प्रकाश का अपवर्तन
अध्याय 'प्रकाश का अपवर्तन' छात्रों को प्रकाश के मुड़ने की घटना से परिचित कराता है जब वह एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करता है। इसमें अपवर्तन के नियम, अपवर्तनांक की अवधारणा, विभिन्न प्रकार के लेंस (उत्तल और अवतल) और उनसे बनने वाले प्रतिबिंबों का विस्तृत अध्ययन शामिल है। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय मानव नेत्र की संरचना और कार्यप्रणाली के साथ-साथ निकट दृष्टि दोष और दूर दृष्टि दोष जैसे सामान्य दृष्टि दोषों और उनके निवारण के तरीकों पर भी प्रकाश डालता है। यह छात्रों को दैनिक जीवन में प्रकाशिकी के अनुप्रयोगों को समझने में मदद करता है।
अपवर्तन
प्रकाश का अपवर्तन वह घटना है जब प्रकाश की किरण एक प्रकाशीय माध्यम से दूसरे प्रकाशीय माध्यम में प्रवेश करती है और अपने मूल पथ से विचलित हो जाती है या मुड़ जाती है।
- प्रकाशीय माध्यम: वे पारदर्शी पदार्थ जिनसे प्रकाश किरणें आसानी से गुजर सकती हैं, जैसे हवा, पानी, काँच।
- विरल माध्यम: वह माध्यम जिसमें प्रकाश की चाल अधिक होती है (जैसे हवा)।
- सघन माध्यम: वह माध्यम जिसमें प्रकाश की चाल कम होती है (जैसे पानी, काँच)।
- अपवर्तन का कारण: विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल का भिन्न-भिन्न होना।
- जब प्रकाश विरल माध्यम से सघन माध्यम में जाता है, तो उसकी चाल कम हो जाती है और वह अभिलंब की ओर मुड़ता है।
- जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाता है, तो उसकी चाल बढ़ जाती है और वह अभिलंब से दूर मुड़ता है।
- दैनिक जीवन के उदाहरण:
- पानी में डूबी पेंसिल का मुड़ा हुआ दिखना।
- पानी से भरे गिलास में सिक्के का ऊपर उठा हुआ दिखना। [IMAGE: cg_c8_science_ch09_t1_scene2]
- तारे टिमटिमाते हुए दिखना।
क्रियाकलाप 1 और 2 से निष्कर्ष:
- क्रियाकलाप 1 (दूधिया पानी में प्रकाश का मुड़ना) और क्रियाकलाप 2 (सिक्के का ऊपर उठना) दोनों ही प्रकाश के अपवर्तन की घटना को दर्शाते हैं।
- ये क्रियाकलाप सिद्ध करते हैं कि प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर अपना पथ बदलता है।
अपवर्तन (Refraction): जब प्रकाश की किरण एक प्रकाशीय माध्यम से दूसरे प्रकाशीय माध्यम में प्रवेश करती है, तो वह दोनों माध्यमों के संपर्क तल पर अपने मार्ग से विचलित हो जाती है। इस घटना को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।
प्रकाश की चाल हवा में लगभग \(3 \times 10^8\) मीटर प्रति सेकंड होती है, जो कि किसी भी अन्य माध्यम की तुलना में अधिक होती है।
काँच के गुटके से प्रकाश का अपवर्तन
काँच के आयताकार गुटके से प्रकाश के अपवर्तन को समझने के लिए, हम एक प्रयोग का विश्लेषण करते हैं।
- प्रयोग की व्यवस्था:
- एक समतल दर्पण की पट्टी पर काली झिरी बनाकर पतली प्रकाश किरण प्राप्त करना।
- सफेद कागज पर काँच का गुटका रखकर उसकी आकृति बनाना।
- आपतन बिंदु O पर अभिलंब \(M_1M_2\) खींचना।
- प्रकाश किरण AB को आपतन बिंदु O पर आपतित करना।
- अवलोकन:
- किरण AB हवा (विरल माध्यम) से काँच (सघन माध्यम) में प्रवेश करती है और अभिलंब \(M_1M_2\) की ओर झुक जाती है, OP दिशा में अपवर्तित होती है।
