HomeChhattisgarhClass 8Science › सूक्ष्मजीव - एक अदभुत संसार
सूक्ष्मजीव - एक अदभुत संसार
Chhattisgarh · Class 8 · 🔬 Science · Chapter 8

सूक्ष्मजीव - एक अदभुत संसार

सूक्ष्मजीवों के प्रकारसूक्ष्मजीवों के आवासलाभदायक सूक्ष्मजीवहानिकारक सूक्ष्मजीवरोग प्रतिरोधक क्षमता

यह अध्याय सूक्ष्मजीवों की अद्भुत दुनिया का परिचय देता है, जिन्हें हम नग्न आंखों से नहीं देख सकते। इसमें सूक्ष्मजीवों के विभिन्न प्रकारों जैसे शैवाल, कवक, प्रोटोजोआ, जीवाणु और विषाणु का विस्तृत विवरण दिया गया है। छात्र सीखेंगे कि ये सूक्ष्मजीव कहाँ पाए जाते हैं, वे कितने छोटे होते हैं, और वे हमारे पर्यावरण और हमारे स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करते हैं। अध्याय में सूक्ष्मजीवों के लाभदायक और हानिकारक दोनों पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है, जैसे दही बनाना, बीमारियों का कारण बनना और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना।

सूक्ष्मजीव: परिचय और वर्गीकरण

कुछ सूक्ष्मजीव
कुछ सूक्ष्मजीव

सूक्ष्मजीव वे जीव हैं जिन्हें हम अपनी नग्न आँखों से नहीं देख सकते। इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है।

  • सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति: ये हवा, पानी, मिट्टी, जीव-जंतुओं के शरीर के ऊपर और अंदर, तथा पृथ्वी पर हर जगह पाए जाते हैं।
  • आकार में भिन्नता: सूक्ष्मजीवों के आकार में बहुत अधिक भिन्नता होती है। उदाहरण के लिए, अमीबा एक साधारण जीवाणु से लगभग तीन लाख गुना बड़ा हो सकता है।
  • मुख्य प्रकार: सूक्ष्मजीवों को मुख्यतः पाँच प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया गया है:
  1. शैवाल (Algae)
  2. कवक (Fungi)
  3. प्रोटोजोआ (Protozoa)
  4. जीवाणु (Bacteria)
  5. विषाणु (Virus)
  • लाभदायक और हानिकारक: सूक्ष्मजीव हमारे लिए लाभदायक और हानिकारक दोनों हो सकते हैं।
  • लाभदायक: दही, डबलरोटी, इडली, डोसा बनाने, नाइट्रोजन स्थिरीकरण, पर्यावरण की सफाई आदि में।
  • हानिकारक: भोजन का सड़ना, पौधों, जंतुओं और मनुष्यों में रोग उत्पन्न करना।

[IMAGE: cg_c8_science_ch08_chapter_hero]

📖परिभाषा

मैक्रो आर्गेनिजम (Macro Organism): वे जीव जिन्हें हम अपनी नग्न आँखों से देख सकते हैं, जैसे पेड़-पौधे, हाथी, मनुष्य।

माइक्रो आर्गेनिजम (Micro Organism): वे जीव जिन्हें हम अपनी नग्न आँखों से नहीं देख सकते, केवल सूक्ष्मदर्शी से ही देखा जा सकता है।

सूक्ष्मजीवों का आकार और मापन

सूक्ष्मजीवों के मापन की इकाइयाँ
सूक्ष्मजीवों के मापन की इकाइयाँ

सूक्ष्मजीवों का आकार इतना छोटा होता है कि उन्हें मापने के लिए विशेष इकाइयों का उपयोग किया जाता है।

