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जल
Chhattisgarh · Class 7 · 🔬 Science · Chapter 2

जल

जल का महत्वजल चक्रजल प्रदूषणजल संरक्षणजल के गुणकठोर एवं मृदु जल

यह अध्याय जल के महत्व, पृथ्वी पर इसकी उपलब्धता, जीवन निर्वाह के लिए इसकी आवश्यकता, पीने योग्य जल, जल के भौतिक गुण, एक विलायक के रूप में जल, समुद्री जल का खारापन, जल का असंगत व्यवहार, कठोर और मृदु जल, जल का विद्युत अपघटन, जल चक्र, जल प्रदूषण और जल प्रबंधन जैसे विषयों को कवर करता है। यह छात्रों को जल के महत्व और उसके संरक्षण की आवश्यकता को समझने में मदद करता है।

जल एक प्राकृतिक संसाधन

पृथ्वी पर जल की उपलब्धता
पृथ्वी पर जल की उपलब्धता

जल पृथ्वी पर सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक है।

  • पृथ्वी पर जल का वितरण:
  • पृथ्वी की सतह का लगभग 3/4 भाग जल से ढका है।
  • कुल जल का लगभग 97% महासागरों में है (खारा जल)।
  • लगभग 2% हिमखण्डों के रूप में ध्रुवीय चोटियों पर है (शुद्ध जल, अनुपलब्ध)।
  • शेष 1% नदियों, झीलों, तालाबों और भूमिगत जल के रूप में है (उपयोगी मीठा जल)।
  • वायुमंडल में जल, जलवाष्प, कोहरा और बादलों के रूप में पाया जाता है।
  • उपयोग योग्य जल की कमी:
  • महासागरों का जल खारा होने के कारण पीने, नहाने, कपड़े धोने और सिंचाई के लिए अनुपयोगी है।
  • हिमखण्डों का जल शुद्ध होने के बावजूद आसानी से उपयोग नहीं किया जा सकता।
  • मनुष्यों के लिए उपयोग में आने वाले जल की मात्रा बहुत कम है, लगभग कुल जल का 0.01% (10 लीटर में 1 मिलीलीटर के बराबर)।
  • जल संकट:
  • पृथ्वी पर इतनी जल की उपलब्धता के बावजूद, उपयोग योग्य जल की कमी के कारण जल संकट उत्पन्न होता है।
  • जल का उपयोग सोच-समझकर करना और इसे बर्बाद न करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
महत्त्वपूर्ण

पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का केवल 0.01% ही मानव उपयोग के लिए सुलभ है।

जीवन निर्वाह के लिए जल का महत्व

जल सभी सजीवों के लिए अनिवार्य घटक है।

  • मनुष्य के लिए:
  • मनुष्य के शरीर में भार की दृष्टि से लगभग 70% जल होता है।
  • स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 2 से 3 लीटर जल की आवश्यकता होती है।
  • कार्य:
  • शरीर की विभिन्न क्रियाओं के संचालन के लिए माध्यम।
  • आमाशय में भोजन को पचाने में सहायक।
  • पचे हुए भोजन के अवशोषण और शरीर में संवहन।
  • मूत्र और पसीने के रूप में अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना।
  • पसीने द्वारा शरीर के ताप को नियंत्रित करना।
  • पौधों के लिए:
  • अंकुरण और वृद्धि के लिए आवश्यक।
  • जड़ें जल में विलेय खनिज लवणों को अवशोषित कर पौधों के विभिन्न भागों तक पहुँचाती हैं।
  • हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और जल से क्रिया कर प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
  • जलीय जीवों के लिए:
  • नदी, तालाब और समुद्र में रहने वाले पौधों तथा जंतुओं के लिए जल आवास है।
  • जलीय जीव जल में घुली ऑक्सीजन का उपयोग श्वसन क्रिया में करते हैं।
  • जलीय पौधे कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग प्रकाश संश्लेषण में करते हैं।

| वस्तुएँ | भार के अनुसार जल की लगभग प्रतिशत मात्रा | |---|---| | हाथी | 80% | | पेड़ | 60% | | ब्रेड | 30% | | दूध | 95% | | टमाटर | 90% | | संतरा | 85% | | आलू | 80% |

  • क्रियाकलाप 1 (मूंग के बीज):
  • अवलोकन: भीगे हुए बीज अंकुरित होते हैं, सूखे नहीं। पानी मिलने पर अंकुरित बीजों की वृद्धि होती है।
  • निष्कर्ष: पौधों में अंकुरण और वृद्धि के लिए जल आवश्यक है।
याद रखें

