परमाणु संरचना
यह अध्याय पदार्थ के सबसे छोटे कण, परमाणु की संरचना को विस्तार से समझाता है। इसमें डाल्टन के परमाणु सिद्धांत, थॉमसन के प्लम पुडिंग मॉडल, रदरफोर्ड के अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग और नाभिकीय मॉडल, गोल्डस्टीन द्वारा प्रोटॉन की खोज, और बोर-बरी योजना के अनुसार इलेक्ट्रॉनों के वितरण जैसे प्रमुख विषय शामिल हैं। छात्र परमाणु संख्या, द्रव्यमान संख्या, समस्थानिक और समभारिक जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को भी सीखते हैं, जो रसायन विज्ञान की नींव बनाते हैं। यह अध्याय छात्रों को यह समझने में मदद करता है कि पदार्थ कैसे बने होते हैं और रासायनिक अभिक्रियाएं कैसे होती हैं।
पदार्थ के कण और परमाणु की प्रारंभिक अवधारणा
पदार्थ हमारे चारों ओर विभिन्न रूपों में मौजूद हैं। ये सभी पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों से बने होते हैं।
- कणों की सूक्ष्मता:
- पदार्थ के कण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें नग्न आँखों से देखना असंभव है।
- उदाहरण: पोटैशियम परमैंगनेट के कुछ क्रिस्टल पानी की बड़ी मात्रा को रंगीन कर सकते हैं, जो दर्शाता है कि एक क्रिस्टल में भी लाखों सूक्ष्म कण होते हैं।
- परमाणु की प्रारंभिक अवधारणाएँ:
- महर्षि कणाद (लगभग 500 ईसा पूर्व):
- भारतीय दार्शनिक।
- प्रतिपादित किया कि यदि पदार्थ को विभाजित करते जाएँ तो अंत में एक ऐसा सूक्ष्मतम अविभाज्य कण प्राप्त होगा जिसे और विभाजित नहीं किया जा सकता।
- डेमोक्रिटस (ग्रीक दार्शनिक):
- कणाद के समान विचार रखे।
- इस अविभाज्य कण को "एटमोस" कहा, जिसका अर्थ है 'जिसे तोड़ा नहीं जा सकता'।
- माना कि पूरी दुनिया इन्हीं एटमोस से बनी है।
- इपिक्यूरस (306 ईसा पूर्व):
- अपनी किताब में लिखा कि हमारे आस-पास की सभी चीजें परमाणुओं से बनी हैं।
- ल्यूक्रेसियस:
- अपनी कविता "चीजों की प्रकृति" (Nature of Things) में परमाणु संबंधी बात की।
- वैज्ञानिक आधार का अभाव:
- इन प्रारंभिक अवधारणाओं को प्रयोगों और विश्लेषणों का समर्थन प्राप्त नहीं था, इसलिए वे लंबे समय तक प्रचलित नहीं हो पाईं।
- अठारहवीं शताब्दी में रसायनशास्त्र की नई तकनीकों के विकास से परमाणुवाद को बल मिला।
- परमाणु की आधारभूत प्रकृति:
- पदार्थ के ये सूक्ष्म कण दो प्रकार के होते हैं: अणु तथा परमाणु।
- परमाणु एक आधारभूत (बुनियादी) कण है।
- परमाणु आपस में जुड़कर अणु बनाते हैं।
परमाणु वह सूक्ष्मतम कण है जो रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है और अपना अस्तित्व बनाए रखता है।
डाल्टन का परमाणु सिद्धांत
जॉन डाल्टन ने 1808 में "ए न्यू सिस्टम ऑफ केमिकल फिलॉसफी" नामक अपनी किताब में परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया। यह सिद्धांत रासायनिक संयोजन के नियमों (द्रव्यमान संरक्षण का नियम और स्थिर अनुपात का नियम) की व्याख्या करने में सहायक था।
- डाल्टन के परमाणु सिद्धांत के मुख्य बिंदु:
- सभी पदार्थ परमाणुओं से बने होते हैं। परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी अविभाज्य इकाई है।
