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हमारा पर्यावरण
Chhattisgarh · Class 6 · 🔬 Science · Chapter 2

हमारा पर्यावरण

पर्यावरण के घटकसजीव और निर्जीव घटकस्वपोषी और परपोषीखाद्य श्रृंखलापर्यावरण प्रदूषणवन्यजीव संरक्षण

यह अध्याय हमारे चारों ओर मौजूद सजीव और निर्जीव घटकों से मिलकर बने पर्यावरण का परिचय देता है। इसमें पौधों को स्वपोषी और जंतुओं को परपोषी के रूप में वर्गीकृत किया गया है, साथ ही शाकाहारी, मांसाहारी और सर्वाहारी जंतुओं की अवधारणा को समझाया गया है। छात्र खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के महत्व को समझेंगे। अध्याय वायु, जल, भूमि और ध्वनि प्रदूषण के कारणों और प्रभावों पर भी प्रकाश डालता है, साथ ही वर्षा जल संग्रहण और वन एवं वन्यजीव संरक्षण जैसे समाधानों पर जोर देता है। यह छात्रों को पर्यावरण संतुलन और मानव गतिविधियों के प्रभाव को समझने में मदद करता है।

पर्यावरण के घटक

पर्यावरण के सजीव और निर्जीव घटक
पर्यावरण के सजीव और निर्जीव घटक

हमारा पर्यावरण उन सभी चीजों से मिलकर बना है जो हमारे चारों ओर मौजूद हैं।

पर्यावरण के मुख्य घटक

पर्यावरण के घटकों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  1. सजीव घटक (जैविक घटक):
  • इनमें जीवन होता है।
  • ये साँस लेते हैं, बढ़ते हैं, प्रजनन करते हैं और भोजन ग्रहण करते हैं।
  • उदाहरण: पौधे, जंतु (मनुष्य सहित), सूक्ष्मजीव।
  1. निर्जीव घटक (अजैविक घटक):
  • इनमें जीवन नहीं होता।
  • ये सजीव घटकों के जीवन के लिए आवश्यक होते हैं।
  • उदाहरण: वायु, जल, मिट्टी, प्रकाश, तापमान, खनिज।

सजीव घटकों का वर्गीकरण (भोजन के आधार पर)

सजीव घटकों को उनके भोजन प्राप्त करने के तरीके के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • उत्पादक (Producers):
  • ये अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
  • हरे पौधे क्लोरोफिल की सहायता से सूर्य के प्रकाश, जल और कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
  • इन्हें स्वपोषी भी कहते हैं।
  • उदाहरण: सभी हरे पौधे, शैवाल (काई)।
  • उपभोक्ता (Consumers):
  • ये अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते, बल्कि उत्पादकों या अन्य उपभोक्ताओं पर निर्भर रहते हैं।
  • इन्हें परपोषी भी कहते हैं।
  • इन्हें आगे उप-श्रेणियों में बांटा गया है:
  • शाकाहारी (Herbivores): जो केवल पौधे खाते हैं।
  • उदाहरण: गाय, खरगोश, हिरण, बकरी।
  • मांसाहारी (Carnivores): जो अन्य जंतुओं को खाते हैं।
  • उदाहरण: भेड़िया, बाघ, शेर, साँप।
  • सर्वाहारी (Omnivores): जो पौधे और जंतु दोनों खाते हैं।
  • उदाहरण: मनुष्य, कौआ, कुत्ता, भालू।
  • अपघटक (Decomposers): (हालांकि पाठ्यपुस्तक में सीधे उल्लेख नहीं, यह एक महत्वपूर्ण घटक है)
  • ये मृत पौधों और जंतुओं को सड़ाकर उनके पोषक तत्वों को मिट्टी में वापस मिलाते हैं।
  • उदाहरण: जीवाणु, कवक।