जल शरीर के तापमान को नियंत्रित करने और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पेय जल

पीने योग्य जल को पेय जल कहते हैं।

  • पेय जल की आवश्यकता:
  • सभी स्रोतों से प्राप्त जल पीने योग्य नहीं होता।
  • विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल में घुलित लवण, निलंबित कण और सूक्ष्म जीवाणु हो सकते हैं।
  • कुछ घुलित लवण शरीर के लिए आवश्यक हैं, लेकिन अधिक मात्रा हानिकारक होती है।
  • जल शोधन के तरीके:
  • शहरों में: जल शोधन संयंत्रों द्वारा निलंबित अशुद्धियों और जीवाणुओं को दूर किया जाता है।
  • कीटाणुनाशक:
  • विरंजक चूर्ण (ब्लीचिंग पाउडर): जल में उपस्थित नुकसानदेह जीवाणुओं को दूर करने के लिए।
  • पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवाई): कुएँ के पानी को पीने योग्य बनाने के लिए।
  • क्लोरीन की गोली: कीटाणुनाशक के रूप में।
  • उबालना: जल को कीटाणुरहित करने का एक प्रभावी तरीका।
  • सिरेमिक कैंडल फिल्टर: घरों में निलंबित अशुद्धियों को दूर करने के लिए।
  • पराबैंगनी विकिरण (UV): आजकल जल को कीटाणुरहित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
  • आसुत जल:
  • जल का शुद्धतम रूप है।
  • प्रयोगशालाओं में प्रयोगों के लिए आवश्यक।
  • प्राप्त करने की विधि: जल को गर्म कर वाष्प में बदला जाता है, फिर वाष्प को संघनित कर जल में बदला जाता है (वाष्पीकरण और संघनन)।
  • विशेषता: इसमें कोई खनिज लवण नहीं होते, इसलिए यह पीने के लिए उपयुक्त नहीं होता।
  • जल जनित रोग: सुरक्षित पेय जल की अनुपलब्धता देश में बहुत-सी बीमारियों का प्रमुख कारण है।
💡सुझाव

पेयजल को शुद्ध करने की विभिन्न विधियों (ब्लीचिंग पाउडर, पोटैशियम परमैंगनेट, उबालना, UV) को याद रखें।

📖परिभाषा

आसुत जल: वह जल जो वाष्पीकरण और संघनन की प्रक्रिया से प्राप्त होता है, जिसमें कोई घुलित खनिज लवण नहीं होते।

जल के भौतिक गुण

जल के कुछ महत्वपूर्ण भौतिक गुण निम्नलिखित हैं:

  • रंग, गंध, स्वाद: शुद्ध जल रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन होता है।
  • पारदर्शिता: जल पारदर्शी होता है। इसी कारण प्रकाश जलीय पौधों तक पहुँचता है, जिससे उनमें प्रकाश संश्लेषण होता है।
  • अवस्था: सामान्य ताप पर जल द्रव अवस्था में होता है।
  • हिमांक (Freezing Point):
  • जल का हिमांक 0°C है। इस ताप पर जल बर्फ में परिवर्तित हो जाता है।
  • गलनांक (Melting Point):
  • बर्फ का गलनांक 0°C है। इस ताप पर बर्फ जल में बदल जाती है।
  • क्वथनांक (Boiling Point):
  • जल का क्वथनांक 100°C है। इस ताप पर जल उबलने लगता है और भाप में बदल जाता है।
  • इसी ताप पर भाप को ठंडा करने पर वह जल में बदल जाती है।
  • वाष्पीकरण:
  • कूलर में जल के वाष्पीकरण से ठंडक उत्पन्न होती है। जल वाष्पीकृत होकर परिवेश से ऊष्मा लेता है, जिससे हवा ठंडी हो जाती है।
  • विद्युत चालकता:
  • आसुत जल विद्युत का कुचालक होता है।
  • लेकिन, जल में लवण घुल जाने के कारण विलयन विद्युत का चालक हो जाता है।
  • यही कारण है कि गीली दीवार से संपर्क होने पर खुले बिजली के तार से झटका लग सकता है।
  • क्रियाकलाप 3 (विद्युत चालकता):
  • सामग्री: बीकर, आसुत जल, कार्बन की छड़ें, बल्ब, तार, सेल, नमक।
  • प्रक्रिया:
  1. आसुत जल में इलेक्ट्रोड डुबोकर परिपथ पूरा करें। बल्ब नहीं जलता।
  2. जल में एक चम्मच नमक घोलें और प्रयोग दोहराएँ। बल्ब जलने लगता है।
  • निष्कर्ष: आसुत जल विद्युत का कुचालक है, लेकिन लवण घुलने पर यह विद्युत का चालक बन जाता है।
महत्त्वपूर्ण

