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मिटटी
Chhattisgarh · Class 7 · 🔬 Science · Chapter 19

मिटटी

मिट्टी की संरचनामिट्टी के प्रकारमिट्टी के गुणधर्ममिट्टी का अपरदनमिट्टी का संरक्षणह्यूमस

यह अध्याय मिट्टी को जीवन का आधार मानता है और इसकी संरचना, घटक, निर्माण प्रक्रिया और विभिन्न प्रकारों की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। छात्र मिट्टी की परिच्छेदिका, जलधारण क्षमता और सरंध्रता जैसे गुणों को समझते हैं। अध्याय मिट्टी के अपरदन के कारणों और प्रभावों पर भी प्रकाश डालता है, साथ ही इसके संरक्षण के तरीकों और कृषि में इसके महत्व को भी बताता है। यह छात्रों को मिट्टी के प्रदूषण और उसके उपचार के बारे में जागरूक करता है, जिससे वे इस महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन के प्रति जिम्मेदारी महसूस कर सकें।

मिट्टी का महत्व एवं परिचय

मिट्टी का नमूना एकत्रित करना
मिट्टी का नमूना एकत्रित करना

मिट्टी (मृदा) पृथ्वी पर जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है।

  • जीवन का आधार: हवा और पानी की तरह मिट्टी भी हमारे जीवन का आधार है। इसके बिना जीवन की कल्पना असंभव है।
  • विभिन्न उपयोग: मिट्टी का उपयोग अनेक कार्यों के लिए होता है, जैसे:
  • कृषि: फसलों को उगाने के लिए।
  • निर्माण: घर, इमारतें, सड़कें बनाने के लिए आधार प्रदान करती है।
  • बर्तन/खिलौने: कुम्हार मिट्टी से विभिन्न प्रकार के बर्तन और खिलौने बनाते हैं।
  • आवास: अनेक जीव-जन्तुओं (केंचुए, सांप, चूहे, सूक्ष्मजीव) और पौधों का प्राकृतिक आवास।
  • संसाधन: भोजन, वस्त्र, औषधियाँ, खनिज, ईंधन आदि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिट्टी से प्राप्त होते हैं।
  • मिट्टी की विविधता: विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग प्रकार की मिट्टी उपयुक्त होती है। सभी प्रकार की मिट्टी से घड़े या खिलौने नहीं बनाए जा सकते, न ही सभी फसलें एक ही प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती हैं।
  • अध्ययन का उद्देश्य: इस अध्याय में हम मिट्टी के विभिन्न प्रकारों, गुणों, निर्माण, संरक्षण और प्रदूषण के बारे में जानेंगे।
महत्त्वपूर्ण

मिट्टी का परीक्षण वर्ष भर किया जा सकता है, परंतु गर्मियों का समय मिट्टी का नमूना लेने के लिए अधिक उपयुक्त होता है।

मिट्टी की संरचना और घटक

मिट्टी विभिन्न कणों और पदार्थों का मिश्रण है। इसकी संरचना को समझने के लिए इसे पानी में घोलकर परतों में अलग किया जा सकता है।

मिट्टी की संरचना (कणों का जमाव)

  • क्रियाकलाप 2 का अवलोकन: जब मिट्टी को पानी में घोलकर स्थिर छोड़ दिया जाता है, तो विभिन्न आकार के कण अपनी घनत्व के अनुसार परतों में जम जाते हैं
  • सबसे निचली परत: सबसे भारी और बड़े कण (बजरी)।
  • मध्य परतें: रेत, गाद, और चिकनी मिट्टी (क्ले) के कण।
  • सबसे ऊपरी परत: ह्यूमस (मृत जन्तुओं और पौधों के अवशेष) पानी के ऊपर तैरते हुए या ऊपरी सतह पर जमा होते हैं।
  • कणों का आकार: मिट्टी में मुख्यतः चार प्रकार के कण पाए जाते हैं:
  1. बजरी या कंकड़: आकार 2.00 मिमी से अधिक। सबसे बड़े कण, तली पर बैठते हैं।
  2. रेत: व्यास 0.05 से 2.00 मिमी। बजरी के ऊपर की परत में दिखायी देते हैं।
  3. गाद: व्यास 0.005 से 0.05 मिमी
  4. क्ले (चिकनी मिट्टी के कण): व्यास 0.002 मिमी से कम। बहुत छोटे होते हैं, सूक्ष्मदर्शी से ही देखे जा सकते हैं, छूने पर बहुत चिकने महसूस होते हैं।