सजीव और निर्जीव घटकों की परस्पर निर्भरता

  • सभी सजीव घटक (पौधे और जंतु) अपने अस्तित्व के लिए निर्जीव घटकों (जैसे वायु, जल, मिट्टी, प्रकाश, तापमान) पर निर्भर करते हैं।
  • उदाहरण के लिए, पौधों को प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य का प्रकाश, जल और कार्बन डाइऑक्साइड (वायु से) चाहिए। जंतुओं को पीने के लिए जल और साँस लेने के लिए वायु चाहिए।
  • इसी प्रकार, सजीव घटक भी निर्जीव घटकों को प्रभावित करते हैं (जैसे पौधे मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं, जंतु मिट्टी में बिल बनाकर उसे ढीला करते हैं)।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t1_scene2] पर्यावरण के सजीव और निर्जीव घटक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

महत्त्वपूर्ण

क्लोरोफिल नामक पदार्थ के कारण पौधों की पत्तियां हरी होती हैं और वे अपना भोजन स्वयं बना पाते हैं।

📖परिभाषा

स्वपोषी: वे जीव जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (जैसे हरे पौधे)। परपोषी: वे जीव जो अपने भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं (जैसे जंतु)।

पर्यावरण का खेल – जीवन का जाल (खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल)

खाद्य श्रृंखला
खाद्य श्रृंखला
खाद्य जाल की जटिलता
खाद्य जाल की जटिलता
जीवन का जाल
जीवन का जाल

पर्यावरण के सभी घटक आपस में जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। यह निर्भरता जीवन के जाल के रूप में समझी जा सकती है।

खाद्य श्रृंखला (Food Chain)

  • खाद्य श्रृंखला एक क्रम है जो दर्शाता है कि एक जीव दूसरे जीव को कैसे खाता है और ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है।
  • यह उत्पादकों से शुरू होकर उपभोक्ताओं तक जाती है।
  • ऊर्जा प्रवाह की दिशा: उत्पादक → प्राथमिक उपभोक्ता → द्वितीयक उपभोक्ता → तृतीयक उपभोक्ता।

खाद्य श्रृंखला के उदाहरण:

  1. घास (उत्पादक) → हिरण (प्राथमिक उपभोक्ता/शाकाहारी) → शेर (द्वितीयक उपभोक्ता/मांसाहारी)
  2. काई (शैवाल) (उत्पादक) → छोटी मछली (प्राथमिक उपभोक्ता) → बड़ी मछली (द्वितीयक उपभोक्ता) → बगुला (तृतीयक उपभोक्ता)
  3. पौधे (उत्पादक) → टिड्डा (प्राथमिक उपभोक्ता) → मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता) → साँप (तृतीयक उपभोक्ता) → बाज (चतुर्थक उपभोक्ता)

[IMAGE: food_chain_fig68] एक सरल खाद्य श्रृंखला का उदाहरण।

खाद्य जाल (Food Web)

  • वास्तविक पारिस्थितिकी तंत्र में, एक जीव अक्सर एक से अधिक प्रकार के भोजन का सेवन करता है और स्वयं भी एक से अधिक शिकारियों द्वारा खाया जाता है।
  • कई खाद्य श्रृंखलाएं आपस में जुड़कर एक जटिल नेटवर्क बनाती हैं, जिसे खाद्य जाल कहते हैं।
  • खाद्य जाल पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक स्थिर बनाता है, क्योंकि यदि एक खाद्य स्रोत कम हो जाता है, तो जीव अन्य स्रोतों पर निर्भर रह सकते हैं।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t4_scene3] खाद्य जाल की जटिलता।

सजीव घटकों की परस्पर निर्भरता

  • भोजन के लिए: सभी उपभोक्ता उत्पादकों या अन्य उपभोक्ताओं पर निर्भर करते हैं।
  • आवास के लिए: कई जंतु (जैसे पक्षी, कीट) पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं या रहते हैं।
  • परागण के लिए: कीट और छोटे पक्षी फूलों में परागण में मदद करते हैं, जिससे पौधों में फल और बीज बनते हैं।
  • बीज प्रकीर्णन के लिए: जंतु बीजों और फलों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाने में मदद करते हैं।
  • ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड चक्र: पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिसे जंतु साँस लेने के लिए उपयोग करते हैं। जंतु कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जिसे पौधे उपयोग करते हैं।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t4_scene1] जीवन का जाल: पर्यावरण के सभी घटक एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।

