से बचने और अधिक हवा ग्रहण करने के लिए फेफड़े विकसित हुए।
- फेफड़ों की सतह बहुस्तरीय और वलयित होती है, जिससे सतह का क्षेत्रफल बढ़ता है और गैसों का आदान-प्रदान कुशल होता है।
- संरचना और कार्य का संबंध:
- ऊतकों की संरचना उनके विशिष्ट कार्यों के लिए अनुकूलित होती है।
- उदाहरण:
- पत्ती: प्रकाश संश्लेषण के लिए पर्णहरित और गैसों के आदान-प्रदान के लिए रंध्र होते हैं।
- आँख: देखने के कार्य के लिए प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ होती हैं।
- जाइलम: पानी के संवहन के लिए नलिकाकार संरचना।
- पेशीय ऊतक: गति के लिए संकुचनशील प्रोटीन होते हैं।
- विकासवादी अनुकूलन:
- पर्यावरण में परिवर्तन के साथ-साथ जीवों की कोशिकाओं और ऊतकों की संरचना और कार्य में भी परिवर्तन हुए हैं।
- यह अनुकूलन जीवों को विभिन्न वातावरणों में जीवित रहने और पनपने में मदद करता है।
ऊतकों की संरचना और कार्य का आपस में घनिष्ठ संबंध है; संरचनात्मक अनुकूलन ही विशिष्ट कार्यों को संभव बनाता है।
जलीय से स्थलीय जीवन में पौधों और जंतुओं में हुए संरचनात्मक और कार्यात्मक अनुकूलनों के उदाहरणों को याद रखें।