शुद्ध जल (आसुत जल) विद्युत का कुचालक होता है, जबकि अशुद्ध जल (लवण घुला हुआ) विद्युत का सुचालक होता है।

जल एक अनोखा विलायक

जल को सार्वत्रिक विलायक (Universal Solvent) कहा जाता है क्योंकि इसमें बहुत से पदार्थ घुलनशील हैं।

  • परिभाषाएँ:
  • विलायक (Solvent): वह पदार्थ जिसमें कोई दूसरा पदार्थ घुलता है (जैसे जल)।
  • विलेय (Solute): वह पदार्थ जो विलायक में घुलता है (जैसे नमक, चीनी)।
  • विलयन (Solution): विलेय और विलायक के घुलने से बना मिश्रण।
  • विलेयता (Solubility):
  • किसी निश्चित ताप पर किसी पदार्थ की 100 मिलीलीटर जल में घुलने वाली अधिकतम मात्रा, उस पदार्थ की उस ताप पर विलेयता कहलाती है।
  • विभिन्न पदार्थों की जल में विलेयता अलग-अलग होती है।
  • तापमान में वृद्धि के साथ ठोस पदार्थों की विलेयता बढ़ती है।
  • ठोस और गैसों की विलेयता:
  • जल में केवल ठोस ही नहीं, बल्कि गैसें जैसे ऑक्सीजन (O₂) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) भी विलेय हैं।
  • कार्बन डाइऑक्साइड जल में ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक विलेय है।
  • शीतल पेय बनाते समय अधिक दाब पर CO₂ गैस जल में विलेय की जाती है।
  • गैसों की विलेयता पर ताप का प्रभाव:
  • गैसों की जल में विलेयता ताप वृद्धि के साथ कम होती जाती है
  • उदाहरण: गर्मी में तालाबों का जल गर्म होने पर उसमें विलेय ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे जलीय जीवों को परेशानी होती है।
  • क्रियाकलाप 4 (घुले लवणों की पहचान):
  • अवलोकन: नल के जल को वाष्पीकृत करने पर स्लाइड पर कुछ पदार्थ (लवण) शेष बचते हैं।
  • निष्कर्ष: नल के जल में खनिज लवण घुले होते हैं।
  • क्रियाकलाप 5 (संतृप्त विलयन और विलेयता पर ताप का प्रभाव):
  • संतृप्त विलयन: किसी निश्चित ताप पर जब विलायक में और अधिक विलेय घुलना बंद हो जाए, तो प्राप्त विलयन को संतृप्त विलयन कहते हैं।
  • अवलोकन: गर्म करने पर नमक की अधिक मात्रा घुल जाती है।
  • निष्कर्ष: तापक्रम में परिवर्तन के साथ विलेयता बदलती है।
📖परिभाषा

सार्वत्रिक विलायक: जल को सार्वत्रिक विलायक कहते हैं क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में विभिन्न पदार्थ घुल सकते हैं।

महत्त्वपूर्ण

गर्म पानी में गैसों की घुलनशीलता कम होती है, यही कारण है कि गर्म पानी में मछली जैसे जलीय जीवों को ऑक्सीजन की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

