विद्युत धारा के रासायनिक
यह अध्याय विद्युत धारा के रासायनिक प्रभावों की पड़ताल करता है। छात्र सीखते हैं कि कौन से द्रव विद्युत के सुचालक होते हैं और कौन से हीन चालक, तथा आसुत जल और नल के जल में अंतर क्यों होता है। इसमें विद्युत अपघटन की प्रक्रिया, विद्युत लेपन के सिद्धांत और इसके विभिन्न उपयोगों को समझाया गया है। अध्याय में वोल्टीय सेल, शुष्क सेल, बटन सेल और सौर सेल जैसे विभिन्न प्रकार के सेलों की संरचना और कार्यप्रणाली का भी वर्णन किया गया है। यह छात्रों को विद्युत धारा के व्यावहारिक अनुप्रयोगों और दैनिक जीवन में इसके महत्व को समझने में मदद करता है।
विद्युत चालन करने वाले द्रव
हम जानते हैं कि कुछ ठोस पदार्थ जैसे ताँबा, ऐलुमिनियम, चाँदी विद्युत के सुचालक होते हैं, जबकि रबर, प्लास्टिक, लकड़ी हीन चालक होते हैं। द्रव भी विद्युत का चालन करते हैं या नहीं, यह उनकी संरचना पर निर्भर करता है।
- सुचालक (Good Conductors): वे पदार्थ जो अपने में से होकर विद्युत धारा को आसानी से प्रवाहित होने देते हैं।
- हीन चालक (Poor Conductors): वे पदार्थ जो अपने में से होकर विद्युत धारा को आसानी से प्रवाहित नहीं होने देते।
द्रवों में विद्युत चालन का परीक्षण:
- टेस्टर का उपयोग: विद्युत चालन की जाँच के लिए टेस्टर का उपयोग किया जाता है। यदि टेस्टर का बल्ब जलता है, तो द्रव सुचालक है; यदि नहीं जलता, तो हीन चालक है।
- चुंबकीय प्रभाव: विद्युत धारा का एक अन्य प्रभाव चुंबकीय प्रभाव है। यदि किसी चालक द्रव में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो पास रखी चुंबकीय सुई में विक्षेप होता है। यह दुर्बल धाराओं का पता लगाने में अधिक संवेदनशील होता है।
महत्वपूर्ण अवलोकन:
- आसुत जल: आसुत जल में लवण नहीं होते, इसलिए यह विद्युत का हीन चालक होता है।
- नल का जल: नल के जल, हैंडपंप के जल, कुएँ, तालाब आदि के जल में कुछ खनिज लवण घुले होते हैं। ये अशुद्धियाँ इसे विद्युत का सुचालक बनाती हैं।
- अम्ल, क्षारक और लवण के विलयन: विद्युत चालन करने वाले अधिकांश द्रव अम्लों, क्षारकों तथा लवणों के विलयन होते हैं। ये विलयन आयनों में टूट जाते हैं, जो विद्युत धारा के प्रवाह के लिए जिम्मेदार होते हैं।
सुरक्षा चेतावनी:
- हमें गीले हाथों से किसी भी विद्युत परिपथ को छूने से मना किया जाता है क्योंकि हमारे शरीर का पानी (जिसमें लवण घुले होते हैं) विद्युत का सुचालक होता है, जिससे विद्युत का झटका लग सकता है।
बल्ब का न जलना:
- कभी-कभी द्रव के सुचालक होने पर भी टेस्टर का बल्ब नहीं जलता। इसका कारण यह हो सकता है कि द्रव में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा इतनी दुर्बल हो कि बल्ब के तंतु को पर्याप्त गर्म न कर पाए। ऐसे मामलों में, चुंबकीय प्रभाव पर आधारित टेस्टर अधिक प्रभावी होता है।