मिट्टी के घटक (अवयव)

मिट्टी में मुख्य चार अवयव पाए जाते हैं, जो पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक हैं:

  1. वायु (25%): मिट्टी के कणों के बीच के रिक्त स्थानों (रंध्रावकाश) में उपस्थित होती है। पौधों की जड़ों और सूक्ष्मजीवों के श्वसन के लिए आवश्यक।
  2. जल (25%): रंध्रावकाश में भरा रहता है। पौधों द्वारा अवशोषित किया जाता है।
  3. खनिज पदार्थ (45%): उन चट्टानों से प्राप्त होते हैं जिनसे मिट्टी का निर्माण होता है। मिट्टी को विशेष रंग प्रदान करते हैं (जैसे लौह तत्व से लाल रंग)।
  4. कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस) (5%): मृत पेड़-पौधों और जन्तुओं के अवशेषों के अपघटन से बनता है। मिट्टी की सबसे ऊपरी परत में पाया जाता है। मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और पोषक तत्व प्रदान करता है।
  • आदर्श मिट्टी: जिस मिट्टी में पौधे अच्छी तरह वृद्धि कर सकते हों, उसमें आयतन के दृष्टिकोण से लगभग 50% जल और वायु, 45% खनिज पदार्थ तथा 5% कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस) होते हैं।
  • रंध्रावकाश: मिट्टी के कणों के बीच के रिक्त स्थान। इनमें वायु और जल भरा रहता है।
  • महत्व: रंध्रावकाश के कारण मिट्टी में सरंध्रता का गुण पाया जाता है। यह पौधों की जड़ों के विकास, जल धारण, वायु संचार और सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • दलदली भूमि: दलदली भूमि पौधों के विकास के लिए उपयुक्त नहीं होती क्योंकि इसमें रंध्रावकाश में वायु की कमी होती है, जिससे जड़ों को श्वसन के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।
📖परिभाषा

रंध्रावकाश (Pore Spaces): मिट्टी के कणों के बीच पाए जाने वाले रिक्त स्थान, जिनमें वायु और जल भरा रहता है। इन्हीं के कारण मिट्टी में सरंध्रता का गुण होता है।

💡सुझाव

मिट्टी के घटकों का प्रतिशत वितरण (वायु 25%, जल 25%, खनिज 45%, ह्यूमस 5%) याद रखें। यह बहुविकल्पीय प्रश्नों में पूछा जा सकता है।

मिट्टी की परिच्छेदिका (Soil Profile)

मिट्टी की परिच्छेदिका (Soil Profile) भूमि की गहराई में मिट्टी की विभिन्न परतों का ऊर्ध्वाधर काट है। प्रत्येक परत गठन, रंग, गहराई और रासायनिक संरचना में भिन्न होती है। इन परतों को संस्तर (Horizons) कहा जाता है।

  • अवलोकन: सड़क, पुल, कुआँ, मकान की नींव आदि के लिए खोदी गई भूमि में मिट्टी की परिच्छेदिका स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

मुख्य संस्तर:

  1. O संस्तर (कार्बनिक संस्तर):
  • स्थिति: सबसे ऊपरी परत, जमीन पर।
  • गठन: पत्तियों, टहनियों और अन्य कार्बनिक पदार्थों से बनी होती है।
  • विशेषता: कार्बनिक पदार्थों के विघटन की क्रिया चलती रहती है।
  • रंग: गहरा, क्योंकि इसमें ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है।
  • महत्व: पौधों को पोषक तत्व प्रदान करता है।
  1. A संस्तर (ऊपरी मृदा):
  • स्थिति: O संस्तर के नीचे।
  • गठन: ह्यूमस और खनिज पदार्थों का मिश्रण।
  • विशेषता: केंचुए, कवक, जीवाणु जैसे कई जीवों का वास स्थान। ह्यूमस से भरपूर, मुलायम, छिद्रयुक्त और अधिक जल अवशोषण करने वाला।
  • रंग: गहरा भूरा।
  • महत्व: पौधों की जड़ों का अधिकांश विकास इसी परत में होता है। यह सबसे उपजाऊ परत है।
  1. B संस्तर (उपमृदा):
  • स्थिति: A संस्तर के नीचे।
  • गठन: कठोर, कम कार्बनिक पदार्थों वाला।
  • विशेषता: खनिज पदार्थ अधिक मात्रा में होते हैं जो ऊपरी परतों से नीचे रिस कर जमा होते हैं।
  • रंग: हल्का।
  • महत्व: जल और खनिजों का भंडारण।
  1. C संस्तर (आधार शैल पदार्थ):
  • स्थिति: B संस्तर के नीचे।
  • गठन: चट्टानों के छोटे-छोटे कण।
  • विशेषता: ह्यूमस नहीं पाया जाता, परन्तु खनिज पदार्थ होते हैं।
  • रंग: मूल चट्टान के रंग के अनुसार।
  • महत्व: मिट्टी निर्माण की प्रक्रिया में यह मूल चट्टान का टूटा हुआ रूप है।
  1. आधार शैल (Bedrock):
  • स्थिति: C संस्तर के नीचे।
  • गठन: अविघटित ठोस चट्टान।
  • महत्व: इसी से मिट्टी का निर्माण शुरू होता है।
याद रखें

मिट्टी की परिच्छेदिका में A संस्तर सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सर्वाधिक ह्यूमस और सूक्ष्मजीव होते हैं, जो इसे पौधों की वृद्धि के लिए सबसे उपजाऊ बनाते हैं।

मिट्टी का निर्माण (Weathering of Rocks)

मिट्टी का निर्माण एक धीमी और निरंतर प्रक्रिया है जिसे अपक्षय (Weathering) कहते हैं। यह चट्टानों के बड़े टुकड़ों से छोटे कणों में टूटने और फिर उनमें कार्बनिक पदार्थों के मिलने से होता है।

अपक्षय के कारक:

  1. भौतिक कारक: ये कारक चट्टानों को यांत्रिक रूप से तोड़ते हैं।
  • बहता जल: नदियों और वर्षा का जल चट्टानों को घिसता और तोड़ता है।
  • वायु: तेज हवाएं चट्टानों से छोटे कणों को उड़ाकर ले जाती हैं और उन्हें आपस में टकराकर तोड़ती हैं।
  • ताप: दिन और रात के तापमान में अंतर के कारण चट्टानें फैलती और सिकुड़ती हैं, जिससे उनमें दरारें पड़ जाती हैं और वे टूट जाती हैं।
  • ज्वालामुखी और भूकंप: ये भूगर्भीय घटनाएँ चट्टानों को तोड़कर नए पदार्थ उजागर करती हैं।
  • बर्फ: पानी का जमना और पिघलना चट्टानों में दरारें पैदा करता है, जिससे वे टूटती हैं।
  1. रासायनिक कारक: ये कारक चट्टानों में उपस्थित खनिजों की रासायनिक संरचना को बदलते हैं, जिससे वे कमजोर होकर टूट जाती हैं।
  • ऑक्सीकरण: लौह युक्त खनिजों का ऑक्सीजन से क्रिया करके जंग लगना।
  • कार्बोनेशन: कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वर्षा जल का चट्टानों के खनिजों से क्रिया करना।
  • जलयोजन: खनिजों का जल के साथ मिलकर नए यौगिक बनाना।
  • अम्लीय वर्षा: वायु प्रदूषण के कारण अम्लीय वर्षा चट्टानों को घोलती है।
  1. जैविक कारक: जीव-जन्तु और पौधे भी मिट्टी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • पौधों की जड़ें: चट्टानों की दरारों में घुसकर उन्हें तोड़ती हैं।
  • सूक्ष्मजीव (जीवाणु, कवक): मृत पेड़-पौधों और जन्तुओं के अवशेषों को अपघटित करते हैं।
  • अपघटन: इस क्रिया से गहरे भूरे रंग का पदार्थ बनता है जिसे ह्यूमस कहते हैं
  • ह्यूमस का महत्व: ह्यूमस मिट्टी में मिलकर उसे उपजाऊ बनाता है और पौधों को निरंतर पोषक तत्व प्रदान करता है। यह मिट्टी निर्माण का अंतिम चरण है।
  • मिट्टी की परिभाषा: मिट्टी खनिज पदार्थों और कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस) से बनी एक जटिल संरचना है, जिसमें हवा, पानी के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु और पौधे पाए जाते हैं।
📖परिभाषा