समुद्री जल का खारापन

समुद्री जल का खारापन उसमें घुले हुए लवणों की अधिक मात्रा के कारण होता है।

  • खारेपन का कारण:
  • वर्षा का जल (आसुत जल) खनिज लवण रहित होता है।
  • वायुमंडलीय प्रदूषण के कारण इसमें विभिन्न गैसें घुल जाती हैं।
  • यह जल जब मृदा और चट्टानों में से होकर बहता है, तो उसमें कई प्रकार के खनिज लवण घुल जाते हैं
  • नदियों से बहकर यह जल समुद्र तक पहुँचता है, जिससे समुद्र के जल में लवणों की मात्रा बढ़ जाती है।
  • समुद्री जल में लवण:
  • समुद्री जल के एक लीटर में लगभग 35 ग्राम लवण होते हैं।
  • प्रमुख लवण:
  • सोडियम क्लोराइड (नमक): सबसे अधिक मात्रा में।
  • सोडियम ब्रोमाइड
  • मैग्नीशियम क्लोराइड
  • पोटैशियम आयोडाइड (अल्प मात्रा में)
  • आयोडीन का महत्व:
  • आयोडीन की अल्प मात्रा हमारे शरीर के लिए आवश्यक है, यह घेंघा रोग से सुरक्षा प्रदान करती है।
  • समुद्री जल से प्राप्त नमक में थोड़ी मात्रा में पोटैशियम आयोडाइड होता है, जिसे शुद्धीकरण में अलग कर दिया जाता है।
  • शुद्ध नमक में निर्धारित मात्रा में आयोडीन मिलाकर उसे आयोडीनयुक्त नमक बनाया जाता है।
महत्त्वपूर्ण

समुद्री जल में मुख्य रूप से सोडियम क्लोराइड घुला होता है, जो इसे खारा बनाता है और पीने के लिए अनुपयुक्त।

जल का असंगत व्यवहार

सामान्यतः पदार्थ का ठोस रूप उसके द्रव रूप की तुलना में भारी होता है (घनत्व अधिक)। लेकिन जल का व्यवहार इसके विपरीत होता है।

  • बर्फ का जल पर तैरना:
  • बर्फ का घनत्व जल के घनत्व से कम होता है।
  • इसलिए, बर्फ के टुकड़े जल के ऊपर तैरते हैं।
  • घनत्व (Density): \( \text{घनत्व} = \frac{\text{द्रव्यमान}}{\text{आयतन}} \)
  • जल का घनत्व 4°C पर अधिकतम होता है (लगभग 1 किलोग्राम प्रति लीटर)।
  • बर्फ का घनत्व लगभग 0.9 किलोग्राम प्रति लीटर होता है।
  • जब बर्फ को जल में डुबोया जाता है, तो उसका लगभग 1/9वाँ भाग जल की सतह के ऊपर रहता है और 8/9वाँ भाग जल के नीचे।
  • जलीय जीवन के लिए महत्व:
  • बर्फ का घनत्व जल की तुलना में कम होना जलीय जीवन के लिए वरदान है।
  • अत्यधिक ठंडे मौसम में जब वायुमंडल का ताप 0°C से भी कम हो जाता है, तो समुद्र और झीलों के ऊपर वाला जल बर्फ के रूप में जमने लगता है।
  • बर्फ जल के ऊपर तैरती है और ऊष्मा की कुचालक होती है।
  • यह बर्फ की परत नीचे वाले जल को जमने से रोकती है और जल का ताप अधिक बनाए रखती है।
  • इस कारण जल में रहने वाले जीव-जंतु और पौधे जीवित रहते हैं।
  • आयतन में वृद्धि:
  • जमने पर जल का घनत्व कम हो जाता है और आयतन बढ़ जाता है
  • उदाहरण: रेफ्रिजरेटर के फ्रीजर में जल से भरी बोतल रखने पर बर्फ के बढ़े हुए आयतन के कारण बोतल टूट जाती है।
  • टाइटैनिक दुर्घटना: बर्फ की चट्टानों के जल के नीचे डूबे हुए भाग का सही अनुमान न लगा पाने के कारण टाइटैनिक नामक जलपोत दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
महत्त्वपूर्ण

जल का घनत्व 4°C पर अधिकतम होता है। 0°C से 4°C तक गर्म करने पर जल का आयतन घटता है और घनत्व बढ़ता है। 4°C के बाद आयतन बढ़ता है और घनत्व घटता है।

याद रखें

बर्फ का जल पर तैरना और 4°C पर जल का अधिकतम घनत्व जलीय जीवों के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है।