याद रखें

खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एक-दिशात्मक होता है।

💡सुझाव

खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल में अंतर स्पष्ट करने वाले प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। खाद्य जाल अधिक जटिल और वास्तविक होता है।

घटकों का ढीला होना – पर्यावरण प्रदूषण

वायु प्रदूषण: कारण और प्रभाव
वायु प्रदूषण: कारण और प्रभाव
भूमि और ध्वनि प्रदूषण
भूमि और ध्वनि प्रदूषण
प्रदूषण के प्रभाव और समाधान
प्रदूषण के प्रभाव और समाधान

जब पर्यावरण के किसी घटक (वायु, जल, मिट्टी, ध्वनि) में अवांछित परिवर्तन होते हैं जो जीवों के लिए हानिकारक होते हैं, तो इसे पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं। यह 'जीवन के जाल' को ढीला करता है, जिससे असंतुलन पैदा होता है।

1. वायु प्रदूषण (Air Pollution)

  • परिभाषा: वायुमंडल में हानिकारक गैसों, धूल के कणों, धुएं या अन्य पदार्थों का इतनी मात्रा में मिलना कि वे मानव स्वास्थ्य, पौधों और जंतुओं के लिए हानिकारक हो जाएं।
  • कारण:
  • वाहनों से निकलने वाला धुआं (कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड)।
  • कारखानों से निकलने वाली विषैली गैसें और धुआं।
  • कचरा, सूखी पत्तियों और फसल अवशेषों को जलाना।
  • धूल और परागकण।
  • प्रभाव:
  • सांस की बीमारियाँ (अस्थमा, ब्रोंकाइटिस)।
  • आँखों में जलन, सिरदर्द, चक्कर आना।
  • पौधों के विकास में बाधा।
  • अम्लीय वर्षा (Acid Rain)।
  • ग्लोबल वार्मिंग (Greenhouse Effect)।
  • रोकथाम के उपाय:
  • सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, साइकिल चलाना, पैदल चलना।
  • वाहनों का नियमित प्रदूषण जाँच।
  • कारखानों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाना।
  • कचरा न जलाना, बल्कि उसका सही निपटान करना।
  • अधिक से अधिक पेड़ लगाना।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t5_scene2] वायु प्रदूषण: कारण और प्रभाव।

2. जल प्रदूषण (Water Pollution)

  • परिभाषा: जल में हानिकारक पदार्थों का मिलना, जिससे उसकी गुणवत्ता खराब हो जाती है और वह उपयोग के लायक नहीं रहता।
  • कारण:
  • घरों, नालियों और गटरों का गंदा पानी।
  • कारखानों से निकलने वाला विषैला रासायनिक अपशिष्ट।
  • खेती में उपयोग होने वाले कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक।
  • धार्मिक अनुष्ठानों में मूर्तियों और पूजन सामग्री का विसर्जन।
  • प्रभाव:
  • जलीय जीवों की मृत्यु।
  • मनुष्य और जंतुओं में बीमारियाँ (हैजा, टाइफाइड, पीलिया)।
  • पीने योग्य पानी की कमी।
  • फसलों को नुकसान।
  • रोकथाम के उपाय:
  • गंदे पानी को उपचारित करके नदियों में छोड़ना।
  • रासायनिक अपशिष्टों का उचित निपटान।
  • कीटनाशकों और उर्वरकों का कम उपयोग।
  • वर्षा जल संग्रहण (Rain Water Harvesting)।

3. भूमि प्रदूषण (Soil Pollution)