  • मापन की इकाइयाँ:
  • माइक्रोमीटर (µm): 1 मिलीमीटर (mm) = 1000 माइक्रोमीटर (µm)।
  • नैनोमीटर (nm): 1 माइक्रोमीटर (µm) = 1000 नैनोमीटर (nm)।
  • नग्न आँखों से दृश्यता: लगभग 100 माइक्रोमीटर से छोटी वस्तुएँ हमें नग्न आँखों से दिखाई नहीं देतीं।
  • उदाहरण: पैरामीशियम का आकार लगभग 100 माइक्रोमीटर होता है।
  • अत्यधिक छोटे सूक्ष्मजीव: कुछ सूक्ष्मजीव जैसे विषाणु इतने छोटे होते हैं कि उन्हें सामान्य सूक्ष्मदर्शी से भी नहीं देखा जा सकता। इन्हें देखने के लिए इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है।
  • उदाहरण: पोलियो के गोलाकार विषाणु का व्यास 28 नैनोमीटर होता है।

[IMAGE: cg_c8_science_ch08_t2_scene2]

महत्त्वपूर्ण

सबसे पहले जीवाणुओं को एण्टोनीवॉन ल्यूवेनहॉक ने 1675 ई. में अपने बनाए सूक्ष्मदर्शी से देखा था।

सूक्ष्मजीवों का आवास

सूक्ष्मजीव: हर जगह, हर परिस्थिति में
सूक्ष्मजीव: हर जगह, हर परिस्थिति में

सूक्ष्मजीव पृथ्वी पर हर जगह पाए जाते हैं और विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में जीवित रह सकते हैं।

  • व्यापक वितरण:
  • हवा, पानी, मिट्टी: ये हवा, पानी और मिट्टी में प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं।
  • जीव-जंतुओं के शरीर: जीव-जंतुओं के शरीर के ऊपर और अंदर भी पाए जाते हैं (जैसे आंतों में)।
  • चरम परिस्थितियों में जीवन: सूक्ष्मजीवों में चरम परिस्थितियों में भी जीवित रहने की अद्भुत क्षमता होती है।
  • तापमान: अत्यधिक गर्म स्थानों (जैसे गर्म पानी के झरने) से लेकर अत्यधिक ठंडे स्थानों (जैसे ध्रुवीय बर्फ) तक।
  • अन्य परिस्थितियाँ: अम्लीय और क्षारीय वातावरण, उच्च दबाव वाले गहरे समुद्र और विकिरण-युक्त स्थानों में भी पनप सकते हैं।
  • पारिस्थितिक महत्व: इनकी यह अनुकूलन क्षमता उन्हें पृथ्वी पर सबसे सफल जीवों में से एक बनाती है, और वे पारिस्थितिक तंत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

[IMAGE: cg_c8_science_ch08_t3_scene3]

शैवाल (Algae): प्रकार, रंग और उपयोग

शैवाल का परिचय और आवास
शैवाल का परिचय और आवास
शैवाल के रंग और वर्णक
शैवाल के रंग और वर्णक
शैवाल के उपयोग और महत्व
शैवाल के उपयोग और महत्व

शैवाल सरल, प्रकाश संश्लेषक सूक्ष्मजीव हैं जो मुख्य रूप से जलीय या नम वातावरण में पाए जाते हैं।

  • आवास: तालाबों, नदियों के रुके हुए पानी, गीली दीवारों और चट्टानों पर हरे, लाल या भूरे रंग की पर्त के रूप में (जिसे 'काई' भी कहते हैं)।
  • संरचना: ये एकल-कोशिकीय या बहु-कोशिकीय हो सकते हैं।
  • रंग और वर्णक:
  • शैवाल विभिन्न रंगों के होते हैं (हरे, लाल, भूरे)।
  • यह रंग उनमें मौजूद विशिष्ट वर्णकों (pigments) के कारण होता है।
  • हरे शैवाल: इनमें क्लोरोफिल नामक वर्णक प्रमुख होता है, जो प्रकाश संश्लेषण में मदद करता है।
  • लाल और भूरे शैवाल: इनमें अन्य वर्णक होते हैं जो गहरे पानी में प्रकाश अवशोषण में सहायक होते हैं।
  • महत्व और उपयोग:
  • प्रकाश संश्लेषण: कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिससे वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर बना रहता है।
  • खाद्य स्रोत: कुछ शैवाल (जैसे स्पिरुलिना, क्लोरेला) प्रोटीन और विटामिन से भरपूर होने के कारण भोजन के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
  • उद्योग: औषधि, प्रसाधन सामग्री, रंग निर्माण, छपाई, आयोडीन और उर्वरक बनाने में उपयोगी।
  • जलीय जीवों का भोजन: ये जलीय जीवों के लिए प्रमुख खाद्य स्रोत हैं।