कठोर एवं मृदु जल

जल की कठोरता उसमें घुले हुए खनिज लवणों के कारण होती है।

  • मृदु जल (Soft Water):
  • वह जल जो साबुन के साथ बहुत सा झाग देता है।
  • इसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम के लवणों की मात्रा कम होती है।
  • कठोर जल (Hard Water):
  • वह जल जो साबुन के साथ अच्छी तरह झाग नहीं देता
  • इसमें कैल्शियम (Ca²⁺) और मैग्नीशियम (Mg²⁺) के लवण घुले रहते हैं।
  • ये लवण साबुन के साथ क्रिया करके अविलेय पदार्थ (स्कम) बनाते हैं, जिससे झाग कम बनता है।
  • जल की कठोरता के प्रकार:
  1. अस्थायी कठोरता (Temporary Hardness):
  • कारण: जल में मैग्नीशियम और कैल्शियम के बाइकार्बोनेटों \((Mg(HCO_3)_2, Ca(HCO_3)_2)\) के घुलने के कारण।
  • दूर करने का तरीका: इसे जल को उबालकर दूर किया जा सकता है। उबालने पर बाइकार्बोनेट अघुलनशील कार्बोनेट में बदल जाते हैं और अवक्षेपित हो जाते हैं।
  1. स्थायी कठोरता (Permanent Hardness):
  • कारण: जल में कैल्शियम और मैग्नीशियम के क्लोराइडों \((CaCl_2, MgCl_2)\) तथा सल्फेटों \((CaSO_4, MgSO_4)\) लवण घुले होने के कारण।
  • दूर करने का तरीका: इसे उबालकर दूर नहीं किया जा सकता। इसे दूर करने के लिए अन्य रासायनिक विधियों (जैसे सोडा वॉशिंग, आयन-विनिमय) का उपयोग किया जाता है।
  • कठोर जल के नुकसान:
  • साबुन की बर्बादी।
  • कपड़े धोने में कठिनाई।
  • बर्तन और पाइपों में पपड़ी जमना।
📖परिभाषा

मृदु जल: वह जल जो साबुन के साथ आसानी से झाग देता है। कठोर जल: वह जल जो साबुन के साथ आसानी से झाग नहीं देता, कैल्शियम और मैग्नीशियम के लवणों की उपस्थिति के कारण।

🚧ग़लत धारणा

छात्र अक्सर अस्थायी और स्थायी कठोरता के कारणों और उन्हें दूर करने के तरीकों को भ्रमित करते हैं। याद रखें, बाइकार्बोनेट अस्थायी कठोरता का कारण बनते हैं और उबालने से दूर हो जाते हैं, जबकि क्लोराइड और सल्फेट स्थायी कठोरता का कारण बनते हैं और उबालने से दूर नहीं होते।

जल का विद्युत अपघटन

जल का विद्युत अपघटन वह प्रक्रिया है जिसमें विद्युत धारा प्रवाहित करके जल को उसके घटक तत्वों, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है।

  • सिद्धांत:
  • जल \((H_2O)\) हाइड्रोजन \((H_2)\) और ऑक्सीजन \((O_2)\) से मिलकर बना है।
  • विद्युत धारा प्रवाहित करने पर जल के अणु टूट जाते हैं।
  • प्रक्रिया (शिक्षक द्वारा प्रदर्शन):
  • सामग्री: प्लास्टिक की बोतल, रबर कार्क, कार्बन की छड़ें (इलेक्ट्रोड), परखनलियाँ, बैटरी (6 वोल्ट), सल्फ्यूरिक अम्ल, माचिस।
  • सेटअप:
  1. एक चौड़े मुँह वाली प्लास्टिक की बोतल की तली काट दें।
  2. बोतल के मुँह पर दो छिद्र वाला रबर कार्क लगाकर उसमें दो कार्बन की छड़ें (इलेक्ट्रोड) लगाएँ।
  3. बोतल को उल्टा करके दो-तिहाई जल से भरें और कुछ बूँदें सल्फ्यूरिक अम्ल की डालें (जल को विद्युत का सुचालक बनाने के लिए)।
  4. जल से भरी दो परखनलियों को कार्बन इलेक्ट्रोडों पर उल्टा रखें।
  5. इलेक्ट्रोडों को बैटरी से जोड़ें।
  • अवलोकन:
  • कुछ देर बाद इलेक्ट्रोडों से गैस के बुलबुले उठकर परखनलियों में एकत्रित होने लगते हैं।
  • एक परखनली में दूसरी परखनली की अपेक्षा दुगनी गैस एकत्रित होती है।
  • कैथोड (ऋणात्मक इलेक्ट्रोड) पर: हाइड्रोजन गैस \((H_2)\) एकत्रित होती है (आयतन अधिक)।
  • एनोड (धनात्मक इलेक्ट्रोड) पर: ऑक्सीजन गैस \((O_2)\) एकत्रित होती है (आयतन कम)।
  • गैसों का परीक्षण:
  • हाइड्रोजन \((H_2)\): परखनली के मुँह पर जलती माचिस की तीली ले जाने पर, तीली नीली लौ के साथ जलती है और 'पॉप' की आवाज उत्पन्न करती है।
  • ऑक्सीजन \((O_2)\): परखनली के मुँह पर जलती माचिस की तीली ले जाने पर, तीली तेजी से जलने लगती है (ऑक्सीजन दहन में सहायक है)।
  • निष्कर्ष:
  • जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोग से बनता है।
  • जल में आयतन के अनुसार हाइड्रोजन, ऑक्सीजन से दुगनी होती है (अनुपात 2:1)।
  • रासायनिक समीकरण: \( 2H_2O \xrightarrow{\text{विद्युत ऊर्जा}} 2H_2 (g) + O_2 (g) \)
महत्त्वपूर्ण