सारणी 11.1: सुचालक / हीन चालक द्रव | स.क्र. | पदार्थ | चुंबकीय सुई में विक्षेप होता है / नहीं होता है | सुचालक / हीनचालक | |:-----|:-------------|:-------------------------------------------|:------------------| | 1. | नींबू का रस | होता है | सुचालक | | 2. | आसुत जल | नहीं होता है | हीन चालक | | 3. | नल का जल | होता है | सुचालक | | 4. | वनस्पति तेल | नहीं होता है | हीन चालक | | 5. | नमक का घोल | होता है | सुचालक | | 6. | शहद | नहीं होता है | हीन चालक |
विशेष परिस्थितियों में अधिकांश पदार्थों में विद्युत का चालन होता है, इसीलिए पदार्थों को चालकों और विद्युतरोधी (अचालक) में वर्गीकृत न करके, चालकों और हीन चालकों में वर्गीकृत करना अधिक सटीक है।
क्रियाकलाप –2 (चुंबकीय सुई द्वारा चालन परीक्षण)
उद्देश्य: दुर्बल विद्युत धाराओं का पता लगाने के लिए चुंबकीय प्रभाव पर आधारित टेस्टर का उपयोग करना।
प्रक्रिया का सारांश:
- माचिस की खाली डिबिया से ट्रे निकालकर उसमें एक छोटी चुंबकीय सुई रखें।
- एक चालक तार के कुछ फेरे माचिस की ट्रे पर लपेटें।
- तार के एक सिरे को बैटरी के एक टर्मिनल से जोड़ें और दूसरे सिरे को स्वतंत्र छोड़ दें।
- तार का एक दूसरा टुकड़ा लेकर उसे बैटरी के दूसरे टर्मिनल से जोड़ें।
- तार के दोनों स्वतंत्र सिरों को कुछ क्षण के लिए एक-दूसरे से स्पर्श कराएँ।
- प्रेक्षण: चुंबकीय सुई में विक्षेप होता है। यह दर्शाता है कि परिपथ में धारा प्रवाहित हो रही है।
- अब दोनों स्वतंत्र सिरों को नींबू के रस में डुबोएँ।
- प्रेक्षण: चुंबकीय सुई में विक्षेप होता है।
- निष्कर्ष: नींबू का रस सुचालक होने के कारण विद्युत का चालन करता है।
- इसी क्रियाकलाप को आसुत जल, वनस्पति तेल आदि जैसे अन्य द्रवों के साथ दोहराएँ।
- प्रेक्षण: आसुत जल और वनस्पति तेल के साथ चुंबकीय सुई में विक्षेप नहीं होता है, क्योंकि वे हीन चालक हैं।
महत्व: यह टेस्टर उन द्रवों में भी विद्युत चालन का पता लगा सकता है जहाँ धारा इतनी दुर्बल हो कि बल्ब को न जला पाए।
क्रियाकलाप - 3 (अम्ल, क्षारक, लवण विलयनों का चालन)
उद्देश्य: यह परीक्षण करना कि अम्ल, क्षारक और लवण के विलयन विद्युत का चालन करते हैं या नहीं।
प्रक्रिया का सारांश:
- प्लास्टिक या रबर के तीन बीकर/ढक्कन लें।
- तीनों में आसुत जल भरें।
- पहले बर्तन में: नींबू का रस या तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मिलाएँ।
- दूसरे बर्तन में: कास्टिक सोडा (सोडियम हाइड्रॉक्साइड) या पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड जैसे क्षारक की कुछ बूँदें मिलाएँ।
- तीसरे बर्तन में: थोड़ी चीनी डालकर घोलें।
- प्रत्येक विलयन के लिए अलग-अलग विद्युत परिपथ का निर्माण कर चालन का परीक्षण करें (बल्ब टेस्टर या चुंबकीय सुई टेस्टर का उपयोग करके)।
प्रेक्षण और निष्कर्ष:
- अम्लीय विलयन (नींबू का रस/तनु HCl): बल्ब जलेगा / चुंबकीय सुई में विक्षेप होगा।
- निष्कर्ष: अम्ल विद्युत के सुचालक होते हैं।
- क्षारीय विलयन (कास्टिक सोडा/पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड): बल्ब जलेगा / चुंबकीय सुई में विक्षेप होगा।
- निष्कर्ष: क्षारक विद्युत के सुचालक होते हैं।
- चीनी का विलयन: बल्ब नहीं जलेगा / चुंबकीय सुई में विक्षेप नहीं होगा।