- परमाणु अविभाज्य, सूक्ष्मतम कण होते हैं जो रासायनिक अभिक्रिया में न तो बनते हैं और न ही उनका विनाश होता है। (यह द्रव्यमान संरक्षण के नियम की व्याख्या करता है)
- किसी एक तत्व के परमाणुओं का द्रव्यमान एवं रासायनिक गुणधर्म समान होते हैं।
- अलग-अलग तत्वों के परमाणुओं का द्रव्यमान एवं रासायनिक गुणधर्म अलग-अलग होते हैं।
- अलग-अलग तत्वों के परमाणु परस्पर छोटी पूर्ण संख्या के अनुपात में संयोग करके यौगिक बनाते हैं। (यह स्थिर अनुपात के नियम की व्याख्या करता है)
- किसी भी यौगिक में परमाणुओं की सापेक्ष संख्या एवं प्रकार निश्चित होते हैं।
- डाल्टन के सिद्धांत की सीमाएँ:
- यह परमाणु के अविभाज्य होने की धारणा पर आधारित था, जिसे बाद में उप-परमाण्विक कणों (इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन) की खोज से गलत साबित कर दिया गया।
- यह समस्थानिकों की अवधारणा की व्याख्या नहीं कर सका (एक ही तत्व के परमाणु जिनके द्रव्यमान अलग-अलग होते हैं)।
- यह समभारिकों की अवधारणा की व्याख्या नहीं कर सका (अलग-अलग तत्वों के परमाणु जिनके द्रव्यमान समान होते हैं)।
- यह परमाणु के भीतर की संरचना के बारे में कोई जानकारी नहीं देता था।
डाल्टन का परमाणु सिद्धांत रासायनिक संयोजन के नियमों (द्रव्यमान संरक्षण और स्थिर अनुपात) की सफलतापूर्वक व्याख्या करने वाला पहला वैज्ञानिक सिद्धांत था।
डाल्टन का गुणित अनुपात नियम
डाल्टन ने अपने परमाणु सिद्धांत के आधार पर गुणित अनुपात नियम (Law of Multiple Proportions) को भी समझाया।
- नियम का कथन:
- जब दो तत्व संयोजित होकर एक से अधिक यौगिक बनाते हैं, तब एक तत्व के साथ दूसरे तत्व के संयुक्त होने वाले द्रव्यमान छोटे पूर्णांकों के अनुपात में होते हैं।
- उदाहरण:
- कार्बन और ऑक्सीजन दो यौगिक बनाते हैं: कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)।
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO): 3 ग्राम कार्बन, 4 ग्राम ऑक्सीजन के साथ संयोग करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): 3 ग्राम कार्बन, 8 ग्राम ऑक्सीजन के साथ संयोग करता है।
- यहाँ, कार्बन का द्रव्यमान (3 ग्राम) निश्चित है। ऑक्सीजन के द्रव्यमान जो कार्बन के निश्चित द्रव्यमान के साथ संयोग करते हैं, वे हैं 4 ग्राम और 8 ग्राम।
- इन ऑक्सीजन द्रव्यमानों का अनुपात \(4:8 = 1:2\) है, जो एक सरल पूर्णांक अनुपात है।
- महत्व:
- यह नियम दर्शाता है कि परमाणु अविभाज्य इकाइयाँ हैं जो निश्चित अनुपात में संयोजित होती हैं।
- इसने रासायनिक अभिक्रियाओं में तत्वों के व्यवहार को समझने में मदद की।
गुणित अनुपात नियम: जब दो तत्व मिलकर एक से अधिक यौगिक बनाते हैं, तो एक तत्व के निश्चित द्रव्यमान से संयोग करने वाले दूसरे तत्व के विभिन्न द्रव्यमानों में एक सरल पूर्णांक अनुपात होता है।
इलेक्ट्रॉन की खोज (कैथोड किरणें)
डाल्टन के परमाणु के अविभाज्य होने की धारणा को जे.जे. थॉमसन और गोल्डस्टीन जैसे वैज्ञानिकों के प्रयोगों ने चुनौती दी।
- कैथोड किरण प्रयोग (गोल्डस्टीन, 1886; थॉमसन, 1897):
- एक कम दाब वाली गैस से भरी विसर्जन नली (डिस्चार्ज ट्यूब) में उच्च विभवांतर पर विद्युत प्रवाहित की गई।