  • परिभाषा: मिट्टी में हानिकारक पदार्थों का मिलना, जिससे उसकी गुणवत्ता और उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
  • कारण:
  • रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग।
  • औद्योगिक अपशिष्ट और ठोस कचरा (प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक कचरा)।
  • घरों से निकलने वाला कचरा।
  • पेड़ों की कटाई से मिट्टी का कटाव।
  • प्रभाव:
  • फसलों की पैदावार में कमी।
  • खाद्य श्रृंखला में विषैले पदार्थों का प्रवेश।
  • मिट्टी की उर्वरता का ह्रास।
  • भूजल का प्रदूषण।
  • रोकथाम के उपाय:
  • रासायनिक खाद की जगह प्राकृतिक खाद (जैसे गोबर की खाद) का उपयोग।
  • कीटनाशकों का कम उपयोग।
  • कचरे का उचित प्रबंधन (पुनर्चक्रण, कंपोस्ट बनाना)।
  • वृक्षारोपण।

4. ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution)

  • परिभाषा: अत्यधिक और अवांछित शोर, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है।
  • कारण:
  • वाहनों के हॉर्न और इंजन का शोर।
  • कारखानों की मशीनें।
  • लाउडस्पीकर, डीजे, पटाखे।
  • निर्माण कार्य।
  • प्रभाव:
  • सुनने की क्षमता में कमी या बहरापन।
  • चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, चक्कर आना, तनाव।
  • नींद न आना।
  • जंतुओं के व्यवहार में परिवर्तन।
  • रोकथाम के उपाय:
  • कम शोर वाले वाहनों और मशीनों का उपयोग।
  • हॉर्न का अनावश्यक उपयोग न करना।
  • लाउडस्पीकर और डीजे का सीमित उपयोग।
  • औद्योगिक क्षेत्रों को आवासीय क्षेत्रों से दूर स्थापित करना।
  • पेड़ लगाना (पेड़ ध्वनि को अवशोषित करते हैं)।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t5_scene4] भूमि और ध्वनि प्रदूषण।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t5_scene5] प्रदूषण के प्रभाव और समाधान।

🚧ग़लत धारणा

छात्र अक्सर प्रदूषण के प्रकारों को मिला देते हैं। प्रत्येक प्रदूषण के कारण और प्रभाव अलग-अलग याद रखें।

💡सुझाव

प्रदूषण के प्रत्येक प्रकार के लिए कम से कम दो कारण और दो प्रभाव याद रखें। रोकथाम के उपाय भी महत्वपूर्ण हैं।

वर्षा जल संग्रहण (Rain Water Harvesting)

वर्षा जल संग्रहण एक महत्वपूर्ण तरीका है जिससे हम जल प्रदूषण को कम कर सकते हैं और जल संसाधनों को बढ़ा सकते हैं।

वर्षा जल संग्रहण क्या है?

  • बारिश के पानी को इकट्ठा करना, उसका भंडारण करना और बाद में उसका उपयोग करना वर्षा जल संग्रहण कहलाता है।
  • इसका मूल सिद्धांत है: "जल जहाँ गिरे, वहीं एकत्र कीजिए।"

वर्षा जल संग्रहण के तरीके:

  1. छत पर वर्षा जल संग्रहण:
  • भवनों की छत पर एकत्रित वर्षा के जल को पाइपों द्वारा भंडारण टैंक में पहुँचाया जाता है।
  • इस जल में छत पर मौजूद मिट्टी के कण हो सकते हैं, जिन्हें उपयोग करने से पहले नीचे बैठने दिया जाता है।
  • इस जल को सीधे भंडारण टैंक में एकत्रित करने के बजाय, इसे पाइपों द्वारा जमीन में बने गड्ढे तक भी ले जाया जा सकता है।
  • यह गड्ढा जल को मिट्टी में रिसने देता है, जिससे भूमिगत जल की पुनः पूर्ति होती है।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t5_scene5] वर्षा जल संग्रहण का एक उदाहरण।

  1. सड़क किनारे नालियों द्वारा संग्रहण:
  • सड़क के किनारे बनी नालियों द्वारा एकत्रित वर्षा का जल सीधे भूमि में पहुँचने दिया जाता है।
  • यह भी भूमिगत जलस्तर को बढ़ाने में मदद करता है।

वर्षा जल संग्रहण के लाभ:

  • पीने और घरेलू उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ती है।
  • भूमिगत जलस्तर में वृद्धि होती है।
  • बाढ़ और मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद मिलती है।
  • पानी के बिल में कमी आती है।
  • जल प्रदूषण कम होता है, क्योंकि वर्षा का जल आमतौर पर शुद्ध होता है।

[IMAGE: चित्र 2-3] छत पर वर्षा जल संग्रहण का चित्र।

महत्त्वपूर्ण

वर्षा जल संग्रहण से भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने में मदद मिलती है, जो सूखे की स्थिति से निपटने में सहायक है।

वन संरक्षण, वृक्षारोपण एवं वन्य जीवों की सुरक्षा

पौधे मिट्टी के कटाव को रोकते हैं
पौधे मिट्टी के कटाव को रोकते हैं
वन और वन्य जीवों की सुरक्षा
वन और वन्य जीवों की सुरक्षा

मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है, जिससे वन और वन्यजीवों को हानि हो रही है। इस असंतुलन को रोकने के लिए वन संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा आवश्यक है।

वन संरक्षण (Forest Conservation)

  • वनों का महत्व:
  • ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं।
  • मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) को रोकते हैं।
  • वर्षा लाने में सहायक होते हैं।
  • वन्यजीवों को आवास प्रदान करते हैं।
  • जलवायु को नियंत्रित करते हैं।
  • ईंधन, लकड़ी, औषधियाँ और अन्य वनोपज प्रदान करते हैं।
  • वन संरक्षण के उपाय:
  • वनों की कटाई पर रोक: अवैध कटाई को रोकना और कानूनी प्रतिबंध लगाना।
  • वृक्षारोपण (Afforestation): अधिक से अधिक पेड़ लगाना।
  • वनाग्नि (Forest Fires) से बचाव: आग लगने से रोकना और बुझाने के उपाय करना।
  • सामाजिक वानिकी: लोगों को पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित करना।

[IMAGE: plants_prevent_soil_erosion_fig12] पौधे मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।

वन्य जीवों की सुरक्षा (Wildlife Protection)

  • वन्य जीवों का महत्व:
  • खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल का अभिन्न अंग हैं, पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखते हैं।
  • जैव विविधता (Biodiversity) का हिस्सा हैं।
  • पर्यावरण के स्वास्थ्य के संकेतक हैं।
  • वन्य जीव सुरक्षा के उपाय:
  • शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध: वन्यजीवों के शिकार को गैरकानूनी घोषित करना।
  • अभयारण्य (Sanctuaries) और राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) की स्थापना:
  • ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहते हैं।
  • यहाँ मानवीय गतिविधियों (जैसे शिकार, पेड़ों की कटाई) पर प्रतिबंध होता है।
  • छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय उद्यान: गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान, इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान।
  • जैव विविधता का संरक्षण: विभिन्न प्रजातियों और उनके आवासों की रक्षा करना।
  • जन जागरूकता: लोगों को वन्यजीवों के महत्व के बारे में शिक्षित करना।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t7_scene3] वन और वन्य जीवों की सुरक्षा।

छत्तीसगढ़ की जैव विविधता

  • छत्तीसगढ़ राज्य वनों और वन्यजीवों से समृद्ध है।
  • प्रमुख वनोपज: साल, सागौन, बीजा, शीशम, बांस, तेंदू, महुआ, सरई, सेमल।
  • प्रमुख वन्य जीव-जंतु: खरगोश, चीतल, सांभर, कोटरी, नीलगाय, वन भैंसा (बायसन), हाथी, भालू, शेर, तेंदुआ, भेड़िया, लकड़बग्घा, लोमड़ी।
  • प्रमुख पक्षी: पहाड़ी मैना, कोयल, धुर्राज, मोर, बगुला।
  • सर्पों की प्रजातियाँ: नाग, करैत, अजगर, धामन।
  • यहां के आदिवासी समुदाय पूर्ण रूप से वनों पर आश्रित हैं, जो जैव विविधता का एक अच्छा उदाहरण है।
📖परिभाषा