- निष्कर्ष: चीनी का विलयन विद्युत का हीन चालक होता है (क्योंकि चीनी आयनित नहीं होती)।
सामान्य निष्कर्ष:
- विद्युत चालन करने वाले अधिकांश द्रव अम्लों, क्षारकों तथा लवणों के विलयन होते हैं। ये पदार्थ जल में घुलकर आयनों में वियोजित हो जाते हैं, जो विद्युत आवेश के वाहक के रूप में कार्य करते हैं।
विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव
जब विद्युत धारा किसी विद्युत सुग्राही (चालक) द्रव या विलयन में प्रवाहित की जाती है, तो द्रव में रासायनिक परिवर्तन होते हैं। इसी घटना को विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव कहते हैं।
प्रक्रिया (विद्युत अपघटन):
- एक पात्र में विद्युत सुग्राही विलयन (विद्युत अपघट्य) लिया जाता है।
- इसमें धातु की दो छड़ें (इलेक्ट्रोड) डुबोई जाती हैं।
- एक इलेक्ट्रोड को सेल/बैटरी के धनात्मक सिरे (एनोड) से और दूसरे को ऋणात्मक सिरे (कैथोड) से जोड़ा जाता है।
- धारा प्रवाहित होने पर, विद्युत अपघट्य अपने अवयवों में विभाजित हो जाता है।
रासायनिक प्रभावों के लक्षण:
- इलेक्ट्रोडों पर गैस के बुलबुले बनना।
- किसी धातु का इलेक्ट्रोड पर एकत्रित हो जाना।
- विलयन के रंग में परिवर्तन होना।
- ये सभी लक्षण एक साथ या कोई एक दिखाई दे सकता है।
वोल्टामीटर:
- विद्युत अपघटन की प्रक्रिया में प्रयुक्त उपकरण को वोल्टामीटर कहते हैं।
- एनोड: वोल्टामीटर का वह सिरा जो सेल के धन ध्रुव से जुड़ा होता है।
- कैथोड: वोल्टामीटर का वह सिरा जो सेल के ऋण ध्रुव से जुड़ा होता है।
- धारा की दिशा:
- बाह्य परिपथ में: एनोड से कैथोड की ओर।
- विलयन के अंदर: कैथोड से एनोड की ओर (आयनों के प्रवाह के कारण)।
उदाहरण:
- अम्लीय जल का विद्युत अपघटन: यदि किसी पात्र में अम्लीय जल (पानी और सल्फ्यूरिक अम्ल की कुछ बूँदें) लेकर उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाए, तो जल का विद्युत अपघटन होता है।
- जल अपने अवयवों (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैस) में विघटित हो जाता है।
- कैथोड पर हाइड्रोजन गैस और एनोड पर ऑक्सीजन गैस के बुलबुले बनते हैं।
- प्रतिक्रिया: \(2H_2O \xrightarrow{\text{विद्युत धारा}} 2H_2(g) + O_2(g)\)
- नमक के घोल का विद्युत अपघटन: नमक के घोल में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर उसका विघटन सोडियम और क्लोरीन गैस में हो जाता है।
निष्कर्ष: विलयन में हो रहे इन परिवर्तनों को रासायनिक परिवर्तन कहते हैं।
विद्युत अपघटन (Electrolysis): वह प्रक्रिया जिसमें विद्युत धारा का उपयोग करके किसी यौगिक को उसके घटकों में विघटित किया जाता है।
फल एवं वनस्पतियों द्वारा विद्युत चालन
उद्देश्य: यह परीक्षण करना कि फल और सब्जियाँ विद्युत का चालन करती हैं और रासायनिक प्रभाव उत्पन्न करती हैं।
क्रियाकलाप (आलू का परीक्षण):
- एक आलू को दो बराबर भागों में काटें।
- एक विद्युत परिपथ तैयार करें जिसमें बैटरी और चुंबकीय सुई टेस्टर शामिल हों।
- टेस्टर के दोनों स्वतंत्र तारों को आलू के कटे हुए भाग में थोड़ा अंदर तक डालें (एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर)।
