सजीवों में उत्सर्जन
यह अध्याय सजीवों में उत्सर्जन की प्रक्रिया पर केंद्रित है, जो शरीर से अनुपयोगी और हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने के लिए आवश्यक है। इसमें मानव उत्सर्जन तंत्र के अंगों जैसे वृक्क, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्रमार्ग की संरचना और कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण दिया गया है। छात्र अमोनिया से यूरिया के निर्माण की प्रक्रिया और विभिन्न जीवों जैसे मछलियों, पक्षियों और सूक्ष्मजीवों में उत्सर्जन के तरीकों के बारे में जानेंगे। अध्याय पौधों में उत्सर्जन को भी शामिल करता है, जिसमें पत्तियों और छालों के माध्यम से अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन और कैल्शियम ऑक्जेलेट जैसे क्रिस्टल का संचय शामिल है।
उत्सर्जन और मानव उत्सर्जन तंत्र का परिचय
सजीवों के शरीर से उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप बने हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। यह शरीर के आंतरिक वातावरण को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
मानव उत्सर्जन तंत्र
मानव उत्सर्जन तंत्र कई अंगों का एक समूह है जो शरीर से नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों, अतिरिक्त जल और लवणों को हटाने का कार्य करता है।
मुख्य अंग:
- वृक्क (किडनी): रक्त को छानकर मूत्र बनाते हैं।
- मूत्रवाहिनी (यूरेटर): वृक्क से मूत्र को मूत्राशय तक ले जाती है।
- मूत्राशय (ब्लैडर): मूत्र को अस्थायी रूप से जमा करता है।
- मूत्रमार्ग (यूरेथ्रा): मूत्र को शरीर से बाहर निकालता है।
वृक्क (किडनी)
- डायफ्रॉम के नीचे उदर गुहा में, रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं।
- गहरे लाल रंग के और सेम के बीज की आकृति के होते हैं।
- प्रत्येक वृक्क से दो रक्त वाहिकाएँ जुड़ी होती हैं:
- एक रक्त को वृक्क के अंदर लाती है।
- दूसरी छने हुए रक्त को बाहर ले जाती है।
मूत्रवाहिनी
- प्रत्येक वृक्क के भीतरी भाग से एक-एक मूत्रवाहिनी निकलती है।
- ये वृक्क से छने हुए मूत्र को मूत्राशय में पहुँचाती हैं।
मूत्राशय एवं मूत्रमार्ग
- मूत्राशय: माँसपेशियों की बनी एक थैली है, जिसमें मूत्र एकत्रित होता है।
- मूत्रमार्ग: मूत्राशय भर जाने पर मूत्रमार्ग के द्वारा मूत्र शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
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उत्सर्जन का महत्व:
- शरीर से विषाक्त पदार्थों को हटाना।
- शरीर में जल और लवणों का संतुलन बनाए रखना।
- रक्तचाप और रक्त की मात्रा को नियंत्रित करना।
उत्सर्जन (Excretion): शरीर से उपापचयी अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया।
वृक्क हमारे शरीर के प्राकृतिक फिल्टर हैं जो रक्त को शुद्ध करते हैं।
मानव शरीर में मूत्र निर्माण की प्रक्रिया
मानव शरीर में मूत्र निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जो विभिन्न चरणों में पूरी होती है। इसका मुख्य उद्देश्य रक्त से हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को हटाना है।
अमोनिया से यूरिया का निर्माण
- अमोनिया का बनना: छोटी आंत में प्रोटीन के पाचन के दौरान अमोनिया गैस बनती है। यह अत्यंत हानिकारक होती है।