- किरण OP काँच (सघन माध्यम) से हवा (विरल माध्यम) में प्रवेश करती है और अभिलंब \(N_1N_2\) से दूर हट जाती है, CD दिशा में निर्गमित होती है।
- महत्वपूर्ण कोण:
- आपतन कोण (\(\angle i\)): आपतित किरण AB और अभिलंब \(M_1M_2\) के बीच का कोण।
- अपवर्तन कोण (\(\angle r\)): अपवर्तित किरण OP और अभिलंब \(M_1M_2\) के बीच का कोण।
- निर्गमन कोण (\(\angle e\)): निर्गमित किरण CD और अभिलंब \(N_1N_2\) के बीच का कोण।
- अपवर्तन के नियम (काँच के गुटके के संदर्भ में):
- जब प्रकाश विरल माध्यम (हवा) से सघन माध्यम (काँच) में जाता है, तो वह अभिलंब की ओर मुड़ता है, यानी \(\angle r < \angle i\)।
- जब प्रकाश सघन माध्यम (काँच) से विरल माध्यम (हवा) में जाता है, तो वह अभिलंब से दूर हटता है, यानी \(\angle e > \angle r\)।
- यदि प्रकाश किरण अभिलंब की दिशा में आपतित होती है (यानी \(\angle i = 0^\circ\)), तो वह बिना मुड़े सीधी निकल जाती है (यानी \(\angle r = 0^\circ\))।
- आपतित किरण, अपवर्तित किरण और दोनों माध्यमों को पृथक करने वाले पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभिलंब, सभी एक ही तल में होते हैं।
- पार्श्विक विस्थापन (Lateral Displacement): काँच के गुटके से अपवर्तन के बाद निर्गमित किरण, आपतित किरण के समानांतर होती है लेकिन अपने मूल पथ से थोड़ी विस्थापित हो जाती है। इस विस्थापन को पार्श्विक विस्थापन कहते हैं।
काँच के गुटके से अपवर्तन के किरण आरेख को बनाना और विभिन्न कोणों (आपतन, अपवर्तन, निर्गमन) को सही ढंग से नामांकित करना परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
अपवर्तनांक
अपवर्तनांक (Refractive Index) एक भौतिक राशि है जो यह बताती है कि प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर कितनी विचलित होगी। यह माध्यम के प्रकाशीय घनत्व का माप है।
- परिभाषा: किसी माध्यम का अपवर्तनांक प्रकाश की निर्वात (या हवा) में चाल और उस माध्यम में प्रकाश की चाल के अनुपात के बराबर होता है।
- सूत्र: \(\mu = \frac{\text{प्रकाश की निर्वात में चाल (c)}}{\text{प्रकाश की माध्यम में चाल (v)}}\)
- इसे ग्रीक अक्षर '\(\mu\)' (म्यू) से दर्शाया जाता है।
- सापेक्ष अपवर्तनांक: जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाता है, तो हम एक माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक ज्ञात करते हैं।
- माध्यम 1 के सापेक्ष माध्यम 2 का अपवर्तनांक \(\mu_{21} = \frac{\text{माध्यम 1 में प्रकाश की चाल}}{\text{माध्यम 2 में प्रकाश की चाल}}\)
- अपवर्तनांक और विचलन:
- यदि \(\mu > 1\): प्रकाश विरल माध्यम से सघन माध्यम में जा रहा है और अभिलंब की ओर मुड़ेगा।
- यदि \(\mu < 1\): प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जा रहा है और अभिलंब से दूर हटेगा।
- यदि \(\mu = 1\): प्रकाश की चाल में कोई परिवर्तन नहीं होता, यानी माध्यम समान हैं या प्रकाश निर्वात में है।
- अपवर्तनांक की गणना (क्रियाकलाप 5):
- आपतन बिंदु O पर एक वृत्त खींचकर आपतित किरण (A) और अपवर्तित किरण (F) के कटान बिंदु प्राप्त करें।
- बिंदु A और F से अभिलंब \(M_1M_2\) पर लंब AX और FY खींचें।
- अपवर्तनांक \(\mu = \frac{AX}{FY}\)