अभयारण्य: वह संरक्षित क्षेत्र जहाँ वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षा प्रदान की जाती है। राष्ट्रीय उद्यान: वह बड़ा संरक्षित क्षेत्र जहाँ वन्यजीवों के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को भी संरक्षित किया जाता है।

याद रखें

वन्यजीवों के संरक्षण से पारिस्थितिकी संतुलन बना रहता है, जो हमारे पर्यावरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अत्यधिक वर्षा और सूखा पड़ने के प्रभाव

अत्यधिक वर्षा के प्रभाव
अत्यधिक वर्षा के प्रभाव
सूखे के विनाशकारी प्रभाव
सूखे के विनाशकारी प्रभाव
जल चक्र
जल चक्र

वर्षा जल चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसकी मात्रा में अत्यधिक भिन्नता (बहुत अधिक या बहुत कम) पर्यावरण और जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

1. यदि अत्यधिक वर्षा हो (बाढ़)

  • कारण: जब किसी क्षेत्र में सामान्य से बहुत अधिक वर्षा होती है, तो नदियाँ, नाले और जलाशय भर जाते हैं।
  • परिणाम:
  • जलस्तर बढ़ जाता है और पानी आसपास के निचले इलाकों में फैल जाता है, जिसे बाढ़ कहते हैं।
  • हानियाँ:
  • खेत-खलिहान, घर, सड़कें और अन्य संरचनाएँ पानी में डूब जाती हैं।
  • फसलों को भारी नुकसान होता है, जिससे खाद्य संकट उत्पन्न हो सकता है।
  • पशु बह जाते हैं या मर जाते हैं।
  • मानव जीवन और संपत्ति को भारी क्षति पहुँचती है।
  • बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी कई समस्याएँ बनी रहती हैं, जैसे बीमारियों का फैलना (हैजा, मलेरिया)।
  • जलजीव कीचड़ में फँसकर मर जाते हैं।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t8_scene1] अत्यधिक वर्षा के प्रभाव।

2. यदि बहुत समय तक वर्षा न हो (सूखा)

  • कारण: जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक (जैसे एक वर्ष या उससे भी अधिक) वर्षा नहीं होती, तो उस स्थिति को सूखा कहते हैं।
  • परिणाम:
  • भूमिगत जलस्तर बहुत नीचे चला जाता है।
  • कुएँ, तालाब और नदियाँ सूख जाती हैं।
  • मिट्टी में नमी की कमी हो जाती है और वह बंजर दिखने लगती है।
  • हानियाँ:
  • खाद्यान्न और चारे की भारी कमी हो जाती है, जिससे मनुष्य और पशु दोनों प्रभावित होते हैं।
  • पेड़-पौधे सूख जाते हैं, और कई जीव-जंतु पानी की कमी से मर जाते हैं।
  • पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है।
  • लोगों को पीने के पानी की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है।

[IMAGE: cg_c6_science_ch02_t8_scene2] सूखे के विनाशकारी प्रभाव।

जल का विवेकपूर्ण उपयोग

  • पृथ्वी पर उपयोग के लिए उपलब्ध जल की मात्रा अत्यंत सीमित है।
  • जनसंख्या वृद्धि और अत्यधिक उपयोग के कारण इसकी मात्रा लगातार घटती जा रही है।
  • इसलिए, यह आवश्यक है कि जल का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए और सावधानी बरती जाए ताकि जल का अपव्यय न हो।
  • जल संरक्षण के उपाय अपनाना जैसे वर्षा जल संग्रहण, कम पानी का उपयोग करना, पानी की बर्बादी रोकना।

[IMAGE: water_cycle_fig92] जल चक्र।

महत्त्वपूर्ण

बाढ़ और सूखा दोनों ही प्राकृतिक आपदाएँ हैं जो पर्यावरण के असंतुलन और मानवीय गतिविधियों (जैसे वनों की कटाई) से बढ़ सकती हैं।

याद रखें

जल का विवेकपूर्ण उपयोग और जल संरक्षण के उपाय भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक हैं।

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