[IMAGE: cg_c8_science_ch08_t4_scene1] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t4_scene2] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t4_scene3]

महत्त्वपूर्ण

शैवाल परजीवी नहीं होते क्योंकि वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।

कवक (Fungi): प्रकार, वृद्धि की परिस्थितियाँ और प्रभाव

कवकों के प्रकार
कवकों के प्रकार
कवक की वृद्धि के लिए परिस्थितियाँ
कवक की वृद्धि के लिए परिस्थितियाँ

कवक ऐसे सूक्ष्मजीव हैं जो प्रकाश संश्लेषण नहीं करते और कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं।

  • आवास: अचार, मुरब्बे, फल, सब्जियाँ, गीले कपड़े, पुराने जूते, दीवारें, लकड़ी आदि पर पीले, भूरे, काले, स्लेटी धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं।
  • संरचना: अधिकांश कवकों की संरचना तंतु जैसी (हाइफी) होती है। कुछ एककोशिकीय (जैसे यीस्ट) और कुछ बहुकोशिकीय (जैसे मशरूम) होते हैं।
  • पोषण: कवक परजीवी या मृतोपजीवी होते हैं, क्योंकि वे अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते।
  • मृतोपजीवी: सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों से पोषण प्राप्त करते हैं।
  • परजीवी: जीवित जीवों से पोषण प्राप्त करते हैं।
  • वृद्धि के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ:
  • उपयुक्त तापमान
  • नमी (गीला वातावरण)
  • पोषक तत्व (कार्बनिक पदार्थ)
  • अंधेरा या कम रोशनी (प्रकाश संश्लेषण न करने के कारण)
  • उदाहरण:
  • यीस्ट (Yeast): एककोशिकीय कवक, किण्वन में प्रयुक्त।
  • राइजोपस (Rhizopus): डबलरोटी का कवक (ब्रेड मोल्ड)।
  • मशरूम (Mushroom): बड़े आकार का कवक, पौष्टिक भोजन।
  • लाभदायक प्रभाव:
  • भोजन: मशरूम एक पौष्टिक भोजन है (खनिज और प्रोटीन से भरपूर)।
  • औषधियाँ: कई दवाइयाँ, जैसे पेनिसिलिन, कवकों से बनाई जाती हैं।
  • किण्वन: यीस्ट का उपयोग इडली, डोसा, ब्रेड, शराब आदि बनाने में।
  • हानिकारक प्रभाव:
  • खाद्य पदार्थों को सड़ाना: नम मौसम में खाद्य पदार्थों, कपड़ों, लकड़ी आदि को सड़ा-गला देते हैं।
  • रोग उत्पन्न करना: पौधों (जैसे आलू का अकाल) और जंतुओं में रोग उत्पन्न करते हैं। मनुष्यों में दाद जैसे त्वचा रोग कवकों के कारण होते हैं।

[IMAGE: types_of_fungi_fig91] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t5_scene3]

महत्त्वपूर्ण

19वीं सदी में आयरलैंड में आलू की फसल परजीवी कवक द्वारा नष्ट होने से अकाल पड़ा था, जिससे अनेक लोग भूख से मर गए थे।

किण्वन (Fermentation) प्रक्रिया और यीस्ट का महत्व

आटे का फूलना (किण्वन)
आटे का फूलना (किण्वन)
दूध से दही का बनना
दूध से दही का बनना

किण्वन एक जैविक प्रक्रिया है जिसमें सूक्ष्मजीव (मुख्यतः यीस्ट) शर्करा को तोड़कर ऊर्जा प्राप्त करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड गैस तथा अल्कोहल जैसे उत्पाद बनाते हैं।