- यह मान आपतन कोण पर निर्भर नहीं करता, बल्कि दोनों प्रकाशीय माध्यमों की प्रकृति पर निर्भर करता है। हवा से काँच का अपवर्तनांक लगभग 1.5 होता है।
$$\mu = \frac{c}{v}$$ जहाँ \(c\) निर्वात में प्रकाश की चाल और \(v\) माध्यम में प्रकाश की चाल है।
जिस माध्यम का अपवर्तनांक अधिक होता है, वह प्रकाशीय रूप से सघन होता है, और उसमें प्रकाश की चाल कम होती है।
लेंस से अपवर्तन
लेंस एक पारदर्शी पदार्थ से बना होता है जिसके कम से कम एक पृष्ठ गोलीय होता है। इसका मुख्य कार्य प्रकाश किरणों को अपवर्तित करना है।
- लेंस के प्रकार:
- उत्तल लेंस (Convex Lens):
- बीच में मोटे और किनारों पर पतले होते हैं।
- प्रकाश किरणों को अभिसरित (एक बिंदु पर केंद्रित) करते हैं, इसलिए इन्हें अभिसारी लेंस भी कहते हैं।
- उदाहरण: उभयोत्तल (biconvex), समतलोत्तल (plano-convex), अवतलोत्तल (concavo-convex)।
- अवतल लेंस (Concave Lens):
- बीच में पतले और किनारों पर मोटे होते हैं।
- प्रकाश किरणों को अपसरित (फैलाते) हैं, इसलिए इन्हें अपसारी लेंस भी कहते हैं।
- उदाहरण: उभयावतल (biconcave), समतलावतल (plano-concave), उत्तलावतल (convexo-concave)।
लेंस: दो पृष्ठों से घिरा हुआ पारदर्शी माध्यम जिसका कम से कम एक पृष्ठ गोलीय हो।
लेंस से संबंधित कुछ परिभाषाएँ
लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब निर्माण को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली:
- मुख्य अक्ष (Principal Axis):
- लेंस के दोनों गोलीय पृष्ठों के वक्रता केंद्रों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा।
- यह लेंस के केंद्र से होकर गुजरती है।
- प्रकाश केंद्र (Optical Centre - O):
- यह लेंस का केंद्रीय बिंदु होता है।
- प्रकाश किरणें जो प्रकाश केंद्र से होकर गुजरती हैं, वे बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती हैं। [IMAGE: light_rays_through_optical_centre_of_a_lens_fig132]
- मुख्य फोकस (Principal Focus - F):
- उत्तल लेंस में: मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली प्रकाश किरणें लेंस से अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु पर वास्तव में मिलती हैं, वह मुख्य फोकस कहलाता है।
- अवतल लेंस में: मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली प्रकाश किरणें लेंस से अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं, वह मुख्य फोकस कहलाता है।
- प्रत्येक लेंस के दो मुख्य फोकस होते हैं (\(F_1\) और \(F_2\))।
- फोकस दूरी (Focal Length - f):
- प्रकाश केंद्र (O) और मुख्य फोकस (F) के बीच की दूरी को फोकस दूरी कहते हैं।
- यह लेंस की क्षमता का माप है।
- वक्रता केंद्र (Centre of Curvature - C):
- लेंस के गोलीय पृष्ठ जिस गोले के भाग होते हैं, उन गोलों के केंद्र को वक्रता केंद्र कहते हैं।
- प्रत्येक लेंस के दो वक्रता केंद्र होते हैं (\(C_1\) और \(C_2\))। इन्हें प्रायः \(2F_1\) और \(2F_2\) से भी दर्शाया जाता है।
उत्तल लेंस में फोकस वास्तविक होता है, जबकि अवतल लेंस में आभासी।
लेंस से बने प्रतिबिम्बों की रचना के नियम
लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब निर्माण के लिए किरण आरेख बनाने हेतु तीन मुख्य नियम:
- प्रकाश केंद्र से गुजरने वाली किरण:
- जो प्रकाश किरण लेंस के प्रकाश केंद्र (O) से होकर जाती है, वह बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती है।
- यह नियम उत्तल और अवतल दोनों लेंसों पर लागू होता है।
- मुख्य अक्ष के समानांतर किरण:
- जो प्रकाश किरण मुख्य अक्ष के समानांतर आपतित होती है, वह लेंस से अपवर्तन के बाद:
- उत्तल लेंस में: मुख्य फोकस (F) से होकर गुजरती है।
- अवतल लेंस में: मुख्य फोकस (F) से आती हुई प्रतीत होती है।
- मुख्य फोकस से गुजरने वाली किरण:
- जो प्रकाश किरण मुख्य फोकस से होकर आपतित होती है (उत्तल लेंस में) या मुख्य फोकस की ओर निर्देशित होती है (अवतल लेंस में), वह लेंस से अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
क्रियाकलाप 6 (उत्तल लेंस से कागज जलाना) का महत्व:
- यह क्रियाकलाप उत्तल लेंस के अभिसारी गुण को दर्शाता है।
- सूर्य से आने वाली समानांतर किरणें उत्तल लेंस द्वारा उसके मुख्य फोकस पर केंद्रित होती हैं, जिससे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है और कागज जलने लगता है।
- यह उत्तल लेंस की फोकस दूरी ज्ञात करने का एक व्यावहारिक तरीका भी है।
किरण आरेख बनाते समय इन तीनों नियमों का सही उपयोग करना आवश्यक है। कम से कम दो किरणों का उपयोग करके प्रतिबिम्ब की स्थिति और प्रकृति ज्ञात की जा सकती है।
उत्तल लेंसों से प्रतिबिम्बों का बनना
उत्तल लेंस द्वारा बनने वाले प्रतिबिम्ब की स्थिति, आकार और प्रकृति वस्तु की लेंस से दूरी पर निर्भर करती है।
क्रियाकलाप 7 (मोमबत्ती का प्रतिबिम्ब) से निष्कर्ष:
- जैसे-जैसे वस्तु को लेंस के पास लाया जाता है, प्रतिबिम्ब दूर हटता जाता है और उसका आकार बढ़ता जाता है।
- सभी वास्तविक प्रतिबिम्ब उल्टे होते हैं।
- जब वस्तु लेंस के बहुत पास होती है (प्रकाश केंद्र और फोकस के बीच), तो वास्तविक प्रतिबिम्ब प्राप्त नहीं होता, बल्कि आभासी, सीधा और आवर्धित प्रतिबिम्ब बनता है।
विभिन्न स्थितियों में उत्तल लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब निर्माण:
| वस्तु की स्थिति | प्रतिबिम्ब की स्थिति | प्रतिबिम्ब का आकार | प्रतिबिम्ब की प्रकृति | |:---------------|:--------------------|:-------------------|:---------------------| | अनंत पर | फोकस \(F_2\) पर | अत्यधिक छोटा, बिंदु आकार | वास्तविक, उल्टा | | \(2F_1\) से परे | \(F_2\) और \(2F_2\) के बीच | छोटा | वास्तविक, उल्टा | | \(2F_1\) पर | \(2F_2\) पर | वस्तु के बराबर | वास्तविक, उल्टा | | \(F_1\) और \(2F_1\) के बीच | \(2F_2\) से परे | बड़ा | वास्तविक, उल्टा | | \(F_1\) पर | अनंत पर | अत्यधिक बड़ा | वास्तविक, उल्टा | | \(F_1\) और प्रकाश केंद्र (O) के बीच | वस्तु की ओर (लेंस के पीछे) | बड़ा | आभासी, सीधा |
वास्तविक प्रतिबिम्ब हमेशा उल्टे होते हैं और उन्हें पर्दे पर प्राप्त किया जा सकता है। आभासी प्रतिबिम्ब हमेशा सीधे होते हैं और उन्हें पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
अवतल लेंस से प्रतिबिम्ब का बनना
अवतल लेंस से बनने वाले प्रतिबिम्ब की प्रकृति वस्तु की स्थिति पर निर्भर नहीं करती।