जल के विद्युत अपघटन से यह सिद्ध होता है कि जल \((H_2O)\) हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना है, जिसमें हाइड्रोजन का आयतन ऑक्सीजन का दुगना होता है।

💡सुझाव

जल के विद्युत अपघटन का प्रयोग और गैसों की पहचान (हाइड्रोजन के लिए 'पॉप' ध्वनि, ऑक्सीजन के लिए जलती तीली का तेजी से जलना) अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है।

जल चक्र

जल चक्र वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी पर जल लगातार अपनी अवस्था और स्थान बदलता रहता है।

  • जल चक्र के चरण:
  1. वाष्पीकरण (Evaporation):
  • सूर्य की ऊष्मा के कारण समुद्रों, झीलों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों का जल लगातार वाष्प में बदलता रहता है।
  • पौधे वाष्पोत्सर्जन द्वारा और जंतु विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं द्वारा भी जलवाष्प उत्पन्न करते हैं।
  • यह जलवाष्प वायुमंडल में एकत्रित होती रहती है।
  1. संघनन (Condensation):
  • जलवाष्प हल्की होने के कारण ऊपर की ओर उठती है।
  • वायुमंडल के ऊपरी सतह पर ताप कम होने के कारण यह जलवाष्प छोटी-छोटी बूँदों के रूप में संघनित होकर बादल बनाती है
  1. वर्षण (Precipitation):
  • बादलों में जल की बूँदें पास-पास आकर बड़ी बूँदें बन जाती हैं।
  • जब ये बूँदें इतनी भारी हो जाती हैं कि वायुमंडल में ठहर नहीं पातीं, तो वे वर्षा, हिमपात या ओलावृष्टि के रूप में पृथ्वी पर गिरती हैं।
  1. संग्रहण (Collection):
  • वर्षा का जल नदियों, झीलों, तालाबों और समुद्रों में वापस पहुँच जाता है।
  • कुछ जल भूमि में रिसकर भूमिगत जल बन जाता है।
  • नदियाँ अंततः जल को समुद्र में ले जाती हैं।
  • महत्व: जल चक्र पृथ्वी पर जल की उपलब्धता को बनाए रखता है, जो जीवन के लिए आवश्यक है।
याद रखें

जल चक्र में वाष्पीकरण, संघनन और वर्षण मुख्य चरण हैं जो पृथ्वी पर जल की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं।