  • यीस्ट (Yeast):
  • एककोशिकीय मृतोपजीवी कवक है।
  • मृदा और वायु में उपस्थित रहता है।
  • शुष्क अवस्था में पाउडर या गोली के रूप में 4 वर्षों तक संरक्षित किया जा सकता है।
  • किण्वन की प्रक्रिया:
  1. यीस्ट को जीवित रहने के लिए भोजन (शर्करा), पानी और ऊष्मा की आवश्यकता होती है।
  2. यीस्ट शर्करा को तोड़कर ऊर्जा प्राप्त करता है।
  3. इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड गैस (CO₂) और अल्कोहल उत्पन्न होते हैं।
  4. रासायनिक समीकरण: \(C_6H_{12}O_6 \xrightarrow{\text{यीस्ट}} 2C_2H_5OH + 2CO_2 + \text{ऊर्जा}\)
  • खाद्य पदार्थों में उपयोग:
  • इडली, डोसा, जलेबी, ब्रेड: यीस्ट द्वारा उत्पन्न CO₂ गैस आटे में फंस जाती है। गर्म करने पर यह गैस बाहर निकलती है, जिससे खाद्य पदार्थ मुलायम और स्पंजी हो जाते हैं।
  • शराब और बीयर: किण्वन प्रक्रिया द्वारा शर्करा से अल्कोहल का उत्पादन होता है।
  • सिरका: अल्कोहल के आगे किण्वन से सिरका बनता है।
  • दही निर्माण:
  • लैक्टोबैसिलस नामक जीवाणु दूध में मौजूद लैक्टोज शर्करा को लैक्टिक एसिड में परिवर्तित करते हैं।
  • लैक्टिक एसिड दूध के प्रोटीन को जमा देता है, जिससे दूध गाढ़ा होकर दही बन जाता है।
  • यह प्रक्रिया हल्के गर्म दूध (लगभग 37°C) में तेजी से होती है।
  • दही जमने के बाद उसे ठंडे स्थान पर रखने से जीवाणुओं की वृद्धि धीमी हो जाती है और दही खट्टा होने से बच जाता है।

[IMAGE: dough_rising_before_and_after_fig917] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t6_scene1]

📖परिभाषा

किण्वन (Fermentation): वह प्रक्रिया जिसमें सूक्ष्मजीव (जैसे यीस्ट) शर्करा को तोड़कर अल्कोहल और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे उत्पाद बनाते हैं।

प्रोटोजोआ (Protozoa): प्रकार और रोगजनक भूमिका

प्रोटोजोआ के उदाहरण
प्रोटोजोआ के उदाहरण

प्रोटोजोआ एकल-कोशिकीय सूक्ष्मजीव होते हैं जो विभिन्न आवासों में पाए जाते हैं और कुछ रोग उत्पन्न करते हैं।

  • आवास: पानी, पौधों और पशुओं के शरीर, तथा मिट्टी में पाए जाते हैं।
  • संरचना और गति:
  • कुछ प्रोटोजोआ में एक या एक से अधिक धागे जैसी रचनाएँ (कशाभिका या पक्ष्माभिका) होती हैं जिनकी सहायता से वे पानी में चलते-फिरते हैं।
  • अमीबा जैसे प्रोटोजोआ कूटपाद (pseudopods) की मदद से गति करते हैं।
  • उदाहरण:
  • अमीबा (Amoeba): अनियमित आकार का, कूटपाद से गति करता है।
  • पैरामीशियम (Paramecium): चप्पल के आकार का, पक्ष्माभिका से गति करता है।
  • यूग्लीना (Euglena): कशाभिका से गति करता है, इसमें क्लोरोफिल भी हो सकता है।
  • प्लाज्मोडियम (Plasmodium): मलेरिया का कारक।
  • एण्टअमीबा (Entamoeba): पेचिश का कारक।
  • रोगजनक भूमिका:
  • मलेरिया: प्लाज्मोडियम नामक प्रोटोजोआ के कारण होता है। मादा एनाफिलीज मच्छर इस प्रोटोजोआ का वाहक है।
  • पेचिश: एण्टअमीबा और जिआर्डिया जैसे प्रोटोजोआ के कारण होता है।

[IMAGE: examples_of_protozoa_fig88]