- अवतल लेंस हमेशा आभासी, सीधा और वस्तु से छोटा प्रतिबिम्ब बनाता है, चाहे वस्तु कहीं भी रखी हो (अनंत पर या प्रकाश केंद्र और अनंत के बीच)।
- किरण आरेख नियम:
- मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली किरण अपवर्तन के बाद मुख्य फोकस से अपसरित होती हुई प्रतीत होती है।
- प्रकाश केंद्र से गुजरने वाली किरण बिना विचलन के सीधी निकल जाती है।
- मुख्य फोकस की ओर निर्देशित किरण अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
क्रियाकलाप 8 (जल की बूँद का लेंस की तरह कार्य करना) का महत्व:
- यह क्रियाकलाप दर्शाता है कि एक साधारण पारदर्शी माध्यम (जल की बूँद) भी लेंस की तरह व्यवहार कर सकता है।
- जल की बूँद उत्तल लेंस की तरह कार्य करती है और वस्तुओं को आवर्धित (बड़ा) दिखाती है।
- यह प्रकाश के अपवर्तन के सिद्धांत का एक सरल और दैनिक जीवन का उदाहरण है।
अवतल लेंस हमेशा आभासी, सीधा और छोटा प्रतिबिम्ब बनाता है। यह उत्तल लेंस से भिन्न है जो वस्तु की स्थिति के आधार पर वास्तविक/आभासी, सीधा/उल्टा, छोटा/बड़ा प्रतिबिम्ब बना सकता है।
लेंसों के अनुप्रयोग
लेंसों का उपयोग विभिन्न ऑप्टिकल उपकरणों और दैनिक जीवन में किया जाता है:
- आवर्धक लेंस (Magnifying Glass):
- यह वास्तव में एक उत्तल लेंस होता है।
- छोटी वस्तुओं के बड़े और सीधे (आभासी) प्रतिबिम्ब प्राप्त करने के लिए उपयोग किया जाता है।
- इसे सरल सूक्ष्मदर्शी भी कहते हैं।
- उपयोग: घड़ीसाज़ों द्वारा, छोटे अक्षरों को पढ़ने में, स्टाम्प संग्रह में। [IMAGE: cg_c8_science_ch09_t9_scene3]
- वाटर लेंस सूक्ष्मदर्शी (Water Lens Microscope):
- क्रियाकलाप 9 में फ्यूज्ड टॉर्च बल्ब से बनाया गया लेंस, पानी से भरकर उत्तल लेंस की तरह कार्य करता है।
- यह छोटी वस्तुओं को आवर्धित करके देखने में मदद करता है।
- वाटर लेंस दूरदर्शी (Water Lens Telescope):
- क्रियाकलाप 10 में बल्ब लेंस और एक उत्तल लेंस का उपयोग करके बनाया गया दूरदर्शी।
- दूर की वस्तुओं को देखने के लिए उपयोग किया जाता है, हालांकि प्रतिबिम्ब उल्टा बनता है।
- चश्मे (Spectacles):
- दृष्टि दोषों (निकट दृष्टि दोष, दूर दृष्टि दोष) को ठीक करने के लिए उत्तल और अवतल लेंसों का उपयोग किया जाता है।
- कैमरा, दूरबीन, माइक्रोस्कोप:
- इन सभी उपकरणों में विभिन्न प्रकार के लेंसों का उपयोग प्रकाश को केंद्रित करने या फैलाने के लिए किया जाता है, जिससे स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनते हैं।
उत्तल लेंस का उपयोग अभिसारी प्रकृति के कारण आवर्धक लेंस, सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी के अभिदृश्यक लेंस में होता है। अवतल लेंस का उपयोग अपसारी प्रकृति के कारण निकट दृष्टि दोष के निवारण में होता है।
मानव नेत्र: एक सजीव लेंस
मानव नेत्र एक जटिल प्रकाशीय उपकरण है जो हमें वस्तुओं को देखने में मदद करता है। यह स्वयं एक सजीव लेंस की तरह कार्य करता है।
- संरचना के मुख्य भाग:
- कॉर्निया (Cornea): नेत्र का सामने का उभरा हुआ पारदर्शी भाग। अधिकांश प्रकाश का अपवर्तन यहीं होता है।
- आइरिस (Iris): कॉर्निया के पीछे एक अपारदर्शी पर्दा जो पुतली के आकार को नियंत्रित करता है। यह आँख को रंग देता है।