जल प्रदूषण

जल में अवांछित पदार्थों के मिलने से जल का दूषित होना जल प्रदूषण कहलाता है।

  • प्रदूषित जल:
  • विभिन्न स्रोतों के जल में रासायनिक पदार्थ, मल-मूत्र, कूड़ा-करकट, नालियों का गंदा पानी आदि मिल जाते हैं।
  • ऐसा जल पीने और घरेलू कार्यों के योग्य नहीं रहता।
  • प्रदूषक (Pollutants): जल को प्रदूषित करने वाले पदार्थ।
  • जल प्रदूषण के कारण:
  1. मनुष्यों के कार्यकलाप:
  • घरों का कचरा, सड़ी-गली वस्तुएँ नालियों में फेंकना।
  • नदी-तालाबों में नहाना, कपड़े धोना, जानवरों और गाड़ियों को साफ करना।
  • शवों का जल में विसर्जन।
  • देवी-देवताओं की मूर्तियों के विसर्जन से रंगों का जल में घुलना।
  • अस्पतालों से फेंका गया अपशिष्ट, जंतुओं का मल-मूत्र।
  • इनसे जल में अनेक रोगों के जीवाणु मिल जाते हैं।
  1. खेती से:
  • फसलों को बचाने और पैदावार बढ़ाने के लिए कीटनाशी, खरपतवारनाशी दवाइयों और रासायनिक खादों का उपयोग।
  • ये घातक पदार्थ जल में घुलकर नदी, तालाबों में पहुँचते हैं।
  1. उद्योगों से:
  • उद्योगों से निकलने वाले अनुपयोगी और हानिकारक अपशिष्ट पदार्थ (जैसे लैड, मरकरी, क्रोमियम, कैडमियम)।
  • उचित निकासी व्यवस्था न होने पर ये अपशिष्ट सीधे नदी, तालाबों में छोड़ दिए जाते हैं।
  • ये पदार्थ पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को गंभीर हानि पहुँचाते हैं और घातक रोग उत्पन्न करते हैं।
  • जल प्रदूषण की रोकथाम:
  • शासन द्वारा बनाए गए पर्यावरण प्रदूषण रोकने के नियमों का पालन।
  • औद्योगिक संस्थानों में प्रदूषित जल से हानिकारक पदार्थ, कार्बनिक यौगिक, रंग और गंध दूर करने वाले उपकरण लगाना।
  • जल का पुनः उपयोग करना।
  • जन-जागरूकता अभियान चलाना।
  • प्रदूषित जल का उपचार (फिल्ट्रेशन):
  • क्रियाकलाप 6: अशुद्ध जल को बालू, महीन बजरी और मध्यम बजरी की परतों से बने फिल्टर से गुजारना।
  • उद्देश्य: निलंबित अशुद्धियों को दूर करना।
  • क्लोरीनीकरण: फिल्टर किए गए जल में क्लोरीन की गोली डालकर उसे कीटाणुरहित करना।
  • यह प्रक्रिया वाहित जल उपचार संयंत्रों में भी अपनाई जाती है।
💡सुझाव

जल प्रदूषण के मुख्य कारणों (मानवीय, कृषि, औद्योगिक) और रोकथाम के उपायों को बिंदुवार याद रखें।

भौमजल तथा भौमजल स्तर

भूमिगत जल, जिसे भौमजल भी कहते हैं, पृथ्वी की सतह के नीचे पाया जाने वाला जल है।

  • भौमजल (Groundwater):
  • मिट्टी के कणों के बीच के अवकाशों में भरा हुआ जल।
  • यह जल वर्षाजल और अन्य स्रोतों (नदियों, तालाबों) से मिट्टी में रिसकर नीचे गहराई में एकत्रित होता है।
  • भौमजल स्तर (Water Table):
  • वह ऊपरी सीमा जहाँ तक भूमिगत जल मिट्टी के कणों के बीच के सभी अवकाशों को भर देता है।
  • इस स्तर के नीचे पाया जाने वाला जल ही भौमजल कहलाता है।
  • भौमजल स्तर का अवक्षय (Depletion of Water Table):
  • भौमजल को पेयजल, निर्माण कार्य, कृषि कार्य के लिए बोरवेल और पंपों द्वारा लगातार निकाला जाता है।
  • यदि इस जल की पुनः पूर्ति (वर्षा जल के रिसाव द्वारा) पर्याप्त रूप से न हो, तो भौमजल स्तर नीचे गिर सकता है।
  • अवक्षय के कारण:
  • जनसंख्या में वृद्धि: जल की बढ़ती मांग।
  • औद्योगिक और कृषि गतिविधियाँ: उद्योगों और कृषि में अत्यधिक जल का उपयोग।
  • अल्प वर्षा: कम वर्षा के कारण पुनः पूर्ति में कमी।
  • जंगलों का कटना: वनस्पति आवरण की कमी से जल का रिसाव कम होता है।
  • शहरीकरण: कंक्रीट की सतहों के कारण वर्षा जल का भूमि में रिसाव कम होना।
  • वर्षा जल का बह जाना: पर्याप्त भूमि की उपलब्धता न होने से वर्षा जल का भूमि में रिसने के बजाय बह जाना।
📖परिभाषा

भौमजल स्तर: भूमि के नीचे की वह सतह जहाँ से मिट्टी पूरी तरह से जल से संतृप्त होती है।

महत्त्वपूर्ण

भौमजल स्तर का गिरना एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है, जिसके मुख्य कारण अत्यधिक दोहन और अपर्याप्त पुनः पूर्ति हैं।

जल प्रबंधन

जल प्रबंधन का अर्थ है जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण ताकि भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।