- अवलोकन: कैथोड (ऋणावेशित इलेक्ट्रोड) से एक चमकीली किरण निकली, जिसे गोल्डस्टीन ने कैथोड किरण कहा।
- कैथोड किरणों के गुण:
- शुस्टर का प्रयोग: कैथोड किरण के मार्ग में धनात्मक और ऋणात्मक प्लेटें लगाई गईं।
- कैथोड किरणें धनात्मक प्लेट (एनोड) की ओर मुड़ गईं।
- इससे सिद्ध हुआ कि कैथोड किरणें ऋणावेशित कणों से बनी होती हैं।
- थॉमसन के निष्कर्ष:
- थॉमसन ने इन ऋणावेशित कणों के द्रव्यमान और आवेश की गणना की।
- उन्होंने पाया कि कैथोड किसी भी पदार्थ का बना हो, उससे निकलने वाली कैथोड किरण के कणों की प्रकृति एक जैसी रहती है।
- इन कणों को इलेक्ट्रॉन नाम दिया गया, जिन पर ऋणावेश होता है।
- इलेक्ट्रॉन प्रत्येक तत्व के परमाणु का एक अवपरमाणुक कण है।
- डाल्टन के सिद्धांत को चुनौती:
- इलेक्ट्रॉन की खोज ने डाल्टन की "परमाणु अविभाज्य है" की मान्यता को गलत साबित कर दिया।
- जे.जे. थॉमसन को 1906 में इलेक्ट्रॉन की खोज के लिए भौतिकी में नोबेल पुरस्कार मिला।
इलेक्ट्रॉन: परमाणु का एक ऋणावेशित अवपरमाणुक कण, जिसका द्रव्यमान प्रोटॉन के द्रव्यमान का लगभग \(1/1837\) गुना होता है।
प्रोटॉन की खोज (केनाल किरणें)
इलेक्ट्रॉन की खोज के बाद, परमाणु की उदासीन प्रकृति को समझने के लिए धनावेशित कणों की खोज आवश्यक हो गई।
- केनाल किरण प्रयोग (गोल्डस्टीन, 1886):
- गोल्डस्टीन ने एक संशोधित विसर्जन नली का उपयोग किया जिसमें छिद्रित कैथोड (perforated cathode) था।
- अवलोकन: कैथोड के पीछे से एक नई प्रकार की किरणें निकलीं जो कैथोड के छिद्रों से होकर गुजरीं। इन्हें एनोड किरणें या केनाल किरणें कहा गया।
- केनाल किरणों के गुण:
- ये किरणें धनावेशित कणों से बनी होती हैं।
- इनकी प्रकृति ट्यूब में भरी गैस पर निर्भर करती है। (यह कैथोड किरणों से भिन्न है, जिनकी प्रकृति इलेक्ट्रोड पदार्थ पर निर्भर नहीं करती)
- इन कणों का आवेश और द्रव्यमान अलग-अलग गैसों के लिए अलग-अलग था।
- निष्कर्ष: ये किरणें ट्यूब में भरी गैस के आयनीकरण से उत्पन्न होती हैं, जब इलेक्ट्रॉन गैस परमाणुओं से टकराकर उन्हें आयनित करते हैं।
- प्रोटॉन की पहचान:
- हाइड्रोजन गैस के साथ प्रयोग करने पर सबसे हल्के धनावेशित कण प्राप्त हुए, जिन्हें बाद में प्रोटॉन नाम दिया गया।
- प्रोटॉन पर धनावेश होता है, जो परिमाण में इलेक्ट्रॉन के आवेश के बराबर लेकिन विपरीत होता है।
- महत्व:
- केनाल किरणों की खोज ने परमाणु की उदासीन प्रकृति की व्याख्या की, यह दर्शाते हुए कि परमाणु में धनावेशित और ऋणावेशित दोनों भाग होते हैं।
- इसने परमाणु के भीतर एक और अवपरमाणुक कण, प्रोटॉन की उपस्थिति स्थापित की।
प्रोटॉन: परमाणु का एक धनावेशित अवपरमाणुक कण, जो नाभिक में मौजूद होता है और जिसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान से लगभग 1837 गुना अधिक होता है।
थॉमसन का परमाणु मॉडल
इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन की खोज के बाद, वैज्ञानिकों ने परमाणु की संरचना को समझने के लिए मॉडल प्रस्तावित करना शुरू किया। जे.जे. थॉमसन ने पहला परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।
- थॉमसन का परमाणु मॉडल (1904):