- कुछ समय पश्चात् अवलोकन करें।
प्रेक्षण:
- आप देखेंगे कि आलू में एक तार के चारों ओर नीला-हरा सा धब्बा बन जाता है।
- दूसरे तार के चारों ओर ऐसा कोई धब्बा नहीं बनता है।
- यह नीला-हरा धब्बा हमेशा बैटरी के धन ध्रुव (एनोड) से जुड़े इलेक्ट्रोड पर ही बनता है।
निष्कर्ष:
- यह प्रेक्षण दर्शाता है कि आलू में से होकर विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
- विद्युत धारा आलू में रासायनिक प्रभाव उत्पन्न करती है, जिसके कारण एनोड पर रासायनिक अभिक्रिया होती है और नीला-हरा धब्बा बनता है।
- यह दर्शाता है कि कुछ फल और सब्जियाँ भी विद्युत के चालक हो सकते हैं, क्योंकि उनमें आयनित लवण और अम्ल मौजूद होते हैं।
विद्युत लेपन
आपने नई साइकिल, मोटर साइकिल, कार या आभूषणों को चमकते हुए देखा होगा। यह चमक अक्सर एक पतली धातु की परत के कारण होती है। जब यह परत हट जाती है, तो नीचे की धातु उतनी चमकदार नहीं दिखती।
विद्युत लेपन (Electroplating) वह प्रक्रिया है जिसमें विद्युत धारा का उपयोग करके किसी एक पदार्थ पर किसी दूसरी धातु की पतली परत चढ़ाई जाती है।
विद्युत लेपन की प्रक्रिया (उदाहरण: कॉपर सल्फेट विलयन में):
- एक बीकर में कॉपर सल्फेट का विलयन लें। चालकता बढ़ाने के लिए इसमें तनु सल्फ्यूरिक अम्ल की कुछ बूँदें मिलाएँ।
- ताँबे की दो प्लेटें (10 cm x 1 cm) लें और उन्हें रेगमाल से साफ करके सुखा लें।
- एक ताँबे की प्लेट को बैटरी के धन ध्रुव (एनोड) से और दूसरी ताँबे की प्लेट को बैटरी के ऋण ध्रुव (कैथोड) से संयोजित करें।
- दोनों प्लेटों को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोएँ और लगभग 15 मिनट तक विद्युत धारा प्रवाहित करें।
प्रेक्षण:
- ऋण ध्रुव (कैथोड) से जुड़ी प्लेट पर ताँबे की एक पतली परत जमा हो जाती है।
- यह परत बैटरी के ऋण ध्रुव से जुड़ी प्लेट पर ही बनती है।
प्रक्रिया की व्याख्या:
- जब कॉपर सल्फेट \((CuSO_4)\) के विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह कॉपर आयनों \((Cu^{2+})\) और सल्फेट आयनों \((SO_4^{2-})\) में अपघटित हो जाता है।
- स्वतंत्र कॉपर आयन \((Cu^{2+})\) धनात्मक होने के कारण बैटरी के ऋण ध्रुव (कैथोड) से जुड़ी प्लेट की ओर आकर्षित होते हैं।
- कैथोड पर, कॉपर आयन इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके धातु कॉपर के रूप में अवक्षेपित हो जाते हैं और प्लेट पर जमा हो जाते हैं।
- \(Cu^{2+} + 2e^- \rightarrow Cu\)
- विलयन में कॉपर आयनों की कमी होती जाती है। इस कमी की पूर्ति धन ध्रुव (एनोड) से जुड़ी ताँबे की प्लेट से होती है।
- एनोड पर, ताँबे धातु के परमाणु इलेक्ट्रॉन त्यागकर कॉपर आयनों \((Cu^{2+})\) के रूप में विलयन में घुल जाते हैं।
- \(Cu \rightarrow Cu^{2+} + 2e^-\)
- इस प्रकार, विलयन में कॉपर आयनों की सांद्रता लगभग स्थिर बनी रहती है, और ताँबे का लगातार एक इलेक्ट्रोड से दूसरे इलेक्ट्रोड पर स्थानांतरण होता रहता है।
- यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- यदि इलेक्ट्रोडों को आपस में बदल दिया जाए, तो दूसरी प्लेट पर कॉपर की परत एकत्रित होगी।
