प्रकाश : परावर्तन एवं अपवर्तन समतल सतह से
यह अध्याय प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन की मूलभूत घटनाओं पर केंद्रित है, विशेष रूप से समतल सतहों के संदर्भ में। छात्र प्रकाश के सरल रेखीय गमन, छाया के निर्माण, और समतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंबों की विशेषताओं (जैसे आभासी, सीधा, समान आकार और समान दूरी पर) का अध्ययन करते हैं। परावर्तन के नियमों को विस्तार से समझाया गया है, जिसमें आपतन कोण और परावर्तन कोण की समानता तथा आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब का एक ही तल में होना शामिल है। अध्याय में समतल दर्पण के घूमने पर परावर्तित किरण पर पड़ने वाले प्रभाव और बहु प्रतिबिंबों के निर्माण की भी चर्चा की गई है। अपवर्तन खंड में, प्रकाश के एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करने पर उसके पथ में विचलन, अपवर्तनांक की अवधारणा (निरपेक्ष और सापेक्ष), स्नेल का नियम, क्रांतिक कोण और पूर्ण आंतरिक परावर्तन जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को शामिल किया गया है। दैनिक जीवन में अपवर्तन और पूर्ण आंतरिक परावर्तन के उदाहरण, जैसे पानी में सिक्के का उठा हुआ दिखना और मृगतृष्णा, भी समझाए गए हैं। यह अध्याय छात्रों को प्रकाशिकी की बुनियादी समझ प्रदान करता है, जो उच्च कक्षाओं में प्रकाश के अध्ययन के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है।
प्रकाश का सरल रेखीय गमन और छाया निर्माण
प्रकाश हमेशा सरल रेखा में गमन करता है। जब प्रकाश के मार्ग में कोई अपारदर्शी वस्तु आती है, तो उसकी छाया बनती है।
- छाया का निर्माण: प्रकाश स्रोत से आने वाली किरणें वस्तु के किनारों से मुड़कर आगे नहीं जा पातीं, जिससे वस्तु के पीछे प्रकाश-रहित क्षेत्र बन जाता है, जिसे छाया कहते हैं।
- छाया का आकार: छाया का आकार वस्तु, प्रकाश स्रोत और पर्दे की सापेक्ष स्थिति पर निर्भर करता है।
- प्रकाश स्रोत के पास वस्तु: बड़ी छाया।
- प्रकाश स्रोत से दूर वस्तु: छोटी छाया।
- पर्दे को वस्तु से दूर ले जाने पर: छाया बड़ी होती है।
- पर्दे को वस्तु के पास लाने पर: छाया छोटी होती है।
- वस्तु की पारदर्शिता:
- पूर्णतः पारदर्शक वस्तु की छाया नहीं बनती।
- अधिकांश वस्तुएँ आंशिक रूप से प्रकाश को परावर्तित, अपवर्तित या अवशोषित करती हैं, जिससे उनकी छाया बनती है।
छाया की लंबाई का सूत्र: \( \frac{\text{वस्तु की लंबाई}}{\text{वस्तु व प्रकाश स्रोत की दूरी}} = \frac{\text{छाया की लंबाई}}{\text{छाया व प्रकाश स्रोत की दूरी}} \) या \( \frac{h}{d_0} = \frac{h'}{d_1} \) जहाँ, \( h \) = वस्तु की लंबाई, \( h' \) = छाया की लंबाई, \( d_0 \) = वस्तु व प्रकाश स्रोत की दूरी, \( d_1 \) = छाया व प्रकाश स्रोत की दूरी।
महत्वपूर्ण अवलोकन:
- छाया का आकार प्रकाश स्रोत के आकार और वस्तु की स्थिति पर भी निर्भर करता है। बिंदु स्रोत से तीक्ष्ण छाया बनती है, जबकि विस्तृत स्रोत से प्रच्छाया (umbra) और उपच्छाया (penumbra) बनती है।
- यह अवधारणा खगोलीय घटनाओं जैसे सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को समझने में भी सहायक है।
प्रकाश का सरल रेखीय गमन प्रकाशिकी का एक मूलभूत सिद्धांत है, जो छाया निर्माण और प्रतिबिंब जैसी कई घटनाओं की व्याख्या करता है।
छाया की लंबाई का निर्धारण और कारक
छाया की लंबाई कई कारकों पर निर्भर करती है, जिन्हें क्रियाकलाप 1 में विस्तार से समझाया गया है। इन कारकों को समझना छाया के व्यवहार की भविष्यवाणी करने में मदद करता है।
- वस्तु की लंबाई (h): सीधे आनुपातिक। लंबी वस्तु की छाया लंबी होती है।
- प्रकाश स्रोत से वस्तु की दूरी (d₀): व्युत्क्रमानुपातिक। स्रोत के पास वस्तु की छाया लंबी होती है, दूर होने पर छोटी।
- प्रकाश स्रोत से पर्दे की दूरी (d₁): सीधे आनुपातिक। पर्दे को दूर ले जाने पर छाया लंबी होती है।
क्रियाकलाप 1 से निष्कर्ष:
- यदि \( d_0 \) घटाई जाए (पेंसिल स्रोत के पास), और \( d_1 \) बढ़ाई जाए (पर्दा दूर), तो छाया का आकार बढ़ता है।
- यदि \( d_0 \) बढ़ाई जाए (पेंसिल स्रोत से दूर), तो छाया छोटी हो जाती है।
- यदि पेंसिल व पर्दे को स्थिर रखा जाए और स्रोत को पेंसिल के पास लाया जाए, तो छाया बड़ी होती है। स्रोत को दूर ले जाने पर छाया छोटी हो जाती है।
- यदि पेंसिल व स्रोत को स्थिर रखा जाए और पर्दे को पेंसिल से दूर बढ़ाया जाए, तो छाया का आकार बड़ा हो जाता है।