जीवाणु (Bacteria): प्रकार, लाभदायक और हानिकारक भूमिका

जीवाणु और सायनोबैक्टीरिया के प्रकार
जीवाणु और सायनोबैक्टीरिया के प्रकार
जीवाणुओं के अद्भुत उपयोग
जीवाणुओं के अद्भुत उपयोग

जीवाणु एकल-कोशिकीय सूक्ष्मजीव हैं जो पृथ्वी पर हर जगह पाए जाते हैं और विभिन्न आकार के होते हैं।

  • खोज: सबसे पहले एण्टोनीवॉन ल्यूवेनहॉक ने 1675 ई. में अपने बनाए सूक्ष्मदर्शी से देखा।
  • आकार: प्रायः गोलाकार (कोकाई), छड़ाकार (बैसिलाई), सर्पिलाकार (स्पाइरिला) होते हैं।
  • लाभदायक भूमिका:
  • दही निर्माण: लैक्टोबैसिलस जीवाणु दूध को दही में बदलते हैं।
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण: राइजोबियम जैसे जीवाणु फलीदार पौधों की जड़ों में रहकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिकों में बदलते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इन्हें किसानों का मित्र कहा जाता है।
  • अपघटन: सूक्ष्मजीव मृत जीवों और कार्बनिक पदार्थों को सड़ा-गलाकर विघटित करते हैं, जिससे पर्यावरण स्वच्छ रहता है और खाद बनती है।
  • पाचन: शाकाहारी जंतुओं की आहारनाल में रहने वाले जीवाणु सेल्युलोज को पचाने में सहायता करते हैं।
  • उद्योग: चमड़ा शोधन, फलों के रस से सिरका बनाने, एंटीबायोटिक्स (जैसे स्ट्रेप्टोमाइसिन) उत्पादन में उपयोगी।
  • हानिकारक भूमिका:
  • खाद्य पदार्थों को खराब करना: बासी भोजन से दुर्गंध आना और सड़ना जीवाणुओं के कारण होता है।
  • रोग उत्पन्न करना: मनुष्यों में हैजा, तपेदिक (टी.बी.), टेटनस, निमोनिया, डिफ्थीरिया, कुष्ठ रोग जैसे अनेक रोग जीवाणुओं के कारण होते हैं।

[IMAGE: types_of_microorganisms_bacteria_and_cyanobacteria_fig108] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t8_scene4]

महत्त्वपूर्ण

दूध को उबालने से उसमें मौजूद हानिकारक जीवाणु मर जाते हैं, जिससे वह खराब होने से बच जाता है।

विषाणु (Virus): संरचना, प्रकृति और रोगजनक भूमिका

विषाणु की संरचना
विषाणु की संरचना
विषाणु जनित रोग और बचाव
विषाणु जनित रोग और बचाव

विषाणु अत्यंत सूक्ष्मजीव हैं जो केवल अन्य पोषक जीवों के शरीर में ही वृद्धि कर सकते हैं।

  • आकार: अन्य सूक्ष्मजीवों की तुलना में बहुत छोटे होते हैं, इन्हें केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से ही देखा जा सकता है।
  • प्रकृति:
  • पोषक कोशिका के बाहर ये निर्जीव कण की तरह होते हैं।
  • पोषक कोशिका के अंदर प्रवेश करने पर ये सजीवों की तरह वृद्धि और प्रजनन करते हैं।
  • इसी कारण कुछ वैज्ञानिक इन्हें सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी मानते हैं।
  • प्रकार:
  • वनस्पति वायरस: पौधों में पाए जाने वाले विषाणु।
  • जंतु वायरस: जंतुओं में पाए जाने वाले विषाणु।
  • बैक्टीरियोफेज: जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले वायरस। (ये गंगाजल में पाए गए हैं, जो गंगाजल को शुद्ध रखने में सहायक हो सकते हैं।)
  • रोगजनक भूमिका:
  • मनुष्यों में रोग: सर्दी-जुकाम, फ्लू, खसरा, पोलियो, रेबीज, नेत्र रोग (कंजक्टिवाइटिस), एड्स (AIDS)
  • एड्स: एच.आई.वी. (HIV - Human Immunodeficiency Virus) नामक विषाणु के कारण होता है। यह एक भयानक और जानलेवा रोग है जिसका कोई इलाज नहीं है, लेकिन बचाव के उपायों से इससे बचा जा सकता है।
  • अन्य जंतुओं और पौधों में रोग: विषाणु अन्य जंतुओं और पौधों में भी अनेक रोग पैदा करते हैं।