- विद्युत लेपन द्वारा सस्ती धातु पर महंगी धातु की परत चढ़ाई जा सकती है (जैसे कार्बन की छड़ पर ताँबे की परत)।
विद्युत लेपन (Electroplating): विद्युत धारा का उपयोग करके किसी पदार्थ की सतह पर किसी अन्य धातु की पतली परत जमा करने की प्रक्रिया।
विद्युत लेपन के उपयोग
विद्युत लेपन एक अत्यंत महत्वपूर्ण औद्योगिक प्रक्रिया है जिसके कई व्यावहारिक उपयोग हैं:
- सजावट और सुरक्षा (क्रोमियम लेपन):
- कार के कुछ भागों, नल की टोंटी, गैस बर्नर, साइकिल के हैंडल, पहियों के रिम आदि पर क्रोमियम का लेपन किया जाता है।
- क्रोमियम महंगा होता है, इसलिए पूरी वस्तु को इससे बनाने के बजाय, सस्ती धातु पर इसकी पतली परत चढ़ाई जाती है।
- यह वस्तु को चमकदार, आकर्षक बनाता है और जंग लगने से बचाता है।
- आभूषण निर्माण:
- सस्ती धातुओं (जैसे पीतल, ताँबा) पर सोने या चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं की पतली परत चढ़ाकर आभूषण बनाए जाते हैं।
- यह आभूषणों को महंगा दिखाए बिना उन्हें सुंदर और आकर्षक बनाता है।
- धातु शोधन और शुद्धिकरण:
- विद्युत लेपन की प्रक्रिया का उपयोग धातु अयस्क से शुद्ध धातु प्राप्त करने में किया जाता है।
- विद्युत अपघटन का उपयोग अशुद्ध धातुओं से शुद्ध धातु प्राप्त करने में भी किया जाता है।
- खाद्य पदार्थों का भंडारण (टिन लेपन):
- खाद्य पदार्थों के भंडारण के लिए उपयोग में लाए जाने वाले डिब्बों में लोहे के ऊपर टिन का विद्युत लेपन किया जाता है।
- टिन लोहे की तुलना में कम क्रियाशील होता है, इसलिए टिन की परत चढ़ाने पर खाद्य पदार्थ लोहे के सीधे संपर्क में नहीं आते हैं, जिससे वे सुरक्षित रहते हैं और खराब नहीं होते।
- जंग से बचाव (जिंक लेपन/गैल्वनीकरण):
- पुलों तथा स्वचालित वाहनों को मजबूत बनाने के लिए लोहे का उपयोग किया जाता है।
- लोहे को जंग (संक्षारण) से बचाने के लिए उस पर जिंक की परत चढ़ाई जाती है। इस प्रक्रिया को गैल्वनीकरण भी कहते हैं। जिंक की परत लोहे को नमी और ऑक्सीजन के संपर्क में आने से रोकती है।
महत्व: विद्युत लेपन वस्तुओं को संक्षारण से बचाता है, घिसाव को कम करता है, उनकी दिखावट में सुधार करता है और महंगी धातुओं का उपयोग किए बिना उन्हें बहुमूल्य धातुओं जैसा रूप देता है। यह विभिन्न उद्योगों में एक अनिवार्य प्रक्रिया है।
विद्युत लेपन के उपयोग अक्सर बोर्ड परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। कम से कम तीन उपयोगों को उदाहरणों सहित याद रखें।
वोल्टीय सेल
विद्युत धारा प्राप्त करने के लिए हम दैनिक जीवन में सेल या बैटरी का उपयोग करते हैं।
वोल्टीय सेल (Voltaic Cell) / गैल्वेनिक सेल:
- आविष्कार: सन् 1796 ई. में इटली के वैज्ञानिक आलेसान्द्रो वोल्टा द्वारा।
- सिद्धांत: भिन्न-भिन्न धातु की दो प्लेटों को किसी अम्लीय विलयन में डुबाने पर उनके बीच विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
- घटक:
- इलेक्ट्रोड: भिन्न-भिन्न धातु की दो प्लेटें।
- एनोड (धन ध्रुव): ताँबे की प्लेट (अधिक क्रियाशील धातु की तुलना में कम क्रियाशील)।