- इसे "प्लम पुडिंग मॉडल" या "तरबूज मॉडल" भी कहा जाता है।
- अवधारणा: परमाणु एक धनावेशित गोला होता है, जिसमें इलेक्ट्रॉन (ऋणावेशित कण) इस धनावेशित गोले में तरबूज के बीजों की तरह धँसे होते हैं।
- तरबूज से तुलना:
- तरबूज का लाल खाने वाला भाग धनावेश का फैलाव दर्शाता है।
- तरबूज के काले बीज ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों को दर्शाते हैं।
- उदासीनता: परमाणु में ऋणात्मक और धनात्मक आवेश परिमाण में समान होते हैं, इसलिए परमाणु वैद्युत रूप से उदासीन होता है।
- थॉमसन मॉडल की सफलताएँ:
- इसने परमाणु की वैद्युत उदासीनता की व्याख्या की।
- यह पहला मॉडल था जिसने परमाणु के भीतर उप-परमाण्विक कणों की उपस्थिति का सुझाव दिया।
- थॉमसन मॉडल की सीमाएँ:
- यह रदरफोर्ड के अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग के परिणामों की व्याख्या नहीं कर सका।
- यह परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था के बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं देता था।
- यह परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर सका।
थॉमसन के मॉडल को अक्सर तरबूज मॉडल के रूप में पूछा जाता है। इसकी मुख्य विशेषता 'धनावेशित गोले में धँसे इलेक्ट्रॉन' है।
रदरफोर्ड का अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग
अर्नेस्ट रदरफोर्ड और उनके विद्यार्थियों (गीगर और मार्सडेन) ने 1911 में परमाणु की संरचना को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया, जिसे अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग कहा जाता है।
- प्रयोग की व्यवस्था:
- उन्होंने सोने की अत्यंत महीन पन्नी (लगभग 100 नैनोमीटर पतली) पर उच्च ऊर्जा वाले धनावेशित अल्फा कणों की तेज बौछार की।
- अल्फा कण हीलियम परमाणु के नाभिक के समान होते हैं (दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन)।
- एक फोटोग्राफिक प्लेट या जिंक सल्फाइड स्क्रीन का उपयोग अल्फा कणों के विक्षेपण को देखने के लिए किया गया।
- थॉमसन मॉडल की अपेक्षाएँ:
- थॉमसन के मॉडल के अनुसार, परमाणु में धनावेश समान रूप से वितरित होता है।
- इसलिए, रदरफोर्ड को उम्मीद थी कि अल्फा कण सोने की पन्नी से थोड़े विचलित होकर सीधे निकल जाएँगे, क्योंकि धनावेश इतना फैला हुआ होगा कि वह अल्फा कणों को ज्यादा प्रतिकर्षित नहीं कर पाएगा।
- अवलोकन (जो अपेक्षाओं के विपरीत थे):
- अधिकांश अल्फा कण स्वर्ण पन्नी के आर-पार सीधे निकल गए।
- बहुत कम कण अपने मार्ग से छोटे कोणों पर विक्षेपित हुए।
- लगभग 20,000 कणों में से एक कण सोने के पत्तर से टकराकर उसी दिशा में लौट गया (180° पर विक्षेपित हुआ)।
रदरफोर्ड का प्रयोग थॉमसन के परमाणु मॉडल को गलत साबित करने वाला निर्णायक प्रयोग था।
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल
अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग के अवलोकनों के आधार पर, रदरफोर्ड ने 1911 में अपना परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।
- रदरफोर्ड के निष्कर्ष और परमाणु मॉडल:
- अधिकांश स्थान खाली: चूंकि अधिकांश अल्फा कण सीधे निकल गए, इससे पता चलता है कि परमाणु का अधिकांश भाग खाली है।
- नाभिक की उपस्थिति: बहुत कम कणों का विक्षेपण और कुछ कणों का वापस लौटना दर्शाता है कि परमाणु के केंद्र में एक अत्यंत छोटा, सघन और धनावेशित भाग होता है, जिसे उन्होंने नाभिक कहा।
- इलेक्ट्रॉनों की स्थिति: इलेक्ट्रॉन (ऋणावेशित कण) नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं।
- नाभिक का आकार: नाभिक का आकार परमाणु के आकार की तुलना में बहुत छोटा होता है (नाभिक की त्रिज्या परमाणु की त्रिज्या से लगभग \(10^5\) गुना छोटी होती है)।
- द्रव्यमान का संकेंद्रण: परमाणु का लगभग सारा द्रव्यमान नाभिक में केंद्रित होता है।
- रदरफोर्ड मॉडल की विशेषताएँ:
- परमाणु के केंद्र में एक धनावेशित नाभिक होता है।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर ग्रहों की तरह चक्कर लगाते हैं।
- परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान नाभिक में होता है।
- रदरफोर्ड मॉडल की सीमाएँ/कमियाँ:
- परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर सका: चिरसम्मत विद्युत चुम्बकीय सिद्धांत के अनुसार, वृत्ताकार कक्षा में घूमता हुआ आवेशित कण (इलेक्ट्रॉन) लगातार ऊर्जा का विकिरण करेगा और अंततः नाभिक में गिर जाएगा। इससे परमाणु अस्थिर हो जाएगा, जबकि परमाणु वास्तव में स्थिर होते हैं।
- यह इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा और वितरण के बारे में कोई जानकारी नहीं देता था।
- यह परमाणु के स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सका।
सामान्य गलती: रदरफोर्ड ने नाभिक की खोज की, लेकिन उनके मॉडल में परमाणु के स्थायित्व की समस्या थी।
बोर-बरी योजना और इलेक्ट्रॉन वितरण के नियम
रदरफोर्ड के मॉडल की कमियों को दूर करने के लिए, नील्स बोर ने 1913 में परमाणु का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया, जिसे बोर-बरी योजना के नाम से जाना जाता है (उनके सहयोगी बरी के साथ)।
- बोर के परमाणु मॉडल के मुख्य अभिगृहीत:
- स्थायी कक्षाएँ (ऊर्जा स्तर): इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर केवल कुछ निश्चित, विशेष कक्षाओं में ही चक्कर लगा सकते हैं। इन कक्षाओं को विविक्त कक्षाएँ या ऊर्जा स्तर कहते हैं।
- ऊर्जा का विकिरण नहीं: जब इलेक्ट्रॉन इन विविक्त कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं, तो वे ऊर्जा का विकिरण नहीं करते हैं। इसलिए, परमाणु स्थिर रहता है।
- ऊर्जा का अवशोषण/उत्सर्जन: इलेक्ट्रॉन केवल तभी ऊर्जा का अवशोषण या उत्सर्जन करते हैं जब वे एक ऊर्जा स्तर से दूसरे ऊर्जा स्तर में कूदते हैं।
- बोर-बरी योजना के अनुसार इलेक्ट्रॉनों का वितरण:
- इन कक्षाओं या कोशों को K, L, M, N... अक्षरों या 1, 2, 3, 4... संख्याओं से दर्शाया जाता है।
- K-कोश नाभिक के सबसे समीप होता है (n=1), उसके बाद L-कोश (n=2), M-कोश (n=3) और N-कोश (n=4) आते हैं।
- इलेक्ट्रॉन वितरण के नियम (बोर-बरी नियम):
- अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या: किसी भी कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या को सूत्र \(2n^2\) द्वारा दर्शाया जाता है, जहाँ 'n' कक्षा की संख्या (या कोश संख्या) है।