- यकृत में रूपांतरण: अमोनिया रक्त के साथ यकृत (लीवर) तक पहुँचती है। यकृत में, अमोनिया कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मिलकर कम हानिकारक यूरिया में बदल जाती है।
$$ \text{अमोनिया} + \text{कार्बन डाइऑक्साइड} \rightarrow \text{यूरिया} $$
- यूरिया का परिवहन: यकृत में बना यूरिया रक्त के माध्यम से वृक्क तक पहुँचता है।
वृक्क द्वारा रक्त का छनन और मूत्र निर्माण
- रक्त का छनन: वृक्क रक्त को छानने का काम करते हैं। इस प्रक्रिया में यूरिया, अतिरिक्त पानी और अन्य अपशिष्ट पदार्थ रक्त से अलग हो जाते हैं।
- मूत्र का निर्माण: छना हुआ तरल पदार्थ मूत्र कहलाता है। मूत्र में मुख्य रूप से पानी और यूरिया होता है।
- मूत्र का निष्कासन: मूत्रवाहिनी से मूत्र मूत्राशय में जमा होता है और फिर मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
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मूत्र के अलावा अन्य उत्सर्जी पदार्थ
मूत्र के अतिरिक्त, शरीर कई अन्य अपशिष्ट पदार्थों को भी बाहर निकालता है:
- मल: पाचन के बाद बचे हुए अनुपयोगी पदार्थ आहार नली द्वारा मल के रूप में शरीर से बाहर निकलते हैं।
- कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प: श्वसन प्रक्रिया के दौरान छोड़ी गई साँस के साथ बाहर निकलते हैं।
- पसीना: त्वचा में मौजूद पसीने की ग्रंथियाँ पसीने का उत्सर्जन करती हैं, जिसके साथ शरीर के लिए अनुपयोगी कई लवण और अतिरिक्त पानी भी बाहर निकल जाते हैं।
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अमोनिया को यूरिया में बदलने वाला अंग यकृत है, न कि वृक्क। वृक्क केवल यूरिया को छानते हैं।
मूत्र में मुख्य रूप से पानी और यूरिया होता है।
विभिन्न जन्तुओं में उत्सर्जन के तरीके
विभिन्न जीव-जंतुओं में उनके आवास और शारीरिक संरचना के आधार पर उत्सर्जन के तरीके अलग-अलग होते हैं।
स्थलीय जन्तुओं में उत्सर्जन
- अधिकांश स्थलीय जन्तु: यूरिया को मूत्र के रूप में उत्सर्जित करते हैं (जैसे मनुष्य, गाय, बिल्ली)।
- शुष्क वातावरण के जन्तु: (जैसे छिपकली, साँप, कबूतर, तिलचट्टा)
- पानी बचाने के लिए अमोनिया को ठोस यूरिक अम्ल में बदल देते हैं।
- इसे ठोस या अर्ध-ठोस रूप में उत्सर्जित करते हैं।
- पक्षियों की बीट में पाया जाने वाला सफेद भाग यूरिक अम्ल ही होता है।
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जलीय जीवों में उत्सर्जन
- मछलियाँ: शरीर में बनने वाली अमोनिया को सीधे पानी में घोलकर उत्सर्जित कर देती हैं। अमोनिया पानी में अत्यधिक घुलनशील होती है।
- सूक्ष्म जीव: (जैसे अमीबा, यूग्लीना, पैरामीशियम, हाइड्रा)
- इनकी शारीरिक रचना सरल होती है और पूरा शरीर पानी से घिरा रहता है।
- अमोनिया गैस बनते ही शरीर की सतह से विसरण (diffusion) द्वारा सीधे पानी में निकाल दी जाती है।
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उत्सर्जी पदार्थों का वर्गीकरण (जन्तुओं के आधार पर)
| जन्तु समूह | प्रमुख उत्सर्जी पदार्थ | उत्सर्जन का तरीका | उदाहरण | |:---|:---|:---|:---| | यूरियोटेलिक | यूरिया | मूत्र के रूप में | मनुष्य, स्तनधारी, मेंढक | | यूरिकोटेलिक | यूरिक अम्ल | ठोस/अर्ध-ठोस रूप में | पक्षी, सरीसृप, कीट | | अमोनोटेलिक | अमोनिया | सीधे पानी में घोलकर / विसरण द्वारा | मछलियाँ, अमीबा, हाइड्रा |