सूत्र की पुष्टि: क्रियाकलाप में दिए गए सूत्र \( h' = h \frac{d_1}{d_0} \) का उपयोग करके विभिन्न दूरियों के लिए छाया की लंबाई की गणना की जा सकती है और प्रायोगिक अवलोकनों से इसकी पुष्टि की जा सकती है। यह सूत्र समान त्रिभुजों के सिद्धांत पर आधारित है।
| क्र. | मोमबत्ती से पेंसिल की दूरी (d₀) | मोमबत्ती से पर्दे की दूरी (d₁) | पेंसिल की लम्बाई (h) | सूत्र से प्राप्त छाया की लम्बाई (h') | |---|---|---|---|---| | 1. | 20 सेमी. | 10 सेमी. | 10 सेमी. | \( 10 \times \frac{10}{20} = 5 \) सेमी. | | 2. | 20 सेमी. | 20 सेमी. | 10 सेमी. | \( 10 \times \frac{20}{20} = 10 \) सेमी. | | 3. | 30 सेमी. | 10 सेमी. | 10 सेमी. | \( 10 \times \frac{10}{30} = 3.33 \) सेमी. | | 4. | 30 सेमी. | 20 सेमी. | 10 सेमी. | \( 10 \times \frac{20}{30} = 6.67 \) सेमी. | | 5. | 40 सेमी. | 10 सेमी. | 10 सेमी. | \( 10 \times \frac{10}{40} = 2.5 \) सेमी. | | 6. | 40 सेमी. | 20 सेमी. | 10 सेमी. | \( 10 \times \frac{20}{40} = 5 \) सेमी. |
छाया की लंबाई से संबंधित प्रश्न अक्सर आनुपातिकता के सिद्धांत पर आधारित होते हैं। सूत्र को याद रखना और विभिन्न स्थितियों में इसे लागू करना महत्वपूर्ण है।
प्रकाश के परावर्तन के नियम
प्रकाश का परावर्तन वह घटना है जिसमें प्रकाश किरण किसी सतह से टकराकर उसी माध्यम में वापस लौट जाती है। समतल दर्पण परावर्तन के नियमों का पालन करता है।
समतल दर्पण:
- समतल दर्पण में एक सिल्वर धातु की पतली परत होती है, जो प्रकाश का अच्छा परावर्तक होती है।
- इसे सुरक्षित रखने के लिए एक ओर पारदर्शी काँच और दूसरी ओर गहरा रंग पोता जाता है।
परावर्तन के नियम:
- पहला नियम: आपतन कोण (i) सदैव परावर्तन कोण (r) के बराबर होता है (\( \angle i = \angle r \))।
- दूसरा नियम: आपतित किरण, आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण सभी एक ही तल में होते हैं।
- आपतन बिंदु: दर्पण पर वह बिंदु जहाँ आपतित किरण पड़ती है।
- अभिलंब: आपतन बिंदु पर दर्पण की सतह के लंबवत खींची गई काल्पनिक रेखा।
- यह नियम सुनिश्चित करता है कि परावर्तन एक 2D घटना है, जिसे एक समतल पर दर्शाया जा सकता है।
अभिलंब की दिशा को समझना:
- अभिलंब हमेशा दर्पण की सतह के लंबवत (90° पर) होता है।
- यदि दर्पण को घुमाया जाता है, तो अभिलंब की दिशा भी दर्पण के साथ घूम जाती है।
परावर्तन तल:
- आपतित किरण और अभिलंब जिस तल पर होते हैं, परावर्तित किरण भी उसी तल पर होती है।
- यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी किरणें एक ही तल में हों, प्रायोगिक सेटअप में कागज़ की सतह दर्पण के तल के ठीक अभिलंब पर होनी चाहिए।
चित्र 3 (अ) और (ब) का विश्लेषण:
- चित्र 3 (अ): दर्शाता है कि आपतित किरण (लाल), अभिलंब और परावर्तित किरण (नीली) सभी एक ही तल (पीला तल 1) में स्थित हैं।
- चित्र 3 (ब): यदि दर्पण को घुमाया जाता है, तो नया अभिलंब (N') भी घूम जाता है, लेकिन परावर्तन के नियम अभी भी लागू होते हैं।
आपतन कोण (Angle of Incidence): आपतित किरण और अभिलंब के बीच का कोण। परावर्तन कोण (Angle of Reflection): परावर्तित किरण और अभिलंब के बीच का कोण।
समतल दर्पण के घूर्णन का परावर्तित किरण पर प्रभाव
जब एक समतल दर्पण को किसी कोण से घुमाया जाता है, जबकि आपतित किरण स्थिर रहती है, तो परावर्तित किरण पर इसका एक विशिष्ट प्रभाव पड़ता है।
स्थिति:
- आपतित किरण स्थिर है।
- समतल दर्पण को आपतन बिंदु पर \( \theta \) कोण से घुमाया जाता है।
प्रभाव:
- अभिलंब का घूर्णन: दर्पण के घूमने के साथ, आपतन बिंदु पर बना अभिलंब भी \( \theta \) कोण से घूम जाता है।
- आपतन कोण में परिवर्तन: चूंकि अभिलंब घूम गया है, आपतित किरण और नए अभिलंब के बीच का कोण (नया आपतन कोण) बदल जाता है।
- यदि दर्पण को \( \theta \) कोण से घुमाया जाता है, तो नया आपतन कोण \( i' = i - \theta \) (या \( i + \theta \), दर्पण के घूमने की दिशा पर निर्भर करता है)।
- परावर्तन कोण में परिवर्तन: परावर्तन के नियम के अनुसार, नया परावर्तन कोण भी नए आपतन कोण के बराबर होगा: \( r' = i' \)।
- परावर्तित किरण का घूर्णन: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परावर्तित किरण मूल स्थिति से \( 2\theta \) कोण से घूम जाती है।
उदाहरण (चित्र 4 के अनुसार):
- मूल आपतन कोण \( i = 52° \)।
- दर्पण को \( \theta = 35° \) से घुमाया गया।
- नया अभिलंब भी 35° घूम गया।
- नया आपतन कोण \( i' = 52° - 35° = 17° \)।
- नया परावर्तन कोण \( r' = 17° \)।
- परावर्तित किरण का कुल घूर्णन: \( (52° + 35°) + (17°) = 87° \) (मूल परावर्तित किरण से नए परावर्तित किरण तक का कोण)।
- मूल परावर्तित किरण अभिलंब से 52° पर थी।
- नया परावर्तित किरण नए अभिलंब से 17° पर है।
- अभिलंब 35° घूम गया।
- अतः, परावर्तित किरण का कुल घूर्णन \( (52° + 35°) - 17° = 70° \) या \( 2 \times 35° \)।
निष्कर्ष: जब समतल दर्पण को आपतन बिंदु पर \( \theta \) कोण से घुमाया जाता है, तो परावर्तित किरण \( 2\theta \) कोण से घूम जाती है।
क्रियाकलाप 2 (सारणी): | क्रम | आपतन कोण | दर्पण को \( \theta \) कोण से घूमाने पर | नई स्थिति में परावर्तन कोण | |---|---|---|---| | 1. | 30° | 10° | 20° | | 2. | 45° | 15° | 30° | | 3. | 60° | 20° | 40° |
(यह सारणी उदाहरण के लिए है, आपतन कोण और \( \theta \) के मानों के आधार पर परिणाम भिन्न हो सकते हैं।)
परावर्तित किरण का घूर्णन = \( 2 \times \text{दर्पण का घूर्णन कोण} \)
यह \( 2\theta \) नियम बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है। इसे याद रखें और इसके अनुप्रयोग को समझें।
समतल दर्पण द्वारा बिंदु वस्तु का प्रतिबिंब निर्माण
समतल दर्पण द्वारा बनने वाले प्रतिबिंब की प्रकृति और स्थिति को समझना महत्वपूर्ण है।
प्रतिबिंब निर्माण:
- जब कोई बिंदु वस्तु (O) समतल दर्पण के सामने रखी जाती है, तो उससे निकलने वाली प्रकाश किरणें दर्पण से परावर्तित होती हैं।
- हमारी आँखें इन परावर्तित किरणों को एक बिंदु (I) से आती हुई प्रतीत होती हैं, जो वस्तु का प्रतिबिंब होता है।
आभासी प्रतिबिंब (Virtual Image):
- जब प्रकाश किरणें वास्तव में किसी बिंदु पर नहीं मिलतीं, बल्कि मिलती हुई प्रतीत होती हैं, तो ऐसे बिंदु को आभासी बिंदु कहते हैं।
- इस प्रकार बने प्रतिबिंब को आभासी प्रतिबिंब कहते हैं।
- समतल दर्पण हमेशा आभासी और सीधा प्रतिबिंब बनाता है।
- यह प्रतिबिंब दर्पण के पीछे बनता है और इसे पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
प्रतिबिंब की स्थिति और दूरी:
- समतल दर्पण में वस्तु का प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने होती है।
- अर्थात्, वस्तु की दूरी (OB) = प्रतिबिंब की दूरी (BI)।
ज्यामितीय प्रमाण (चित्र 6 के अनुसार):
- वस्तु O से एक किरण OA दर्पण पर आपतित होती है और AC दिशा में परावर्तित होती है।
- दूसरी किरण OB, जो दर्पण पर अभिलंबित है, परावर्तन के बाद उसी दिशा में वापस लौट आती है।
- परावर्तित किरणों AC और OB को दर्पण के पीछे बढ़ाने पर वे बिंदु I पर मिलती हैं।
- त्रिभुज \( \triangle OBA \) और \( \triangle IBA \) में:
- \( \angle OAN = \angle i \) (आपतन कोण)
- \( \angle NAC = \angle r \) (परावर्तन कोण)
- परावर्तन के नियम से: \( \angle i = \angle r \)
- \( \angle BOA = \angle OAN \) (एकांतर कोण) \( \Rightarrow \angle BOA = \angle i \)
- \( \angle BIA = \angle NAC \) (संगत कोण) \( \Rightarrow \angle BIA = \angle r \)
- अतः, \( \angle BOA = \angle BIA \) (चूंकि \( i = r \))
- \( \angle OBA = \angle IBA = 90° \) (अभिलंब)
- AB = AB (उभयनिष्ठ भुजा)
- ASA सर्वांगसमता प्रमेय से: \( \triangle OBA \cong \triangle IBA \)
- इसलिए, OB = BI (सर्वांगसम त्रिभुजों की संगत भुजाएँ)।
निष्कर्ष: समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की दूरी वस्तु की दूरी के बराबर होती है।
समतल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब हमेशा आभासी, सीधा, पार्श्व परिवर्तित (laterally inverted) और वस्तु के समान आकार का होता है तथा दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने होती है।
समतल दर्पण द्वारा विस्तारित वस्तु का प्रतिबिंब निर्माण और आकार
समतल दर्पण न केवल बिंदु वस्तुओं का, बल्कि विस्तारित वस्तुओं का भी प्रतिबिंब बनाता है।
प्रतिबिंब निर्माण (विस्तारित वस्तु):
- जब एक विस्तारित वस्तु (OO') समतल दर्पण के सामने रखी जाती है, तो वस्तु के प्रत्येक बिंदु से आने वाली किरणें परावर्तित होकर दर्पण के पीछे एक आभासी प्रतिबिंब बनाती हैं।
- बिंदु O का प्रतिबिंब I पर और बिंदु O' का प्रतिबिंब I' पर बनता है। वस्तु के बीच के सभी बिंदुओं के प्रतिबिंब I और I' के बीच बनते हैं, जिससे एक विस्तारित आभासी प्रतिबिंब (II') बनता है।
- यह प्रतिबिंब भी आभासी, सीधा और वस्तु के समान आकार का होता है।
प्रतिबिंब का आकार और दृश्य कोण:
- जब आप समतल दर्पण में खुद को देखते हैं, तो आपका प्रतिबिंब आपकी ऊंचाई के बराबर ही दिखाई देता है।
- हालांकि, जब आप किसी वस्तु को दर्पण से दूर ले जाते हैं और अपनी आँख के पास लाते हैं, तो वस्तु का प्रतिबिंब छोटा दिखाई दे सकता है। ऐसा क्यों होता है?
- हमारी आँख में वस्तु से आ रही किरणों द्वारा बनने वाला दृश्य कोण (visual angle) ही वस्तु का आभासी आकार निर्धारित करता है।
- जब वस्तु दर्पण से दूर जाती है, तो उसका प्रतिबिंब भी दर्पण से दूर (पीछे) खिसक जाता है। इससे प्रतिबिंब और हमारी आँख के बीच की दूरी बढ़ जाती है।
- दूरी बढ़ने के कारण, प्रतिबिंब हमारी आँख पर छोटा दृश्य कोण बनाता है, जिससे वह हमें छोटा दिखाई देता है।
- यह वही सिद्धांत है जिसके कारण दूर के पेड़ छोटे और पास के पेड़ बड़े दिखाई देते हैं, भले ही उनका वास्तविक आकार समान हो।
पूर्ण प्रतिबिंब के लिए दर्पण की न्यूनतम लंबाई:
- किसी व्यक्ति को अपना पूर्ण प्रतिबिंब देखने के लिए समतल दर्पण की न्यूनतम लंबाई व्यक्ति की लंबाई की आधी होनी चाहिए।
- ज्यामितीय प्रमाण (चित्र 9):
- व्यक्ति का सिर (H), पैर (F) और आँख (E)।
- सिर से आँख तक की दूरी का आधा बिंदु (P) दर्पण का ऊपरी किनारा होना चाहिए (\( PR = RE = HE/2 \))।
- पैर से आँख तक की दूरी का आधा बिंदु (Q) दर्पण का निचला किनारा होना चाहिए (\( SF = SE = EF/2 \))।
- दर्पण का उपयोगी भाग (PQ) = \( RE + ES = HE/2 + EF/2 = (HE + EF)/2 \)
- चूंकि \( HE + EF = HF \) (व्यक्ति की कुल लंबाई),
- अतः, PQ = HF/2।
- दर्पण को आँख के स्तर से आधी ऊँचाई पर रखने की आवश्यकता होगी (QM' = EF/2)।
उदाहरण: 160 सेमी. लंबे व्यक्ति को अपना पूर्ण प्रतिबिंब देखने के लिए \( 160/2 = 80 \) सेमी. लंबे दर्पण की आवश्यकता होगी।
पूर्ण प्रतिबिंब के लिए दर्पण की न्यूनतम लंबाई वाला प्रश्न बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है। इसका ज्यामितीय प्रमाण और अनुप्रयोग दोनों महत्वपूर्ण हैं।
दो समतल दर्पणों द्वारा बहु प्रतिबिंबों का निर्माण
जब दो समतल दर्पणों को एक-दूसरे से किसी कोण पर रखा जाता है, तो एक वस्तु के कई प्रतिबिंब बनते हैं। यह घटना बहु प्रतिबिंब (multiple images) कहलाती है।
प्रतिबिंबों की संख्या का निर्धारण:
- प्रतिबिंबों की संख्या दर्पणों के बीच के कोण (\( \theta \)) पर निर्भर करती है।
- सूत्र: प्रतिबिंबों की संख्या (n) = \( \frac{360°}{\theta} - 1 \)
उदाहरण:
- यदि \( \theta = 90° \) (समकोण पर):
- \( n = \frac{360°}{90°} - 1 = 4 - 1 = 3 \) प्रतिबिंब बनेंगे।
- चित्र 10: वस्तु O के तीन प्रतिबिंब (O₁, O₂, O₃) बनते हैं। O₁ दर्पण 1 द्वारा O का प्रतिबिंब है, O₂ दर्पण 2 द्वारा O का प्रतिबिंब है। O₃ दर्पण 1 द्वारा O₂ का प्रतिबिंब है, और साथ ही दर्पण 2 द्वारा O₁ का प्रतिबिंब भी है।
- यदि \( \theta = 60° \):
- \( n = \frac{360°}{60°} - 1 = 6 - 1 = 5 \) प्रतिबिंब बनेंगे।
- यदि \( \theta = 45° \):
- \( n = \frac{360°}{45°} - 1 = 8 - 1 = 7 \) प्रतिबिंब बनेंगे।
- यदि \( \theta = 180° \) (समानांतर नहीं, एक ही रेखा में):
- \( n = \frac{360°}{180°} - 1 = 2 - 1 = 1 \) प्रतिबिंब बनेगा (जैसे एक समतल दर्पण)।
- यदि \( \theta = 0° \) (समानांतर दर्पण):
- इस स्थिति में \( \frac{360°}{0°} \) अपरिभाषित हो जाता है।
- समानांतर दर्पणों के बीच अनंत प्रतिबिंब बनते हैं, क्योंकि प्रत्येक प्रतिबिंब दूसरे दर्पण के लिए वस्तु का कार्य करता है, और यह प्रक्रिया अनंत तक चलती रहती है।
आभासी वस्तु की अवधारणा:
- एक दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब दूसरे दर्पण के लिए आभासी वस्तु का कार्य कर सकता है, जिससे और प्रतिबिंब बनते हैं।
- कलाइडोस्कोप (Kaleidoscope): यह खिलौना इसी सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ तीन समतल दर्पणों को एक विशेष कोण पर रखकर सुंदर पैटर्न वाले बहु प्रतिबिंब बनाए जाते हैं।
प्रतिबिंबों की संख्या (n) = \( \frac{360°}{\theta} - 1 \) (यह सूत्र तब लागू होता है जब \( \frac{360°}{\theta} \) एक पूर्णांक हो और वस्तु समरूपता अक्ष पर न हो। यदि \( \frac{360°}{\theta} \) एक विषम पूर्णांक हो और वस्तु समरूपता अक्ष पर हो, तो \( n = \frac{360°}{\theta} - 1 \) ही रहता है।)
बहु प्रतिबिंबों की संख्या ज्ञात करने का सूत्र और समानांतर दर्पणों के विशेष मामले को याद रखना महत्वपूर्ण है।
प्रकाश का अपवर्तन: परिचय और दैनिक जीवन के उदाहरण
प्रकाश का अपवर्तन वह घटना है जिसमें प्रकाश किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में तिरछा प्रवेश करते समय अपने मार्ग से विचलित हो जाती है।
अपवर्तन क्या है?
- जब प्रकाश एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में जाता है, तो उसकी चाल बदल जाती है।
- चाल में इस परिवर्तन के कारण, यदि प्रकाश किरण सतह पर लंबवत नहीं गिरती है, तो वह अपनी मूल दिशा से मुड़ जाती है। इसी मुड़ने को अपवर्तन कहते हैं।
- यदि प्रकाश किरण सतह पर अभिलंबवत (90° पर) गिरती है, तो उसकी दिशा में कोई परिवर्तन नहीं होता, केवल चाल बदलती है।
विरल माध्यम और सघन माध्यम:
- ये शब्द प्रकाशिक घनत्व (optical density) को संदर्भित करते हैं, न कि द्रव्यमान घनत्व को।
- सघन माध्यम (Denser Medium): वह माध्यम जिसका अपवर्तनांक अधिक होता है, और जिसमें प्रकाश की चाल कम होती है।
- विरल माध्यम (Rarer Medium): वह माध्यम जिसका अपवर्तनांक कम होता है, और जिसमें प्रकाश की चाल अधिक होती है।
अपवर्तन की दिशा:
- विरल से सघन माध्यम में: जब प्रकाश किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम में प्रवेश करती है, तो वह अभिलंब की ओर मुड़ जाती है (चित्र 12 अ)।
- सघन से विरल माध्यम में: जब प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है, तो वह अभिलंब से दूर हट जाती है (चित्र 12 ब)।
कोण:
- आपतन कोण (\( \angle i \)): आपतित किरण और अभिलंब के बीच का कोण।
- अपवर्तन कोण (\( \angle r \)): अपवर्तित किरण और अभिलंब के बीच का कोण।
- विरल से सघन में: \( \angle i > \angle r \)
- सघन से विरल में: \( \angle i < \angle r \)
दैनिक जीवन में अपवर्तन के उदाहरण:
- पानी में डूबी पेंसिल का मुड़ा हुआ दिखना: पानी से हवा में आते समय प्रकाश का अपवर्तन होता है, जिससे पेंसिल मुड़ी हुई प्रतीत होती है।
- पानी से भरे बर्तन की तली का उठा हुआ दिखना: सिक्के या मछली से आने वाली प्रकाश किरणें पानी से हवा में आते समय अभिलंब से दूर हट जाती हैं, जिससे वे अपनी वास्तविक स्थिति से ऊपर उठी हुई प्रतीत होती हैं (चित्र 11)।
- सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद सूर्य का दिखना: वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण।
- तारे टिमटिमाते हुए दिखना: वायुमंडल की विभिन्न घनत्व वाली परतों से प्रकाश के लगातार अपवर्तन के कारण।
क्रियाकलाप 2 (सिक्के वाला):
- कटोरी में सिक्का रखें, दोस्त को दूर हटाएँ जब तक सिक्का दिखना बंद न हो जाए।
- अब कटोरी में पानी डालें। सिक्का फिर से दिखने लगेगा।
- कारण: पानी डालने पर, सिक्के से आने वाली प्रकाश किरणें पानी से हवा में अपवर्तित होती हैं और अभिलंब से दूर हट जाती हैं। हमारी आँखें इन मुड़ी हुई किरणों को सीधा मानती हैं, जिससे सिक्का अपनी वास्तविक स्थिति से ऊपर उठा हुआ (आभासी प्रतिबिंब) दिखाई देता है।
अपवर्तन (Refraction): प्रकाश किरण का एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करते समय अपने पथ से विचलित होना। प्रकाशिक घनत्व (Optical Density): वह गुण जो निर्धारित करता है कि प्रकाश किसी माध्यम में कितनी धीमी गति से चलता है।
वास्तविक एवं आभासी गहराई तथा अपवर्तनांक
अपवर्तन के कारण, पानी या किसी अन्य पारदर्शी माध्यम में डूबी हुई वस्तु अपनी वास्तविक गहराई से कम गहरी दिखाई देती है।
वास्तविक गहराई (Real Depth): वस्तु की सतह से माध्यम के तल तक की वास्तविक लंबवत दूरी (H)। आभासी गहराई (Apparent Depth): वस्तु की सतह से माध्यम के तल तक की वह लंबवत दूरी जहाँ वस्तु का प्रतिबिंब दिखाई देता है (h)।
संबंध:
- जब प्रकाश सघन माध्यम (पानी) से विरल माध्यम (हवा) में आता है, तो वह अभिलंब से दूर हट जाता है।
- हमारी आँखें इन अपवर्तित किरणों को सीधा मानती हैं, जिससे वस्तु हमें ऊपर उठी हुई दिखाई देती है।
- आभासी गहराई हमेशा वास्तविक गहराई से कम होती है (\( h < H \))।
अपवर्तनांक और गहराई का संबंध:
- माध्यम का अपवर्तनांक (n) वास्तविक गहराई और आभासी गहराई के अनुपात के बराबर होता है।
- \( n = \frac{\text{वास्तविक गहराई}}{\text{आभासी गहराई}} = \frac{H}{h} \)
उदाहरण (चित्र 15):
- सिक्का (P) पानी में वास्तविक गहराई (AP = H) पर है।
- सिक्के से आने वाली प्रकाश किरणें पानी-हवा इंटरफेस पर अपवर्तित होकर अभिलंब से दूर हट जाती हैं।
- ये किरणें पीछे बढ़ाने पर बिंदु P' से आती हुई प्रतीत होती हैं, जो सिक्के का आभासी प्रतिबिंब है।
- आभासी गहराई (AP' = h) वास्तविक गहराई से कम है।
अनुप्रयोग:
- मछली पकड़ने वाले या तैराक अक्सर इस घटना का अनुभव करते हैं।
- पानी के टैंक या स्विमिंग पूल की तली अपनी वास्तविक गहराई से कम गहरी दिखाई देती है।
अपवर्तनांक (n) = \( \frac{\text{वास्तविक गहराई (H)}}{\text{आभासी गहराई (h)}} \)
वास्तविक और आभासी गहराई पर आधारित संख्यात्मक प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। सूत्र को सही ढंग से लागू करना सीखें।
प्रिज्म द्वारा प्रकाश का अपवर्तन और विचलन कोण
अभी तक हमने समानांतर सतहों (जैसे काँच की स्लेब) से अपवर्तन देखा। अब हम उन सतहों से अपवर्तन देखेंगे जो एक कोण पर झुकी हुई हैं, जैसे प्रिज्म।
प्रिज्म:
- प्रिज्म एक पारदर्शी माध्यम है जिसके दो अपवर्तक पृष्ठ एक कोण पर झुके होते हैं।
- यह प्रकाश को अपवर्तित करता है और उसे अपने आधार की ओर मोड़ता है।