- K-कोश (n=1): \(2 \times 1^2 = 2\) इलेक्ट्रॉन
- L-कोश (n=2): \(2 \times 2^2 = 8\) इलेक्ट्रॉन
- M-कोश (n=3): \(2 \times 3^2 = 18\) इलेक्ट्रॉन
- N-कोश (n=4): \(2 \times 4^2 = 32\) इलेक्ट्रॉन
- बाहरी कक्षा में अधिकतम इलेक्ट्रॉन: सबसे बाहरी कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या 8 हो सकती है (अपवाद: K-कोश जब बाह्यतम कोश हो, तो इसमें अधिकतम 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं)।
- कक्षाओं का क्रमबद्ध भराव: किसी परमाणु की दी गई कक्षा में इलेक्ट्रॉन तब तक स्थान नहीं लेते हैं, जब तक कि उससे पहले वाली भीतरी कक्षा पूर्ण रूप से भर नहीं जाती। इससे स्पष्ट होता है कि कक्षाएँ क्रमानुसार भरती हैं।
- अंतिम से पहले की कक्षा: अंतिम से पहले की कक्षा में (यदि उसकी क्षमता 8 से अधिक है) नौवां इलेक्ट्रॉन तब तक प्रवेश नहीं कर सकता जब तक कि अंतिम कक्षा में 2 इलेक्ट्रॉन न भर जाएँ।
- उदाहरण: कैल्शियम (परमाणु क्रमांक 20) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 2, 8, 8, 2 है, न कि 2, 8, 9, 1।
- संयोजी इलेक्ट्रॉन:
- किसी परमाणु की सबसे बाहरी कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों को संयोजी इलेक्ट्रॉन कहते हैं।
- यह कक्षा संयोजी कक्षा कहलाती है।
- संयोजी इलेक्ट्रॉन किसी तत्व के रासायनिक गुणों और उसकी संयोजकता को निर्धारित करते हैं।
किसी कक्षा में अधिकतम इलेक्ट्रॉन: \(2n^2\)
बोर-बरी योजना परमाणु के स्थायित्व और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की व्याख्या करने में सफल रही।
परमाणु संख्या, द्रव्यमान संख्या और न्यूट्रॉन की खोज
परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन के अलावा एक और अवपरमाणुक कण मौजूद होता है।
- न्यूट्रॉन की खोज (जे. चैडविक, 1932):
- जे. चैडविक ने एक और अवपरमाणुक कण की खोज की, जिसका द्रव्यमान प्रोटॉन के बराबर था, लेकिन उस पर कोई आवेश नहीं था (अनावेशित)।
- इस कण को न्यूट्रॉन कहा गया।
- न्यूट्रॉन हाइड्रोजन को छोड़कर सभी परमाणुओं के नाभिक में पाया जाता है।
- परमाणु के अवपरमाणुक कणों का सारांश:
- इलेक्ट्रॉन (e⁻): ऋणावेशित, नाभिक के बाहर कक्षाओं में।
- प्रोटॉन (p⁺): धनावेशित, नाभिक में।
- न्यूट्रॉन (n⁰): अनावेशित, नाभिक में।
- परमाणु संख्या (Z):
- किसी परमाणु में उपस्थित कुल प्रोटॉनों की संख्या को परमाणु संख्या कहते हैं।
- इसे Z द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
- एक उदासीन परमाणु में, प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या होती है। इसलिए, परमाणु संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या के भी बराबर होती है।
- परमाणु संख्या ही किसी तत्व की पहचान होती है।
- द्रव्यमान संख्या (A):
- परमाणु का लगभग सारा द्रव्यमान उसके नाभिक में केंद्रित होता है।
- परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की कुल संख्या के योग को द्रव्यमान संख्या कहते हैं।
- द्रव्यमान संख्या (A) = प्रोटॉनों की संख्या (Z) + न्यूट्रॉनों की संख्या (N)