अपक्षय (Weathering): चट्टानों का भौतिक, रासायनिक और जैविक कारकों के प्रभाव से छोटे-छोटे टुकड़ों और अंततः बारीक कणों में टूटने की प्रक्रिया।

महत्त्वपूर्ण

ह्यूमस मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और पौधों को निरंतर पोषक तत्व प्रदान करता है। यह मिट्टी निर्माण का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

मिट्टी के प्रकार

मिट्टी को उसमें उपस्थित विभिन्न आकार के कणों की मात्रा के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

मिट्टी के मुख्य प्रकार:

  1. रेतीली मिट्टी (Sandy Soil):
  • कणों का आकार: इसमें बड़े आकार के कण (रेत) की मात्रा अधिक होती है।
  • गुण:
  • कणों के बीच बड़े रंध्रावकाश होते हैं।
  • जल निकासी बहुत तेजी से होती है (कम जलधारण क्षमता)।
  • वायु संचार अच्छा होता है।
  • पोषक तत्वों की कमी होती है।
  • उपयोग: कपास जैसी फसलों के लिए उपयुक्त, जहाँ अच्छी जल निकासी की आवश्यकता होती है।
  1. चिकनी मिट्टी (Clayey Soil):
  • कणों का आकार: इसमें बारीक कणों (क्ले) की मात्रा अधिक होती है।
  • गुण:
  • कण बहुत पास-पास होते हैं, जिससे रंध्रावकाश छोटे होते हैं।
  • जलधारण क्षमता सबसे अधिक होती है (पानी को लंबे समय तक रोक सकती है)।
  • वायु संचार कम होता है।
  • पोषक तत्वों से भरपूर होती है।
  • गीली होने पर चिपचिपी और सूखने पर कठोर हो जाती है।
  • उपयोग: धान, गेहूँ और चने जैसी फसलों के लिए उपयुक्त, जहाँ अधिक पानी की आवश्यकता होती है। बर्तन और खिलौने बनाने के लिए भी उपयोगी।
  1. दोमट मिट्टी (Loamy Soil):
  • कणों का आकार: यह रेत, चिकनी मिट्टी और गाद के कणों का लगभग बराबर मिश्रण होती है, साथ ही इसमें ह्यूमस भी होता है।
  • गुण:
  • छोटे और बड़े कणों का संतुलन होता है, जिससे पर्याप्त रंध्रावकाश पाए जाते हैं।
  • जलधारण क्षमता अच्छी होती है (न तो बहुत तेजी से पानी निकलता है, न ही बहुत ज्यादा रुकता है)।
  • वायु संचार भी अच्छा होता है।
  • ह्यूमस से भरपूर होने के कारण अत्यधिक उपजाऊ होती है।
  • उपयोग: पौधों के विकास के लिए अत्यधिक उपयोगी और सबसे अच्छी मिट्टी मानी जाती है। अधिकांश फसलें (जैसे धान, गेहूँ, चना, दालें) इसमें अच्छी उगती हैं।
  • मिट्टी की संरचना: दोमट मिट्टी की संरचना में मिट्टी के कणों के बीच पर्याप्त रंध्रावकाश होते हैं, जिससे यह पर्याप्त मात्रा में जल और वायु धारण कर सकती है।
याद रखें