महत्वपूर्ण तथ्य:
- अमोनिया सबसे अधिक विषैली होती है, इसके उत्सर्जन के लिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है।
- यूरिया अमोनिया से कम विषैली होती है और इसे उत्सर्जित करने के लिए मध्यम मात्रा में पानी चाहिए।
- यूरिक अम्ल सबसे कम विषैली होती है और इसे उत्सर्जित करने के लिए बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है, जो शुष्क वातावरण के लिए अनुकूलन है।
यह गलती न करें कि सभी जन्तु यूरिया उत्सर्जित करते हैं। उत्सर्जन का तरीका जन्तु के निवास स्थान और जल उपलब्धता पर निर्भर करता है।
पौधों में उत्सर्जन की प्रक्रिया
पौधे भी जन्तुओं की तरह उत्सर्जन की क्रिया करते हैं, परन्तु इनमें जन्तुओं की तरह उत्सर्जन के लिए विशिष्ट अंग नहीं होते। पौधों में अपशिष्ट पदार्थों को निकालने के कई तरीके होते हैं।
पौधों में उत्सर्जन के सामान्य तरीके
- पत्तियों और छालों का गिरना: पौधों में उपापचयी अपशिष्ट पदार्थ पत्तियों और छालों में जमा हो जाते हैं। जब ये पत्तियाँ या छालें सूखकर गिरती हैं, तो अपशिष्ट पदार्थ भी पौधे के शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यह पौधों के उत्सर्जन का एक मुख्य तरीका है।
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- क्रिस्टलों के रूप में संचय: कुछ पौधों में उत्सर्जी पदार्थ कोशिकाओं के अंदर कैल्शियम ऑक्जेलेट और कैल्शियम कार्बोनेट जैसे अघुलनशील क्रिस्टलों के रूप में संचित हो जाते हैं। ये क्रिस्टल आमतौर पर पौधे को नुकसान नहीं पहुँचाते और जीवन भर कोशिकाओं में बने रह सकते हैं।
- रेफाइड (Raphides): कैल्शियम ऑक्जेलेट के सुई के आकार के क्रिस्टल होते हैं जो जिमीकंद और अरबी की कोशिकाओं में पाए जाते हैं। इनके नुकीले सिरे गले में खुजली या चुभन पैदा कर सकते हैं।
- बरगद की पत्तियाँ: इनमें कैल्शियम कार्बोनेट के क्रिस्टल गुच्छों के रूप में जमा होते हैं।
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- वाष्पोत्सर्जन: पत्तियों के रंध्रों (stomata) से अतिरिक्त पानी का वाष्प के रूप में बाहर निकलना। यह एक प्रकार का उत्सर्जन भी है।
- जड़ों द्वारा उत्सर्जन: कुछ पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से अपशिष्ट पदार्थों को मिट्टी में छोड़ते हैं।
पौधों के उपयोगी उत्सर्जी पदार्थ
पौधे केवल हानिकारक पदार्थों का ही उत्सर्जन नहीं करते, बल्कि कुछ ऐसे पदार्थ भी बनाते हैं जो मनुष्यों के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। इन्हें द्वितीयक उपापचयी उत्पाद (Secondary Metabolites) भी कहते हैं।
- गोंद (Gum): चिपकाने वाले पदार्थ के रूप में उपयोग होता है।
- रबड़ (Rubber): टायर और अन्य उत्पादों में उपयोग होता है।
- राल (Resin): वार्निश और पेंट बनाने में उपयोग होता है।
- टैनिन: चमड़ा उद्योग में उपयोग होता है।
- क्षार (Alkaloids): औषधीय महत्व के होते हैं (जैसे निकोटीन, कैफीन, क्विनिन)।
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पौधों में जन्तुओं की तरह कोई विशिष्ट उत्सर्जन अंग नहीं होते।
गोंद, रबड़, राल पौधों के उत्सर्जी पदार्थ हैं जो हमारे लिए उपयोगी हैं।