प्रिज्म द्वारा अपवर्तन (चित्र 14):
- आपतित किरण (PQ): प्रिज्म के पहले पृष्ठ (AB) पर आपतित होती है।
- पहला अपवर्तन: किरण PQ पृष्ठ AB पर \( \angle i \) आपतन कोण पर अपवर्तित होती है। चूंकि यह विरल (हवा) से सघन (काँच) माध्यम में जा रही है, यह अभिलंब की ओर मुड़ जाती है और पथ QR का अनुसरण करती है।
- दूसरा अपवर्तन: किरण QR प्रिज्म के दूसरे पृष्ठ (AC) पर आपतित होती है। यह किरण पृष्ठ AC के लिए आपतित किरण है।
- निर्गत किरण (RS): किरण QR पृष्ठ AC से अपवर्तित होकर RS दिशा में बाहर निकलती है। चूंकि यह सघन (काँच) से विरल (हवा) माध्यम में जा रही है, यह अभिलंब से दूर हट जाती है।
विचलन कोण (Angle of Deviation, \( \delta \)):
- प्रिज्म से गुजरने के बाद, प्रकाश किरण अपनी मूल दिशा से विचलित हो जाती है।
- आपतित किरण (PQ को आगे बढ़ाने पर) और निर्गत किरण (RS को पीछे बढ़ाने पर) के बीच के कोण को विचलन कोण (\( \delta \)) कहते हैं।
- प्रिज्म हमेशा प्रकाश को अपने आधार की ओर विचलित करता है।
प्रिज्म में कोण:
- प्रिज्म कोण (A): प्रिज्म के दो अपवर्तक पृष्ठों के बीच का कोण।
- आपतन कोण (i): पहले पृष्ठ पर आपतित किरण और अभिलंब के बीच का कोण।
- अपवर्तन कोण (r₁): पहले पृष्ठ पर अपवर्तित किरण और अभिलंब के बीच का कोण।
- आपतन कोण (r₂): दूसरे पृष्ठ पर अपवर्तित किरण और अभिलंब के बीच का कोण (यह दूसरे पृष्ठ के लिए आपतन कोण है)।
- निर्गत कोण (e): निर्गत किरण और दूसरे पृष्ठ पर अभिलंब के बीच का कोण।
विचलन कोण का सूत्र (छोटे कोण वाले प्रिज्म के लिए): \( \delta = (n-1)A \) जहाँ \( n \) प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक है।
महत्वपूर्ण अवलोकन:
- विचलन कोण का मान आपतन कोण, प्रिज्म कोण और प्रिज्म के पदार्थ के अपवर्तनांक पर निर्भर करता है।
- एक निश्चित आपतन कोण के लिए विचलन कोण का मान न्यूनतम होता है, जिसे न्यूनतम विचलन कोण (Angle of Minimum Deviation) कहते हैं।
विचलन कोण: आपतित किरण और निर्गत किरण के बीच का कोण, जो प्रिज्म द्वारा प्रकाश के पथ में परिवर्तन को दर्शाता है।
प्रकाश के उत्क्रमणीयता का सिद्धांत
प्रकाश के उत्क्रमणीयता का सिद्धांत एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो प्रकाश के पथ की समरूपता को दर्शाता है।
सिद्धांत का कथन:
- यदि प्रकाश किरण किसी माध्यम से गुजरते हुए एक निश्चित पथ का अनुसरण करती है, तो यदि किसी बिंदु पर उसकी दिशा उलट दी जाए, तो वह अपने मूल पथ का ठीक विपरीत दिशा में अनुसरण करेगी।
- सरल शब्दों में, प्रकाश जिस पथ से आता है, उसी पथ से वापस भी जा सकता है। प्रकाश का मार्ग उत्क्रमणीय (reversible) होता है।
उदाहरण (चित्र 16):
- सीधा पथ (ABCDE):
- किरण AB हवा (विरल) से पानी (सघन) में जाती है, बिंदु B पर अभिलंब की ओर झुकती है (पथ BC)।
- किरण BC पानी (विरल) से काँच (सघन) में जाती है, बिंदु C पर अभिलंब की ओर झुकती है (पथ CD)।
- किरण CD काँच (सघन) से हवा (विरल) में जाती है, बिंदु D पर अभिलंब से दूर हटती है (पथ DE)।
- प्रकाश किरण का कुल पथ: A \( \rightarrow \) B \( \rightarrow \) C \( \rightarrow \) D \( \rightarrow \) E।
- उत्क्रमित पथ (EDCBA):
- यदि किरण को बिंदु E से पथ ED के अनुदिश भेजा जाए (अर्थात्, निर्गत किरण DE को आपतित किरण बना दिया जाए)।
- यह किरण D पर काँच से पानी में अपवर्तित होगी और पथ DC का अनुसरण करेगी।
- फिर C पर पानी से हवा में अपवर्तित होकर पथ CB का अनुसरण करेगी।
- अंत में B पर हवा से पानी में अपवर्तित होकर पथ BA का अनुसरण करेगी।
- प्रकाश किरण का कुल पथ: E \( \rightarrow \) D \( \rightarrow \) C \( \rightarrow \) B \( \rightarrow \) A।
निष्कर्ष:
- दोनों स्थितियों में, प्रकाश किरणें समान पथ का अनुसरण करती हैं, बस दिशा विपरीत होती है।
- यह सिद्धांत स्नेल के नियम से भी सिद्ध होता है: \( n_1 \sin i = n_2 \sin r \)। यदि किरण की दिशा उलट दी जाए, तो \( n_2 \sin r = n_1 \sin i \) भी सत्य होगा।
अनुप्रयोग:
- यह सिद्धांत लेंस और प्रिज्म जैसे प्रकाशीय उपकरणों के डिजाइन और विश्लेषण में महत्वपूर्ण है।
- यह अपवर्तनांक के संबंध को भी स्थापित करता है: \( {}_{1}n_{2} = \frac{1}{{}_{2}n_{1}} \) (माध्यम 1 के सापेक्ष माध्यम 2 का अपवर्तनांक, माध्यम 2 के सापेक्ष माध्यम 1 के अपवर्तनांक का व्युत्क्रम होता है)।
उत्क्रमणीयता का सिद्धांत प्रकाश के पथ की समरूपता को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि प्रकाश किरणें किसी भी दिशा में समान पथ का अनुसरण करती हैं।
क्रांतिक कोण और पूर्ण आंतरिक परावर्तन
क्रांतिक कोण और पूर्ण आंतरिक परावर्तन (TIR) प्रकाशिकी की दो महत्वपूर्ण संबंधित घटनाएँ हैं, जो तब होती हैं जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाता है।
क्रांतिक कोण (Critical Angle, \( i_c \) या \( \theta_c \)):
- जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करता है, तो वह अभिलंब से दूर हट जाता है (\( \angle r > \angle i \))।
- जैसे-जैसे आपतन कोण (\( \angle i \)) का मान बढ़ाया जाता है, अपवर्तन कोण (\( \angle r \)) का मान भी बढ़ता जाता है।
- एक विशेष आपतन कोण पर, अपवर्तन कोण का मान 90° हो जाता है। इस स्थिति में, अपवर्तित किरण दोनों माध्यमों को अलग करने वाले तल को छूती हुई निकलती है।
- सघन माध्यम में आपतन कोण के इस विशेष मान को क्रांतिक कोण कहते हैं।
- शर्त: प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाना चाहिए।
पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection, TIR):
- यदि सघन माध्यम में आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक हो जाए (\( \angle i > \angle i_c \))।
- तो प्रकाश विरल माध्यम में अपवर्तित होने के बजाय, उसी सघन माध्यम में परावर्तित होकर वापस लौट आता है।
- इस घटना को पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहते हैं।
- यह परावर्तन 100% होता है, इसलिए इसे 'पूर्ण' कहा जाता है।
पूर्ण आंतरिक परावर्तन के लिए आवश्यक शर्तें:
- प्रकाश किरण को सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करना चाहिए।
- सघन माध्यम में आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए (\( \angle i > \angle i_c \))।
पूर्ण आंतरिक परावर्तन के उदाहरण:
- हीरे की चमक: हीरे का अपवर्तनांक बहुत अधिक (2.42) होता है, जिससे उसका क्रांतिक कोण बहुत कम (लगभग 24.4°) होता है। जब प्रकाश हीरे में प्रवेश करता है, तो वह कई बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन से गुजरता है, जिससे हीरा अत्यधिक चमकदार दिखाई देता है।
- ऑप्टिकल फाइबर (Optical Fiber): संचार में उपयोग होने वाले ऑप्टिकल फाइबर पूर्ण आंतरिक परावर्तन के सिद्धांत पर कार्य करते हैं। प्रकाश संकेत फाइबर के अंदर बार-बार परावर्तित होकर लंबी दूरी तय करते हैं।
- मृगतृष्णा (Mirage): रेगिस्तान में या गर्म सड़क पर दूर से पानी का भ्रम (चित्र 20, 21)। गर्मी में जमीन के पास की हवा विरल और ऊपर की हवा सघन होती है। दूर की वस्तु से आने वाली प्रकाश किरणें सघन से विरल माध्यम में जाते हुए लगातार अभिलंब से दूर हटती हैं। एक बिंदु पर आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो जाता है, जिससे पूर्ण आंतरिक परावर्तन होता है और वस्तु का उल्टा प्रतिबिंब दिखाई देता है, जो पानी जैसा लगता है।
- पानी में हवा के बुलबुले की चमक: पानी के अंदर हवा का बुलबुला चमकदार दिखाई देता है क्योंकि प्रकाश पानी (सघन) से हवा (विरल) में जाते समय पूर्ण आंतरिक परावर्तन से गुजरता है (चित्र 19)।
- परखनली का चमकदार दिखना: पानी में तिरछी डूबी खाली परखनली का ऊपरी भाग चमकदार दिखाई देता है क्योंकि प्रकाश पानी से परखनली के अंदर की हवा में जाते समय पूर्ण आंतरिक परावर्तन करता है।
पूर्ण आंतरिक परावर्तन की घटना तभी संभव है जब प्रकाश सघन से विरल माध्यम में जाए और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो।
क्रांतिक कोण और पूर्ण आंतरिक परावर्तन की परिभाषाएँ, शर्तें और दैनिक जीवन के उदाहरण बोर्ड परीक्षाओं में बहुत महत्वपूर्ण हैं।
10.5.1 अपवर्तनांक
अपवर्तनांक (Refractive Index) एक माध्यम का वह गुण है जो बताता है कि प्रकाश उस माध्यम में कितनी तेजी या धीमी गति से चलता है। यह प्रकाश के अपवर्तन की मात्रा को भी निर्धारित करता है।
परम अपवर्तनांक (Absolute Refractive Index) या निरपेक्ष अपवर्तनांक (n):
- यह निर्वात में प्रकाश की चाल (c) और किसी माध्यम में प्रकाश की चाल (v) का अनुपात होता है।
- सूत्र: \( n = \frac{c}{v} \)
- निर्वात में प्रकाश की चाल \( c = 3 \times 10^8 \) m/s होती है, जो किसी भी अन्य माध्यम में प्रकाश की चाल से अधिक होती है।
- इसलिए, निरपेक्ष अपवर्तनांक का मान हमेशा 1 से अधिक होता है (निर्वात के लिए n=1)।
- जिस माध्यम का अपवर्तनांक अधिक होता है, उसमें प्रकाश की चाल कम होती है (वह माध्यम प्रकाशिक रूप से सघन होता है)।
- वायु का अपवर्तनांक लगभग 1.0003 होता है, जिसे गणनाओं में अक्सर 1 माना जाता है।
विभिन्न पदार्थों के अपवर्तनांक और प्रकाश की चाल (सारणी-1): | क्र. | पदार्थ (माध्यम) | अपवर्तनांक (n) | आपेक्षिक घनत्व | प्रकाश की चाल (v = c/n) | |---|---|---|---|---| | 1. | हीरा | 2.42 | 3.52 | \( 3 \times 10^8 / 2.42 = 1.24 \times 10^8 \) m/s | | 2. | फ्लिंट काँच | 1.64 | 2.9-4.5 | \( 3 \times 10^8 / 1.64 = 1.83 \times 10^8 \) m/s | | 3. | क्राउन काँच | 1.52 | 2.5-2.7 | \( 3 \times 10^8 / 1.52 = 1.97 \times 10^8 \) m/s | | 4. | साधारण काँच | 1.50 | 2.5 | \( 3 \times 10^8 / 1.50 = 2.00 \times 10^8 \) m/s | | 5. | पानी | 1.33 | 1.00 | \( 3 \times 10^8 / 1.33 = 2.25 \times 10^8 \) m/s | | 6. | बर्फ | 1.31 | 0.92 | \( 3 \times 10^8 / 1.31 = 2.29 \times 10^8 \) m/s |
प्रश्न-4 का हल:
- पानी का परम अपवर्तनांक \( n_w = 4/3 \)
- निर्वात में प्रकाश की चाल \( c = 3 \times 10^8 \) m/s
- पानी में प्रकाश की चाल \( v_w = ? \)
- सूत्र \( n = c/v \) से, \( v_w = c/n_w \)
- \( v_w = (3 \times 10^8 \text{ m/s}) / (4/3) = (3 \times 10^8 \times 3) / 4 \)
- \( v_w = 9 \times 10^8 / 4 = 2.25 \times 10^8 \) m/s
निष्कर्ष: पानी में प्रकाश की चाल \( 2.25 \times 10^8 \) m/s होगी।
परम अपवर्तनांक \( n = c/v \) जहाँ \( c \) निर्वात में प्रकाश की चाल और \( v \) माध्यम में प्रकाश की चाल है।
10.5.2 सापेक्षिक अपवर्तनांक (Relative Refractive Index)
सापेक्षिक अपवर्तनांक दो माध्यमों के बीच प्रकाश की चाल के अनुपात को दर्शाता है।
परिभाषा:
- यह पहले माध्यम में प्रकाश की चाल और दूसरे माध्यम में प्रकाश की चाल का अनुपात होता है।
- इसे \( n_{21} \) (माध्यम 1 के सापेक्ष माध्यम 2 का अपवर्तनांक) या \( n_{12} \) (माध्यम 2 के सापेक्ष माध्यम 1 का अपवर्तनांक) से व्यक्त करते हैं।
सूत्र:
- \( n_{21} = \frac{\text{प्रथम माध्यम में प्रकाश की चाल (V₁)}}{\text{द्वितीय माध्यम में प्रकाश की चाल (V₂)}} \)
- \( n_{21} = \frac{V_1}{V_2} \)
निरपेक्ष अपवर्तनांक के पदों में संबंध:
- हम जानते हैं कि \( n = c/V \), इसलिए \( V = c/n \)।
- \( n_{21} = \frac{V_1}{V_2} = \frac{c/n_1}{c/n_2} = \frac{n_2}{n_1} \)
- अर्थात्, \( n_{21} = \frac{\text{द्वितीय माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक (n₂)}}{\text{प्रथम माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक (n₁)}} \)
उत्क्रमणीयता का सिद्धांत और सापेक्षिक अपवर्तनांक:
- उत्क्रमणीयता के सिद्धांत से, \( n_{12} = \frac{1}{n_{21}} \)
- अर्थात्, \( {}_{1}n_{2} \times {}_{2}n_{1} = 1 \)
महत्वपूर्ण बिंदु:
- निरपेक्ष अपवर्तनांक का मान सदैव एक से अधिक होगा क्योंकि निर्वात में प्रकाश की चाल सदैव अन्य माध्यम में प्रकाश की चाल से अधिक होती है।
- वायु का अपवर्तनांक 1.003 होता है, परन्तु उसे सरलता के लिए 1 माना जाता है।
प्रश्न-5 का हल:
- जल का अपवर्तनांक \( n_w = 1.33 \)
- काँच का अपवर्तनांक \( n_g = 1.5 \)
- जल के सापेक्ष काँच का अपवर्तनांक (\( n_{wg} \)):
- \( n_{wg} = \frac{n_g}{n_w} = \frac{1.5}{1.33} \approx 1.13 \)
- काँच के सापेक्ष जल का अपवर्तनांक (\( n_{gw} \)):
- \( n_{gw} = \frac{n_w}{n_g} = \frac{1.33}{1.5} \approx 0.89 \)
जाँच: \( n_{wg} \times n_{gw} \approx 1.13 \times 0.89 \approx 1.0057 \approx 1 \) (लगभग सही)।
सापेक्षिक अपवर्तनांक \( n_{21} = \frac{V_1}{V_2} = \frac{n_2}{n_1} \) जहाँ \( V_1, V_2 \) माध्यमों में प्रकाश की चाल और \( n_1, n_2 \) उनके निरपेक्ष अपवर्तनांक हैं।
सापेक्षिक अपवर्तनांक का मान 1 से कम या अधिक हो सकता है, जबकि निरपेक्ष अपवर्तनांक हमेशा 1 से अधिक होता है (निर्वात को छोड़कर)।
10.5.3 अपवर्तन के नियम
प्रकाश के अपवर्तन की घटना भी निश्चित नियमों का पालन करती है, जिन्हें स्नेल के नियम के नाम से जाना जाता है।
अपवर्तन के नियम:
- पहला नियम: आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा दोनों माध्यमों को पृथक करने वाले पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभिलंब सभी एक ही तल में होते हैं।
- यह नियम परावर्तन के दूसरे नियम के समान है और सुनिश्चित करता है कि अपवर्तन एक 2D घटना है।
- दूसरा नियम (स्नेल का नियम):
- प्रकाश के किसी निश्चित रंग तथा निश्चित माध्यमों के युग्म के लिए, आपतन कोण की ज्या (sine) और अपवर्तन कोण की ज्या (sine) का अनुपात स्थिर होता है।
- सूत्र: \( \frac{\sin i}{\sin r} = \text{स्थिरांक} \)
- इस स्थिरांक को दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सापेक्ष अपवर्तनांक (\( n_{21} \)) कहते हैं।
- अतः, \( \frac{\sin i}{\sin r} = n_{21} \)
काँच के आयताकार गुटके द्वारा अपवर्तन (चित्र 13):
- प्रयोग विधि:
- ड्राईंग बोर्ड पर सफेद कागज़ पर काँच का गुटका रखकर सीमा रेखा (ABCD) खींचें।
- AB पर अभिलंब MN खींचें और एक आपतित किरण (EF) बनाएं, जिस पर दो पिन (E, F) लगाएँ।
- गुटके को वापस रखें और CD फलक से पिन E और F की सीध में दो अन्य पिन (G, H) लगाएँ।
- पिनों को हटाकर बिंदुओं को मिलाएं। EF को O तक, GH को O' तक बढ़ाएँ। O और O' को मिलाएं।
- अवलोकन:
- प्रकाश किरण बिंदुओं O और O' पर अपनी दिशा बदलती है।
- निर्गत किरण (GH) आपतित किरण (EF) की दिशा के समानांतर होती है।
- आपतन कोण और निर्गत कोण का मान समान पाया जाता है।
- इसका अर्थ है कि आयताकार काँच के गुटके के विपरीत फलकों पर प्रकाश किरण के मुड़ने का परिणाम समान और विपरीत होता है, जिससे कुल विचलन शून्य होता है, केवल पार्श्व विस्थापन (lateral displacement) होता है।
सारणी-1-2 (काँच के गुटके के लिए): | क्रम | पृष्ठ 1 आपतन कोण (\( i_1 \)) | अपवर्तन कोण (\( r_1 \)) | पृष्ठ 2 आपतन कोण (\( i_2 \)) | अपवर्तन कोण / निर्गत कोण (\( r_2 \)) | |---|---|---|---|---| | 1. | 30° | 19.5° | 19.5° | 30° | | 2. | 45° | 28.1° | 28.1° | 45° | | 3. | 60° | 35.3° | 35.3° | 60° |
(यह सारणी उदाहरण के लिए है, काँच के अपवर्तनांक पर निर्भर करता है। यहाँ \( n \approx 1.5 \) माना गया है।)
स्नेल का नियम: \( \frac{\sin i}{\sin r} = n_{21} \)
स्नेल का नियम अपवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण नियम है। इसकी परिभाषा और सूत्र को अच्छी तरह समझें। काँच के गुटके द्वारा पार्श्व विस्थापन की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है।