दोमट मिट्टी को 'उत्तम मिट्टी' माना जाता है क्योंकि इसमें जलधारण क्षमता और वायु संचार का सही संतुलन होता है, साथ ही यह ह्यूमस से भी भरपूर होती है।

मिट्टी के गुण

मिट्टी के भौतिक और जैविक गुण उसकी उर्वरता और पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं।

1. जलधारण क्षमता (Water Retention Capacity)

  • परिभाषा: मिट्टी द्वारा जल को धारण करने की क्षमता।
  • क्रियाकलाप 3: विभिन्न प्रकार की मिट्टी (रेतीली, दोमट, चिकनी) में समान मात्रा में पानी डालने पर:
  • रेतीली मिट्टी: सबसे कम जल धारण करती है, पानी तेजी से निकल जाता है।
  • चिकनी मिट्टी: सबसे अधिक जल धारण करती है, पानी धीरे-धीरे निकलता है।
  • दोमट मिट्टी: मध्यम जल धारण करती है, जो पौधों के लिए आदर्श है।
  • महत्व: पौधों की वृद्धि के लिए उपयुक्त जलधारण क्षमता वाली मिट्टी आवश्यक है। अत्यधिक जल निकासी या अत्यधिक जल जमाव दोनों ही पौधों के लिए हानिकारक हैं।

2. पानी की उपस्थिति (Presence of Water)

  • क्रियाकलाप 4: सूखी मिट्टी को गर्म करने पर परखनली की दीवार पर पानी की बूंदें दिखाई देती हैं। यह दर्शाता है कि मिट्टी में नमी (जल) मौजूद होती है।
  • महत्व: मिट्टी में पानी की उपस्थिति उसे नम बनाती है, जिससे वह पौधों की जड़ों को जल उपलब्ध कराती है। यह मिट्टी के कणों को आपस में जोड़ने में भी मदद करती है।

3. सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति (Presence of Microorganisms)

  • क्रियाकलाप 5: नम मिट्टी वाली बोतल में क्षारीय फिनॉलफ्थलीन में भीगी रुई का रंग बदल जाता है, जबकि रेत वाली बोतल में नहीं।
  • कारण: नम मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्मजीव श्वसन क्रिया करते हैं, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$) मुक्त होती है। यह $\text{CO}_2$ क्षारीय फिनॉलफ्थलीन के साथ क्रिया करके रंग परिवर्तन करती है।
  • महत्व: सूक्ष्मजीव मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करके ह्यूमस बनाते हैं और पोषक तत्वों को पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं।

4. सरंध्रता (Porosity)

  • परिभाषा: मिट्टी के कणों के बीच पाए जाने वाले रिक्त स्थान (रंध्रावकाश) की मात्रा।
  • महत्व:
  • वायु संचार: रंध्रावकाश में वायु भरी रहती है, जो पौधों की जड़ों और सूक्ष्मजीवों के श्वसन के लिए आवश्यक है।
  • जल धारण: रंध्रावकाश जल को धारण करते हैं।
  • जड़ों का विकास: उपयुक्त सरंध्रता जड़ों को आसानी से फैलने और विकसित होने में मदद करती है।
  • सूक्ष्मजीवों का वास: विभिन्न प्रकार के जीवाणु इन्हीं रंध्रावकाश में पाए जाते हैं।

5. अन्य गुण (Other Properties)

  • रंग: मिट्टी का रंग उसमें उपस्थित खनिजों (जैसे लौह तत्व से लाल रंग) और ह्यूमस की मात्रा पर निर्भर करता है (ह्यूमस से गहरा रंग)।
  • गंध: नम मिट्टी में एक सोंधी गंध होती है, जो सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कारण होती है।
  • गठन: छूने पर बारीक, चूर्ण, ढेलेदार या चिपचिपी महसूस हो सकती है, जो कणों के आकार पर निर्भर करता है।
💡सुझाव