[IMAGE: structure_of_a_virus_fig89] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t10_scene4]

महत्त्वपूर्ण

विषाणु अन्य जीवों की तुलना में विचित्र जीव कहलाते हैं क्योंकि वे सजीव और निर्जीव दोनों के गुण प्रदर्शित करते हैं।

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूक्ष्मजीवों से मुकाबला

सूक्ष्मजीवों का हमला और पहली रक्षा
सूक्ष्मजीवों का हमला और पहली रक्षा
आंतरिक सुरक्षा: श्वेत रक्त कणिकाएं
आंतरिक सुरक्षा: श्वेत रक्त कणिकाएं
रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास: टीकाकरण
रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास: टीकाकरण
रोग प्रतिरोधक क्षमता का महत्व
रोग प्रतिरोधक क्षमता का महत्व

हमारे शरीर में रोगों से लड़ने की एक अद्भुत क्षमता होती है, जिसे रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कहते हैं। यह हमें सूक्ष्मजीवों के हमले से बचाती है।

  • बाहरी सुरक्षा तंत्र (प्रथम रक्षा पंक्ति):
  • त्वचा: रोगाणुओं को शरीर में प्रवेश करने से रोकती है।
  • म्यूकस झिल्ली: नाक और गले में चिपचिपी म्यूकस झिल्ली धूल कणों और सूक्ष्मजीवों को फँसा लेती है।
  • नाक के बाल: हवा के साथ आने वाले कणों को रोकते हैं।
  • आँसू और पसीना: रोगाणुओं को बाहर निकालने में मदद करते हैं।
  • मूत्र: कुछ रोगाणुओं को शरीर से बाहर निकालता है।
  • आंतरिक सुरक्षा तंत्र (द्वितीय रक्षा पंक्ति):
  • श्वेत रक्त कणिकाएं (WBCs): ये हमारे रक्त में मौजूद होती हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं। ये शरीर में प्रवेश करने वाले बैक्टीरिया, वायरस और अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पहचानकर उन्हें नष्ट कर देती हैं। इन्हें 'सैनिक कोशिकाएं' भी कहते हैं।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास:
  • जब शरीर किसी रोगाणु के संपर्क में आता है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली उस रोगाणु को 'याद' रखती है।
  • अगली बार वही रोगाणु प्रवेश करने पर, प्रतिरक्षा प्रणाली तेजी से और अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया करती है, जिससे व्यक्ति बीमार होने से बच जाता है या बीमारी के लक्षण हल्के होते हैं।
  • टीकाकरण (Vaccination):
  • यह शरीर में कृत्रिम रूप से प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की प्रक्रिया है।
  • टीके में मृत या कमजोर रोगाणु होते हैं, जो शरीर में प्रवेश करने पर प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करते हैं, लेकिन रोग उत्पन्न नहीं करते।
  • इससे शरीर भविष्य में उस रोग से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है (जैसे पोलियो, खसरा, चेचक, टी.बी. के टीके)।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता का महत्व:
  • कमजोर प्रतिरोधक क्षमता होने पर शरीर रोगाणुओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है, जिससे संक्रमण और बीमारियाँ आसानी से हो सकती हैं।
  • बुखार, थकान आदि रोग के लक्षण प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने का संकेत हो सकते हैं।
  • स्वस्थ रहने के लिए: उचित पोषण, व्यायाम, स्वच्छता, समय पर टीकाकरण और चिकित्सा सलाह आवश्यक है।

[IMAGE: cg_c8_science_ch08_t11_scene1] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t11_scene2] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t11_scene3] [IMAGE: cg_c8_science_ch08_t11_scene4]

💡सुझाव

स्वच्छता क्यों जरूरी है? स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छता बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूक्ष्मजीवों के प्रसार को रोकती है और हमें बीमारियों से बचाती है।

Ask SAAVI — Free