  • जल का महत्व:
  • जल एक अमूल्य संपदा है।
  • इसकी प्रत्येक बूँद कीमती है, खासकर जब यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो।
  • जल संरक्षण के प्रयास:
  • मानव गतिविधियों से जल स्तर लगातार घट रहा है, इसलिए इसे बचाने के प्रयास आवश्यक हैं।
  • भारत में जल संरक्षण की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है (जैसे तालाबों का निर्माण)।
  • व्यक्तिगत स्तर पर जल संरक्षण के उपाय:
  • नल खुला न छोड़ें, दाँत साफ करते या नहाते समय आवश्यकतानुसार जल का उपयोग करें।
  • टपकते या बहते हुए नल को तुरंत बंद करें या ठीक करवाएँ।
  • आवश्यकतानुसार ही जल का उपयोग करें, व्यर्थ न बहाएँ।
  • बगीचे में सिंचाई शाम को करें ताकि वाष्पीकरण कम हो।
  • रसोईघर से निकलने वाले जल या सब्जी धोने के बाद प्राप्त जल का उपयोग पौधों को सींचने में करें।
  • वाहनों को धोने के लिए पाइप के बजाय बाल्टी का उपयोग करें।
  • बर्तन, बाल्टी और टंकी में जल को बाहर बहने तक न भरें।
  • कृषि में जल संरक्षण की नवीन तकनीकें:
  • स्प्रिंकलर (फौवारा) सिंचाई: जल को फौवारे के रूप में पौधों पर छिड़का जाता है, जिससे जल की बचत होती है।
  • ड्रिप (टपक) सिंचाई: जल को सीधे पौधों की जड़ों में बूँद-बूँद करके पहुँचाया जाता है, जिससे जल की अत्यधिक बचत होती है।
  • सामुदायिक स्तर पर:
  • औद्योगिक विकास और शहरीकरण के कारण तालाबों की संख्या में कमी आ रही है, जो भविष्य में जल संकट का कारण बन सकती है।
  • ग्राम पंचायतों और अन्य संस्थाओं को जल संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देना चाहिए।
याद रखें

जल प्रबंधन में व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों स्तरों पर जल का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण शामिल है। कृषि में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई महत्वपूर्ण तकनीकें हैं।

वर्षा जल संग्रहण

वर्षा के जल को एकत्रित कर उसका आवश्यकतानुसार उपयोग किया जाना वर्षा जल संग्रहण कहलाता है।

  • उद्देश्य:
  • भूमिगत जल स्तर में वृद्धि करना।
  • जल संकट को कम करना।
  • जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • संग्रहण के तरीके:
  1. छत पर वर्षा जल संग्रहण:
  • मकान की छत पर गिरने वाले वर्षा के जल को पाइप द्वारा भूमि में खोदे गए गड्ढों में पहुँचाया जाता है।
  • गड्ढे की संरचना:
  • उचित आकार का होता है।
  • दीवारें कंक्रीट की बनी होती हैं।
  • तल कच्चा होता है।
  • तल पर क्रमशः गिट्टी और रेत की परतें बिछाई जाती हैं, जो छन्ना (फिल्टर) का कार्य करती हैं।
  • प्रक्रिया: जल छनकर और रिसकर भूमि में पहुँचता है, जिससे भूमिगत जल स्तर में वृद्धि होती है।
  • इस जल को हैंडपंप या नलकूप द्वारा निकालकर उपयोग में लाया जा सकता है।
  1. तालाबों का उपयोग:
  • गाँवों में ग्राम पंचायतें वर्षा के आगमन से पूर्व तालाबों की निचली सतह की खुदाई करवा सकती हैं।
  • इससे वर्षा से प्राप्त जल बाहर बहने के बजाय तल में उपस्थित छिद्रों के माध्यम से भूमिगत जल स्तर तक आसानी से पहुँच जाता है।
  1. छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण:
  • वर्षा से पूर्व छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण करके भी वर्षा के जल का संग्रहण किया जा सकता है।
  • लाभ:
  • भूमिगत जल स्तर में सुधार।
  • पेयजल की उपलब्धता में वृद्धि।
  • सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता।
  • बाढ़ नियंत्रण में सहायक।
📖परिभाषा

वर्षा जल संग्रहण: वर्षा के जल को सीधे उपयोग के लिए या भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने के लिए एकत्रित करना।

महत्त्वपूर्ण

वर्षा जल संग्रहण एक प्रभावी तरीका है जिससे जल संकट को कम किया जा सकता है और भूमिगत जल संसाधनों को रिचार्ज किया जा सकता है।

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