जलधारण क्षमता के क्रम को याद रखें: चिकनी मिट्टी > दोमट मिट्टी > रेतीली मिट्टी। यह अक्सर तुलनात्मक प्रश्नों में पूछा जाता है।

महत्त्वपूर्ण

बारिश होने के आठ-दस दिनों बाद ही कुओं में पानी का स्तर बढ़ता है, क्योंकि पानी को मिट्टी की परतों से रिसकर भूजल स्तर तक पहुँचने में समय लगता है।

मिट्टी और फसलें

मिट्टी के प्रकार और उसके घटक किसी क्षेत्र में उगने वाली वनस्पति और फसलों का निर्धारण करते हैं। विभिन्न फसलों को अलग-अलग प्रकार की मिट्टी की आवश्यकता होती है।

विभिन्न फसलों के लिए उपयुक्त मिट्टी:

  • चिकनी और दोमट मिट्टी:
  • फसलें: धान, गेहूँ, चना।
  • कारण: इन मिट्टियों की जलधारण क्षमता अच्छी होती है, जो इन फसलों के लिए आवश्यक है। चिकनी मिट्टी ह्यूमस से भरपूर और अत्यधिक उर्वर होती है, जो गेहूँ जैसी फसलों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
  • दोमट मिट्टी:
  • फसलें: मसूर और अन्य दालें।
  • कारण: दोमट मिट्टी में जल निकासी आसानी से हो जाती है, जो दालों के लिए उपयुक्त है क्योंकि इन्हें जल जमाव पसंद नहीं होता। इसकी अच्छी जलधारण क्षमता और वायु संचार भी सहायक है।
  • रेतीली दोमट मिट्टी:
  • फसलें: कपास।
  • कारण: कपास के लिए ऐसी मिट्टी उपयुक्त होती है जिसमें से जल की निकासी आसानी से हो जाए और जो पर्याप्त मात्रा में वायु को धारण करती हो। रेतीली दोमट मिट्टी ये दोनों गुण प्रदान करती है।

मिट्टी के घटक और फसलें:

  • ह्यूमस: जिस मिट्टी में ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है, वह अधिक उपजाऊ होती है और फसलों को अधिक पोषक तत्व प्रदान करती है।
  • जलधारण क्षमता: फसलों की पानी की आवश्यकता के अनुसार मिट्टी की जलधारण क्षमता का चुनाव किया जाता है।
  • वायु संचार: जड़ों के श्वसन के लिए मिट्टी में पर्याप्त वायु संचार आवश्यक है।

| मिट्टी का प्रकार | उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें | |---|---| | चिकनी मिट्टी | धान, गेहूँ, चना | | दोमट मिट्टी | धान, गेहूँ, चना, मसूर, अन्य दालें | | रेतीली दोमट मिट्टी | कपास |

  • किसानों से जानकारी: अपने क्षेत्र के किसानों से वहाँ की मिट्टी के प्रकारों और उगाई जाने वाली फसलों के बारे में जानकारी एकत्र करना एक अच्छा अभ्यास है।
महत्त्वपूर्ण

गेहूँ जैसी फसलें चिकनी मिट्टी में उगाई जाती हैं क्योंकि यह ह्यूमस से भरपूर और अत्यधिक उर्वर होती है।

मिट्टी का अपरदन (Soil Erosion)

मिट्टी का अपरदन मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का प्राकृतिक या मानवीय कारकों द्वारा नष्ट होना या बह जाना है। यह मिट्टी की उर्वरता को कम करता है और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

अपरदन के कारण:

  1. प्राकृतिक कारक:
  • तेज हवा: हवा मिट्टी के सूखे और हल्के कणों को उड़ाकर ले जाती है।
  • बहता पानी (बारिश): तेज बारिश और बाढ़ का पानी मिट्टी की ऊपरी परत को बहाकर ले जाता है।
  • भूस्खलन: पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी और चट्टानों का खिसकना।
  1. मानवीय क्रियाएँ:
  • जंगलों की कटाई (वनों का विनाश): पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं। उनकी कटाई से मिट्टी ढीली हो जाती है और आसानी से अपरदित होती है।
  • अत्यधिक पशु चराई: पशुओं द्वारा लगातार घास चरने से जमीन की वनस्पति आवरण हट जाता है, जिससे मिट्टी हवा और पानी के संपर्क में आकर अपरदित होती है।
  • निर्माण कार्य: सड़कों, इमारतों के निर्माण के लिए भूमि की खुदाई से मिट्टी उजागर होती है और अपरदन का शिकार होती है।
  • अत्यधिक कृषि: लगातार एक ही फसल उगाने या गलत कृषि पद्धतियों से मिट्टी की संरचना कमजोर होती है।
  • भूमि का दोहन: बजरी, रेत, ईंटें, खनिज आदि के लिए भूमि की खुदाई से मिट्टी का अपरदन बढ़ता है।

अपरदन के प्रभाव:

  • उर्वरता में कमी: मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत (ह्यूमस युक्त) नष्ट हो जाती है, जिससे कृषि उत्पादन घटता है।
  • जल स्रोतों का गाद से भरना: अपरदित मिट्टी तालाबों, नदियों और झीलों में जमा होकर उन्हें गाद से भर देती है, जिससे उनकी गहराई कम हो जाती है और बाढ़ आने की संभावना बढ़ जाती है।
  • भूजल स्तर में कमी: मिट्टी के अपरदन से पानी के भूमि में नीचे रिसने की क्रिया कम हो जाती है, जिससे भूजल स्तर गिरता है और सूखे का खतरा बढ़ जाता है।
  • मरुस्थलीकरण: गंभीर अपरदन से उपजाऊ भूमि मरुस्थल में बदल सकती है।

अपरदन की रोकथाम (मिट्टी का संरक्षण):

  • वृक्षारोपण: पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं। कृषि के लिए उपयोग में न लाई जा रही भूमि में वृक्ष लगाने चाहिए।
  • सीढ़ीनुमा खेत: ढालू पहाड़ी भूमि और पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर पानी के बहाव को कम किया जा सकता है।
  • मेड़बंदी: ढलानों पर मेड़ (उभार/ऊंचाई) बनाकर पानी के बहाव को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • फसल चक्र: एक ही भूमि पर अलग-अलग फसलें बारी-बारी से उगाना।
  • जैविक खाद का उपयोग: मिट्टी की संरचना और जलधारण क्षमता में सुधार करता है।
  • वनों की कटाई पर रोक: अनावश्यक वन कटाई को रोकना।
  • खनन स्थलों का पुनर्वास: खनन के बाद खोदे गए गड्ढों को फिर से भरना।
📖परिभाषा

मिट्टी का अपरदन (Soil Erosion): मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का हवा, पानी या अन्य कारकों द्वारा हट जाना।

💡सुझाव

मिट्टी के अपरदन के कारण और रोकथाम के उपाय अक्सर बोर्ड परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। वृक्षारोपण सबसे महत्वपूर्ण रोकथाम उपाय है।

मिट्टी का प्रदूषण और संरक्षण

मिट्टी एक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है, लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण यह प्रदूषित हो रही है। इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

मिट्टी का प्रदूषण (Soil Pollution)

जल और वायु की तरह मिट्टी भी प्रदूषित होती है।

प्रदूषण के कारण:

  1. कूड़ा-करकट:
  • विघटनशील: फल-सब्जियों के छिलके, बचे खाद्य पदार्थ, रद्दी कागज आदि सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटित होकर मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाते हैं।
  • अविघटनशील: प्लास्टिक की थैलियां, टूटे कांच, धातु के टुकड़े, पॉलीथिन, बाल्टियां, बोतलें आदि का अपघटन सूक्ष्मजीवों द्वारा बहुत धीमी गति से या नहीं होता। ये मिट्टी को अनुपयोगी बनाते हैं।
  1. वाहित मल (Sewage):
  • लगातार मिट्टी में मिलने से मिट्टी के रंध्र बंद हो जाते हैं, जिससे वायु और जल का संचरण बाधित होता है। पौधों का उचित विकास नहीं होता।
  • इसमें टायफाइड, डायरिया, टी.बी. आदि रोगों के रोगाणु हो सकते हैं, जो मिट्टी में मिलकर बीमारियां फैला सकते हैं।
  1. कृषि रसायन:
  • कीटनाशी और कवकनाशी: फसलों पर अत्यधिक छिड़काव से मिट्टी में जमा होकर उसे प्रदूषित करते हैं।
  • रासायनिक उर्वरक: अधिक मात्रा में और लगातार उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना और उर्वरता प्रभावित होती है।
  1. खारा जल: निरंतर खारे जल से सिंचाई करने से मिट्टी में लवणता बढ़ जाती है, जिससे वह अनुपजाऊ हो जाती है।
  2. औद्योगिक अपशिष्ट: कल-कारखानों से निकले हानिकारक रसायन और भारी धातुएं मिट्टी को गंभीर रूप से प्रदूषित करती हैं।

मिट्टी का संरक्षण (Soil Conservation)

मिट्टी का निर्माण प्रकृति द्वारा होता है, मनुष्य द्वारा नहीं। अतः इसका उपयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।

संरक्षण के उपाय:

  1. वृक्षारोपण: पेड़-पौधे मिट्टी के सबसे अच्छे संरक्षक हैं। भूमि का वह भाग जो पेड़-पौधों से घिरा रहता है, अपरदन से बचा रहता है।
  2. सीढ़ीनुमा खेती और मेड़बंदी: ढालू पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर या ढलान पर मेड़ बनाकर मिट्टी का अपरदन रोका जा सकता है।
  3. जैविक खाद का उपयोग: कार्बनिक कूड़ा (गोबर, पत्तियां, फसलों के अवशेष, रसोईघर का कचरा) को जैविक खाद के रूप में मिट्टी में वापस मिलाना चाहिए। यह मिट्टी की उर्वरता और संरचना में सुधार करता है।
  4. अपशिष्टों का सुरक्षित निष्कासन: वाहित मल, औद्योगिक अपशिष्टों आदि को बहुत ही सुरक्षित तरीके से निष्कासित किया जाना चाहिए ताकि मिट्टी का प्रदूषण रोका जा सके।
  5. वनों की कटाई पर रोक: अनावश्यक वन कटाई पर प्रतिबंध लगाना।
  6. खनन स्थलों का पुनर्वास: खनन क्रियाओं के दौरान खोदे गए गड्ढों को फिर से भर देना चाहिए।
  7. फसल चक्र और संतुलित उर्वरक उपयोग: लगातार खेती से पोषक तत्वों की कमी होती है। मिट्टी की जांच करके उचित फसल चक्र अपनाना और जैविक/रासायनिक खादों का संतुलित उपयोग करना चाहिए।

मिट्टी की जाँच एवं उपचार (Soil Testing and Remediation)

  • मिट्टी की जाँच: मिट्टी के नमूने की रासायनिक जाँच करके भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा, लवणता, क्षारीयता या अम्लीयता की समस्याओं की जानकारी प्राप्त की जाती है।
  • उपचार: जाँच के आधार पर आवश्यक तत्वों को मिट्टी में डालकर या उचित जैविक/रासायनिक पदार्थों का उपयोग करके भूमि को फिर से कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
याद रखें

मिट्टी का निर्माण मनुष्य द्वारा संभव नहीं है, यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसलिए इसका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है।

🚧ग़लत धारणा

छात्र अक्सर विघटनशील और अविघटनशील कचरे के बीच अंतर भूल जाते हैं। याद रखें, प्लास्टिक और कांच अविघटनशील हैं जो मिट्टी को प्रदूषित करते हैं।

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