- पुतली (Pupil): आइरिस के मध्य में एक छोटा छिद्र। यह प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करता है जो आँख में प्रवेश करती है। अधिक प्रकाश में छोटा और कम प्रकाश में बड़ा हो जाता है।
- नेत्र लेंस (Eye Lens): पुतली के पीछे स्थित एक नरम, पारदर्शी, उत्तल लेंस। यह रेशेदार जेली जैसे पदार्थ से बना होता है और अपनी फोकस दूरी को समायोजित कर सकता है (समंजन क्षमता)।
- रेटिना (Retina): नेत्र के सबसे पीछे की आंतरिक सतह पर स्थित एक पारदर्शी झिल्ली। यह प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाओं से बनी होती है और प्रतिबिम्ब यहीं बनता है।
- पीत बिंदु (Yellow Spot): रेटिना के लगभग बीच में एक स्थान जहाँ बना प्रतिबिम्ब सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।
- कार्यप्रणाली:
- किसी वस्तु से आने वाली प्रकाश किरणें कॉर्निया से गुजरने के बाद नेत्र लेंस पर आपतित होती हैं।
- नेत्र लेंस इन किरणों को अपवर्तित करके रेटिना पर वस्तु का उल्टा और वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाता है।
- रेटिना पर बने प्रतिबिम्ब का संदेश प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाओं द्वारा मस्तिष्क तक भेजा जाता है, जहाँ उसे सीधा समझा जाता है।
- सुस्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी: एक स्वस्थ आँख से किसी वस्तु को स्पष्ट देखने के लिए न्यूनतम दूरी 25 सेमी होती है।
मानव नेत्र का लेंस उत्तल प्रकृति का होता है और यह अपनी फोकस दूरी को आवश्यकतानुसार बदल सकता है।
दृष्टि दोष
दृष्टि दोष वे स्थितियाँ हैं जब आँखें वस्तुओं का स्पष्ट प्रतिबिम्ब रेटिना पर नहीं बना पातीं।
- निकट दृष्टि दोष (Myopia / Short-sightedness):
- परिभाषा: इस दोष से पीड़ित व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता, लेकिन पास की वस्तुएँ स्पष्ट दिखती हैं।
- कारण:
- नेत्र लेंस की फोकस दूरी का बहुत कम हो जाना।
- नेत्र गोलक का लंबा हो जाना।
- प्रतिबिम्ब निर्माण: दूरस्थ वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना के सामने बनता है।
- निवारण: इस दोष को अवतल लेंस लगे चश्मे से ठीक किया जाता है। अवतल लेंस प्रकाश किरणों को फैलाकर उन्हें रेटिना पर केंद्रित करता है।
- दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia / Long-sightedness):
- परिभाषा: इस दोष से पीड़ित व्यक्ति पास की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता, लेकिन दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखती हैं।
- कारण:
- नेत्र लेंस की फोकस दूरी का बहुत अधिक हो जाना।
- नेत्र गोलक का छोटा हो जाना।
- प्रतिबिम्ब निर्माण: निकटस्थ वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना के पीछे बनता है।
- निवारण: इस दोष को उत्तल लेंस लगे चश्मे से ठीक किया जाता है। उत्तल लेंस प्रकाश किरणों को अभिसरित करके उन्हें रेटिना पर केंद्रित करता है।
छात्र अक्सर निकट दृष्टि दोष के लिए उत्तल लेंस और दूर दृष्टि दोष के लिए अवतल लेंस का उपयोग करने में भ्रमित हो जाते हैं। याद रखें: निकट के लिए अवतल, दूर के लिए उत्तल।