- न्यूट्रॉनों की संख्या (N) = द्रव्यमान संख्या (A) - प्रोटॉनों की संख्या (Z)
- द्रव्यमान संख्या को मापने की इकाई u (unified mass) है।
- नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को सामूहिक रूप से न्यूक्लियॉन कहते हैं।
- तत्व का प्रतीकात्मक निरूपण:
- किसी परमाणु को दर्शाने के लिए परमाणु संख्या, द्रव्यमान संख्या और तत्व का प्रतीक इस प्रकार लिखा जाता है:
$$^A_Z X$$ जहाँ, X = तत्व का प्रतीक, A = द्रव्यमान संख्या, Z = परमाणु संख्या
- उदाहरण: सोडियम की परमाणु संख्या 11 और द्रव्यमान संख्या 23 है, इसे \(^{23}_{11}Na\) लिखते हैं।
- परमाणु का आकार:
- परमाणु का नाभिक परमाणु से लगभग \(10^5\) गुना छोटा होता है।
- उदाहरण: यदि परमाणु का आकार \(1.86 \times 10^{-10}\) मीटर है, तो नाभिक का आकार लगभग \(1.86 \times 10^{-15}\) मीटर होगा।
न्यूट्रॉन की खोज ने परमाणु के द्रव्यमान की व्याख्या करने में मदद की, क्योंकि प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान का योग परमाणु के कुल द्रव्यमान से कम था।
समस्थानिक और उनके उपयोग
कुछ तत्वों के परमाणुओं में प्रोटॉनों की संख्या समान होती है, लेकिन न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है, जिससे उनकी द्रव्यमान संख्या भिन्न हो जाती है।
- समस्थानिक (Isotopes):
- एक ही तत्व के ऐसे परमाणु जिनकी परमाणु संख्या समान (प्रोटॉनों की संख्या समान) होती है, किंतु द्रव्यमान संख्या भिन्न-भिन्न (न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न) होती है, एक दूसरे के समस्थानिक कहलाते हैं।
- चूंकि परमाणु संख्या समान होती है, इसलिए समस्थानिकों के रासायनिक गुणधर्म समान होते हैं।
- भौतिक गुणधर्म (जैसे घनत्व, गलनांक) भिन्न हो सकते हैं।
- उदाहरण:
- कार्बन: कार्बन-12 (\(^{12}_6C\)) और कार्बन-14 (\(^{14}_6C\))
- कार्बन-12 में 6 प्रोटॉन, 6 न्यूट्रॉन।
- कार्बन-14 में 6 प्रोटॉन, 8 न्यूट्रॉन।
- क्लोरीन: क्लोरीन-35 (\(^{35}_{17}Cl\)) और क्लोरीन-37 (\(^{37}_{17}Cl\))
- क्लोरीन-35 में 17 प्रोटॉन, 18 न्यूट्रॉन।
- क्लोरीन-37 में 17 प्रोटॉन, 20 न्यूट्रॉन।
- हाइड्रोजन: प्रोटियम (\(^{1}_1H\)), ड्यूटेरियम (\(^{2}_1H\)), ट्राइटियम (\(^{3}_1H\))
- समस्थानिकों के उपयोग:
- कैंसर के उपचार में: कोबाल्ट के समस्थानिक (कोबाल्ट-60) का उपयोग।
- घेंघा रोग के निदान में: आयोडीन के समस्थानिक (आयोडीन-131) का उपयोग।
- परमाणु भट्टी में ईंधन के रूप में: यूरेनियम के समस्थानिक (यूरेनियम-235) का उपयोग।
- पुरातात्विक डेटिंग: कार्बन-14 का उपयोग जीवाश्मों की आयु निर्धारण में।
समस्थानिक: एक ही तत्व के परमाणु जिनकी परमाणु संख्या समान लेकिन द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है।
सापेक्षिक परमाणु भार और औसत परमाणु भार
परमाणु का द्रव्यमान बहुत कम होता है, इसलिए इसे सीधे मापना मुश्किल होता है। इसके बजाय, सापेक्षिक परमाणु भार का उपयोग किया जाता है।
- सापेक्षिक परमाणु भार (Relative Atomic Weight):
- डाल्टन ने सबसे पहले सापेक्षिक परमाणु भार की अवधारणा दी।
- प्रारंभ में, हाइड्रोजन परमाणु के भार को एक इकाई माना गया, क्योंकि यह सबसे हल्का परमाणु था।
- बाद में, ऑक्सीजन को मानक बनाया गया क्योंकि यह अधिक तत्वों के साथ क्रिया करता है।
- वर्तमान मानक: आजकल, कार्बन-12 समस्थानिक के एक परमाणु के द्रव्यमान के \(1/12\)वें भाग को एक परमाणु द्रव्यमान इकाई (atomic mass unit, u) के रूप में परिभाषित किया गया है। सभी तत्वों के परमाणु भार इसी मानक के सापेक्ष ज्ञात किए जाते हैं।
- औसत परमाणु भार (Average Atomic Mass):
- प्रकृति में अधिकांश तत्वों के एक से अधिक समस्थानिक पाए जाते हैं।
- इन समस्थानिकों का प्रकृति में पाया जाने वाला प्रतिशत प्रचुरता भिन्न-भिन्न होती है।
- किसी तत्व का परमाणु भार उसके सभी प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले समस्थानिकों के सापेक्षिक प्रचुरता के औसत के रूप में गणना की जाती है।
- यही कारण है कि अधिकांश तत्वों के परमाणु भार पूर्णांक में नहीं होते हैं।
- गणना का उदाहरण (क्लोरीन):
- क्लोरीन के दो समस्थानिक हैं: क्लोरीन-35 और क्लोरीन-37।
- प्रकृति में प्रचुरता: क्लोरीन-35 (75%) और क्लोरीन-37 (25%)।
- औसत परमाणु भार \( = \left( \frac{75 \times 35}{100} \right) + \left( \frac{25 \times 37}{100} \right) \)
- \( = (0.75 \times 35) + (0.25 \times 37) \)
- \( = 26.25 + 9.25 \)
- \( = 35.5 \text{ u}\)
- अतः, क्लोरीन का औसत परमाणु भार 35.5 u होता है।
औसत परमाणु भार \( = \sum (\text{प्रत्येक समस्थानिक का द्रव्यमान} \times \text{उसकी प्रतिशत प्रचुरता}/100)\)
समभारिक
समस्थानिकों के विपरीत, कुछ परमाणुओं की द्रव्यमान संख्या समान होती है, लेकिन वे अलग-अलग तत्वों के होते हैं।
- समभारिक (Isobars):
- भिन्न-भिन्न परमाणु संख्या वाले ऐसे तत्व, जिनकी द्रव्यमान संख्या समान होती है, एक दूसरे के समभारिक कहलाते हैं।
- चूंकि इनकी परमाणु संख्या भिन्न होती है, इसलिए ये अलग-अलग तत्व होते हैं और इनके रासायनिक गुणधर्म भिन्न होते हैं।
- इनमें प्रोटॉनों की संख्या भिन्न होती है, लेकिन प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का कुल योग समान होता है।
- उदाहरण:
- कार्बन-14 (\(^{14}_6C\)) और नाइट्रोजन-14 (\(^{14}_7N\)):
- दोनों की द्रव्यमान संख्या 14 है।
- कार्बन की परमाणु संख्या 6 (6 प्रोटॉन, 8 न्यूट्रॉन)।
- नाइट्रोजन की परमाणु संख्या 7 (7 प्रोटॉन, 7 न्यूट्रॉन)।
- आर्गन-40 (\(^{40}_{18}Ar\)), पोटैशियम-40 (\(^{40}_{19}K\)) और कैल्शियम-40 (\(^{40}_{20}Ca\)):
- इन सभी की द्रव्यमान संख्या 40 है, लेकिन परमाणु संख्याएँ क्रमशः 18, 19 और 20 हैं।
समभारिक: भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या समान होती है।
| विशेषता | समस्थानिक | समभारिक | |:---------------|:---------------------------------------|:---------------------------------------| | परमाणु संख्या | समान | भिन्न | | द्रव्यमान संख्या| भिन्न | समान | | तत्व | एक ही तत्व के परमाणु | भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु | | प्रोटॉन की संख्या| समान | भिन्न | | न्यूट्रॉन की संख्या| भिन्न | भिन्न | | रासायनिक गुणधर्म| समान | भिन्न |