- कैथोड (ऋण ध्रुव): जस्ते की प्लेट (अधिक क्रियाशील धातु)।
- विद्युत अपघट्य: अम्लीय विलयन, जैसे तनु सल्फ्यूरिक अम्ल।
- कार्यप्रणाली:
- जस्ता (Zn) ताँबे (Cu) की तुलना में अधिक क्रियाशील होता है।
- जब जस्ते की प्लेट को तनु सल्फ्यूरिक अम्ल में डुबोया जाता है, तो जस्ता इलेक्ट्रॉन त्यागकर \(Zn^{2+}\) आयन के रूप में विलयन में चला जाता है, जिससे जस्ते की प्लेट पर ऋणात्मक आवेश आ जाता है (कैथोड)।
- ताँबे की प्लेट पर विलयन में मौजूद \(H^+\) आयन इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके हाइड्रोजन गैस बनाते हैं, जिससे ताँबे की प्लेट पर धनात्मक आवेश आ जाता है (एनोड)।
- बाहरी परिपथ में, इलेक्ट्रॉन जस्ते की प्लेट से ताँबे की प्लेट की ओर प्रवाहित होते हैं, जिससे विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
- बैटरी: अधिक विद्युत धारा प्राप्त करने के लिए दो या दो से अधिक सेलों को श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है। इस व्यवस्था में, एक सेल का धन सिरा अगले सेल के ऋण सिरे से जुड़ा होता है। सेलों की इस श्रेणी को बैटरी कहते हैं।
- मृत सेल: जब किसी सेल का सम्पूर्ण क्रियाकारक, क्रियाफल में बदल जाता है, तब उसमें से धारा प्राप्त करना संभव नहीं होता। ऐसे सेल को मृत सेल कहा जाता है और यह अनुपयोगी हो जाता है।
वोल्टीय सेल में, जस्ते की प्लेट कैथोड (ऋण ध्रुव) और ताँबे की प्लेट एनोड (धन ध्रुव) होती है। विद्युत अपघट्य के रूप में तनु सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग किया जाता है।
शुष्क सेल की बनावट और कार्यप्रणाली
शुष्क सेल (Dry Cell):
- उपयोग: टॉर्च, ट्रांजिस्टर, रेडियो, कैलकुलेटर और खिलौनों जैसे पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उपयोग किया जाता है।
- विशेषता: इसे 'शुष्क' सेल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें तरल विद्युत अपघट्य के बजाय पेस्ट के रूप में विद्युत अपघट्य का उपयोग होता है, जिससे यह लीक होने से बचता है और इसे कहीं भी ले जाना आसान होता है।
शुष्क सेल की आंतरिक बनावट:
- जिंक का बेलनाकार पात्र: यह सेल का सबसे बाहरी आवरण होता है और ऋण इलेक्ट्रोड (एनोड) के रूप में कार्य करता है।
- कार्बन की छड़: पात्र के केंद्र में स्थित होती है और धन इलेक्ट्रोड (कैथोड) के रूप में कार्य करती है। इसके ऊपरी सिरे पर पीतल की टोपी लगी होती है।
- विद्युत अपघट्य पेस्ट: जिंक पात्र के अंदर नौसादर (अमोनियम क्लोराइड), जिंक क्लोराइड और प्लास्टर ऑफ पेरिस का एक पेस्ट भरा होता है। यह आयनों के प्रवाह को संभव बनाता है।
- मैंगनीज डाइऑक्साइड मिश्रण: कार्बन की छड़ के चारों ओर मलमल की एक थैली में मैंगनीज डाइऑक्साइड \((MnO_2)\), कार्बन चूर्ण, नौसादर और जिंक क्लोराइड का मिश्रण भरा रहता है। मैंगनीज डाइऑक्साइड विध्रुवक (depolarizer) का कार्य करता है, जो हाइड्रोजन गैस को ऑक्सीजन में परिवर्तित करके सेल के जीवनकाल को बढ़ाता है।
- सीलिंग: पात्र के मुख को चपड़े या पिच से बंद कर दिया जाता है, जिसमें एक बारीक छिद्र होता है ताकि अंदर बनने वाली गैस बाहर निकल सके।
कार्यप्रणाली:
- जिंक (एनोड) इलेक्ट्रॉन त्यागता है और ऑक्सीकृत होता है।
- कार्बन छड़ (कैथोड) पर, अमोनियम आयन इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं और हाइड्रोजन गैस बनाते हैं।
- मैंगनीज डाइऑक्साइड इस हाइड्रोजन गैस को जल में परिवर्तित कर देता है, जिससे ध्रुवण (polarization) रुकता है।
- इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह जिंक से कार्बन छड़ की ओर बाहरी परिपथ में होता है, जिससे विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
बैटरी: दो या दो से अधिक शुष्क सेलों को श्रेणी क्रम में जोड़कर बैटरी बनाई जाती है, जिससे अधिक विद्युत धारा प्राप्त की जा सके।
मृत सेल: जब सेल में रासायनिक अभिक्रिया के लिए आवश्यक पदार्थ समाप्त हो जाते हैं, तो वह 'मृत सेल' हो जाता है और विद्युत धारा उत्पन्न करना बंद कर देता है।
शुष्क सेल में, जिंक का पात्र ऋण इलेक्ट्रोड (एनोड) और कार्बन की छड़ धन इलेक्ट्रोड (कैथोड) होती है। विद्युत अपघट्य अमोनियम क्लोराइड, जिंक क्लोराइड और प्लास्टर ऑफ पेरिस का पेस्ट होता है।
बटन सेल और सौर सेल
बटन सेल (Button Cell):
- आकार: यह एक छोटा, चपटा शुष्क सेल है जो एक बटन की तरह दिखाई देता है।
- घटक:
- एनोड (धन ध्रुव): जिंक या ऐलुमिनियम।
- कैथोड (ऋण ध्रुव): सिल्वर ऑक्साइड या मरकरी ऑक्साइड।
- विद्युत अपघट्य: सोडियम या पोटैशियम ऑक्साइड।
- विशेषताएँ: आकार में छोटे, सस्ते, अधिक समय तक चलने वाले और अधिक शक्तिशाली होते हैं।
- उपयोग: कैलकुलेटर, घड़ियों, श्रवण सहायों (हियरिंग एड), छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में।
सौर सेल (Solar Cell):
- कार्य: सौर सेल अपने ऊपर पड़ने वाली सौर ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। यह प्रक्रिया फोटोवोल्टिक प्रभाव पर आधारित है।
- बनावट: एक साधारण सौर सेल सिलिकॉन की दो परतों से बना होता है:
- निचली परत (p-प्रकार): इसमें थोड़ी मात्रा में आर्सेनिक मिलाया जाता है, जिससे यह धनात्मक (p-प्रकार) हो जाती है।
- ऊपरी परत (n-प्रकार): इसमें बहुत कम मात्रा में बोरॉन मिलाया जाता है, जिससे यह ऋणावेशित (n-प्रकार) हो जाती है।
- कार्यप्रणाली:
- जब इन परतों पर प्रकाश पड़ता है, तो प्रकाश ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों को उत्तेजित करती है।
- दोनों परतों के बीच एक विद्युत परिपथ जोड़ने पर, इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह होता है और एक क्षीण विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है।
- सौर पैनल: अधिक विद्युत धारा प्राप्त करने के लिए कई सौर सेलों को एक साथ जोड़ा जाता है, जिन्हें सौर पैनल या सौर मॉड्यूल कहते हैं।
- उपयोग: कृत्रिम उपग्रहों, सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों, घरों में बिजली उत्पादन, स्ट्रीट लाइट आदि में।
सौर सेल सिलिकॉन की p-प्रकार और n-प्रकार परतों से बने होते हैं, जो प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं।