Working of Institutions
ఈ అధ్యాయం భారతదేశంలో ప్రభుత్వ సంస్థల పనితీరును వివరిస్తుంది. శాసనసభ, కార్యనిర్వాహక వర్గం మరియు న్యాయవ్యవస్థ వంటి కీలక సంస్థల నిర్మాణం, విధులు మరియు ప్రాముఖ్యతను ఇది విశ్లేషిస్తుంది. ప్రజాస్వామ్యంలో ఈ సంస్థలు ఎలా సహకరిస్తాయి మరియు అధికారాల విభజన సూత్రం వాటి స్వతంత్ర పనితీరును ఎలా నిర్ధారిస్తుందో విద్యార్థులు అర్థం చేసుకుంటారు. చట్టాల తయారీ, అమలు మరియు రాజ్యాంగ వ్యాఖ్యానం వంటి ప్రక్రియలు కూడా వివరించబడ్డాయి.
लोकतंत्र में संस्थाओं की आवश्यकता
लोकतंत्र में, सरकार को नागरिकों के कल्याण के लिए कई निर्णय लेने और उन्हें लागू करने की आवश्यकता होती है। ये कार्य केवल व्यक्तियों द्वारा नहीं किए जा सकते, बल्कि इसके लिए विभिन्न संस्थाओं की आवश्यकता होती है।
- संस्थाएँ क्या हैं?
- संस्थाएँ नियमों और प्रक्रियाओं का एक समूह हैं जो सरकार के विभिन्न कार्यों को करने के लिए स्थापित की जाती हैं।
- ये निर्णय लेने, निर्णय लागू करने और विवादों को सुलझाने में मदद करती हैं।
- संस्थाओं की आवश्यकता क्यों है?
- निर्णय लेने में आसानी: जटिल मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए एक संरचित प्रक्रिया प्रदान करती हैं।
- जवाबदेही: संस्थाएँ सरकार को नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाती हैं।
- कानून का शासन: ये सुनिश्चित करती हैं कि सभी निर्णय कानूनों और संविधान के अनुसार लिए जाएँ।
- शक्तियों का पृथक्करण: सरकार की शक्तियों को विभिन्न अंगों में विभाजित करके सत्ता के दुरुपयोग को रोकती हैं।
- स्थिरता और निरंतरता: व्यक्तियों के बदलने पर भी सरकारी कार्यप्रणाली में निरंतरता बनाए रखती हैं।
- विवाद समाधान: विवादों को निष्पक्ष और व्यवस्थित तरीके से सुलझाने के लिए तंत्र प्रदान करती हैं।
- भारत में प्रमुख राजनीतिक संस्थाएँ:
- विधायिका (Legislature): कानून बनाती है (संसद)।
- कार्यपालिका (Executive): कानूनों को लागू करती है और नीतियाँ बनाती है (सरकार, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, नौकरशाही)।
- न्यायपालिका (Judiciary): कानूनों की व्याख्या करती है और न्याय प्रदान करती है (सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, जिला न्यायालय)।
- एक उदाहरण: मंडल आयोग का मामला (1990)
- यह एक महत्वपूर्ण सरकारी आदेश (Office Memorandum) था जिसने भारत में संस्थाओं के काम करने के तरीके को दर्शाया।
- पृष्ठभूमि: 1979 में, भारत सरकार ने द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) का गठन किया।
- सिफारिश: आयोग ने 1980 में सिफारिश की कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण दिया जाए।
- निर्णय प्रक्रिया:
- मंडल आयोग: सिफारिशें प्रस्तुत कीं।
- संसद: कई वर्षों तक इस पर बहस हुई।
- प्रधानमंत्री: वी.पी. सिंह ने 1989 के चुनाव घोषणापत्र में इसे लागू करने का वादा किया।
- मंत्रिमंडल: प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल को सूचित किया, जिसने औपचारिक निर्णय लिया।
- राष्ट्रपति: राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए इस इरादे की घोषणा की।
- अधिकारी: सामाजिक न्याय मंत्रालय के अधिकारियों ने आदेश तैयार किया।
- संयुक्त सचिव: सरकारी आदेश (OM No. 36012/31/90-Est (SCT), दिनांक 13 अगस्त 1990) पर हस्ताक्षर किए।
- विवाद: इस निर्णय से देश भर में तीव्र विरोध और प्रतिवाद हुआ।
- न्यायपालिका की भूमिका:
- कई लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में इस आदेश को चुनौती दी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने इन सभी मामलों को एक साथ सुना (इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत संघ)।
- 1992 में, सर्वोच्च न्यायालय के 11 न्यायाधीशों ने बहुमत से मंडल आयोग की सिफारिश को वैध ठहराया।
- हालांकि, उन्होंने कुछ संशोधन सुझाए, जैसे 'क्रीमी लेयर' को आरक्षण से बाहर रखना।
- सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार मूल आदेश में संशोधन किया।
- निष्कर्ष: यह मामला दिखाता है कि कैसे सरकार के विभिन्न अंग (कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका) एक साथ काम करते हैं, भले ही उनके बीच मतभेद हों, और कैसे न्यायपालिका अंतिम निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मंडल आयोग की सिफारिशों ने सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की नींव रखी, जो भारत की सामाजिक न्याय नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मंडल आयोग का मामला संस्थाओं के कामकाज को समझाने के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे अच्छे से समझें और इसके विभिन्न चरणों को याद रखें।
संसद: क्यों और कैसे?
भारत में, जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सर्वोच्च संस्था को संसद कहते हैं। यह लोकतंत्र का आधार स्तंभ है।
- संसद की आवश्यकता:
- कानून बनाना: संसद देश के लिए कानून बनाती है, संशोधित करती है और रद्द करती है।
- सरकार पर नियंत्रण: यह सरकार (कार्यपालिका) को नियंत्रित करती है और उसे जवाबदेह बनाती है।
- धन पर नियंत्रण: सरकार के खर्चों और राजस्व पर नियंत्रण रखती है (बजट पास करती है)।
- बहस और चर्चा: महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस और चर्चा के लिए एक मंच प्रदान करती है।
- संविधान संशोधन: संविधान में संशोधन करने की शक्ति रखती है।
- संसद के दो सदन:
- भारत में द्विसदनीय विधायिका है, जिसमें दो सदन होते हैं:
- लोकसभा (House of the People):
- सदस्य: सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं।
- कार्यकाल: 5 वर्ष।
- अधिकतम सदस्य संख्या: 550 (वर्तमान में 543, जिनमें से 543 सीधे चुने जाते हैं)।
- शक्ति: धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं। मंत्रिपरिषद केवल लोकसभा के प्रति जवाबदेह होती है। अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है।
- अध्यक्ष: स्पीकर (अध्यक्ष) द्वारा अध्यक्षता की जाती है।
- राज्यसभा (Council of States):
- सदस्य: राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं (अप्रत्यक्ष चुनाव)। कुछ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं (कला, साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा)।
- कार्यकाल: स्थायी सदन, भंग नहीं होता। सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है, और हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
- अधिकतम सदस्य संख्या: 250 (वर्तमान में 245, जिनमें से 233 चुने जाते हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं)।
- शक्ति: राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है। राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की संसद की शक्ति को प्रभावित कर सकती है।
- अध्यक्ष: उपराष्ट्रपति द्वारा अध्यक्षता की जाती है।
- दोनों सदनों की शक्तियाँ:
- साधारण विधेयक: किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। दोनों सदनों की सहमति आवश्यक है। यदि गतिरोध हो, तो संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है, जिसमें लोकसभा की संख्यात्मक श्रेष्ठता के कारण उसका निर्णय प्रभावी होता है।
- धन विधेयक: केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। राज्यसभा इसे 14 दिनों तक रोक सकती है या संशोधन सुझा सकती है, लेकिन लोकसभा उन सुझावों को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
- संविधान संशोधन विधेयक: दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
- मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण: केवल लोकसभा ही अविश्वास प्रस्ताव पारित करके सरकार को गिरा सकती है।
- कानून कैसे बनता है (विधेयक से अधिनियम तक):
- विधेयक का प्रस्तुतीकरण: कोई भी मंत्री या निजी सदस्य किसी भी सदन में विधेयक प्रस्तुत कर सकता है।
- पहला वाचन: विधेयक को सदन में पेश किया जाता है, और उसका शीर्षक व उद्देश्य पढ़ा जाता है।
- दूसरा वाचन: विधेयक पर विस्तृत चर्चा होती है, खंड-वार विचार-विमर्श होता है, और संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते हैं। इसे अक्सर एक समिति को भेजा जाता है।
- तीसरा वाचन: विधेयक को समग्र रूप से स्वीकार या अस्वीकार करने पर मतदान होता है।
- दूसरे सदन में: एक सदन से पारित होने के बाद, विधेयक दूसरे सदन में जाता है और वही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति: दोनों सदनों से पारित होने के बाद, विधेयक राष्ट्रपति के पास उनकी स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति या तो स्वीकृति दे सकते हैं, रोक सकते हैं, या पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं (धन विधेयक को छोड़कर)।
- अधिनियम: राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद, विधेयक कानून (अधिनियम) बन जाता है।
संसद की सर्वोच्चता का अर्थ है कि कोई भी कानून संसद द्वारा बनाए गए कानून से ऊपर नहीं है, बशर्ते वह संविधान के दायरे में हो।
छात्र अक्सर लोकसभा और राज्यसभा की शक्तियों को लेकर भ्रमित होते हैं। याद रखें, धन विधेयक और मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण के मामले में लोकसभा अधिक शक्तिशाली है।
कार्यपालिका: राजनीतिक और स्थायी
कार्यपालिका कानूनों को लागू करने और सरकार की नीतियों को चलाने के लिए जिम्मेदार संस्था है। यह दो प्रकार की होती है:
- राजनीतिक कार्यपालिका:
- कौन: प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद।
- चुनाव: जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए चुने जाते हैं।
- कार्यकाल: अस्थायी (5 वर्ष या जब तक बहुमत है)।
- भूमिका: नीतिगत निर्णय लेते हैं, जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री।
- स्थायी कार्यपालिका (सिविल सेवा/नौकरशाही):
- कौन: सिविल सेवक (IAS, IPS, IFS अधिकारी आदि)।
- चुनाव: लंबी चयन प्रक्रिया (जैसे UPSC) के माध्यम से नियुक्त किए जाते हैं।
- कार्यकाल: स्थायी (सेवानिवृत्ति तक)।
- भूमिका: राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करते हैं, विशेषज्ञ ज्ञान और प्रशासनिक अनुभव प्रदान करते हैं। ये राजनीतिक रूप से तटस्थ होते हैं।
- उदाहरण: जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, विभिन्न मंत्रालयों के सचिव।
- राजनीतिक बनाम स्थायी कार्यपालिका की तुलना:
- एक लोकतांत्रिक देश में, राजनीतिक कार्यपालिका को स्थायी कार्यपालिका से अधिक शक्तिशाली माना जाता है।
- कारण: राजनीतिक नेता जनता द्वारा चुने जाते हैं और जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे देश की समग्र दृष्टि और प्राथमिकताओं को निर्धारित करते हैं। सिविल सेवक विशेषज्ञ हो सकते हैं, लेकिन वे जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं होते।
- उदाहरण: एक वित्त मंत्री (राजनीतिक) एक वित्त विशेषज्ञ (स्थायी) से कम शिक्षित हो सकता है, लेकिन मंत्री को जनता का जनादेश प्राप्त होता है और वह देश की वित्तीय नीतियों का निर्धारण करता है। विशेषज्ञ मंत्री को सलाह देते हैं और नीतियों को लागू करते हैं।
कार्यपालिका: सरकार का वह अंग जो कानूनों को लागू करने और प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार होता है।
प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद
प्रधानमंत्री भारत में सरकार का प्रमुख होता है, जबकि राष्ट्रपति राज्य का प्रमुख होता है।
- प्रधानमंत्री की नियुक्ति:
- राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
- यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो राष्ट्रपति उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है जिसे वह मानता है कि वह बहुमत साबित कर सकता है।
- प्रधानमंत्री को नियुक्ति के बाद एक निश्चित समय के भीतर सदन में अपना बहुमत साबित करना होता है।
- प्रधानमंत्री की शक्तियाँ और कार्य:
- मंत्रिपरिषद का प्रमुख: वह मंत्रियों को चुनता है, उन्हें विभाग आवंटित करता है, और उनके बीच विभागों का पुनर्वितरण करता है।
- मंत्रियों को बर्खास्त करना: वह किसी भी मंत्री को बर्खास्त कर सकता है।
- मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता: वह मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता है और निर्णयों को प्रभावित करता है।
- विभिन्न विभागों का समन्वय: वह सरकार के विभिन्न विभागों के कार्यों का समन्वय करता है।
- राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल के बीच कड़ी: वह राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल के बीच संचार का मुख्य माध्यम है।
- प्रमुख नीतिगत निर्णय: वह सरकार के प्रमुख नीतिगत निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व: वह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और बैठकों में देश का प्रतिनिधित्व करता है।
- जब प्रधानमंत्री इस्तीफा देता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद इस्तीफा दे देती है।
- मंत्रिपरिषद (Council of Ministers):
- यह मंत्रियों का एक समूह है जो प्रधानमंत्री को सलाह देता है और सरकार के विभिन्न मंत्रालयों का नेतृत्व करता है।
- प्रकार:
- कैबिनेट मंत्री (Cabinet Ministers): ये सबसे महत्वपूर्ण मंत्री होते हैं और प्रमुख मंत्रालयों (जैसे रक्षा, वित्त, गृह, विदेश) के प्रभारी होते हैं। ये कैबिनेट की बैठकों में भाग लेते हैं और सभी प्रमुख नीतिगत निर्णयों में शामिल होते हैं।
- राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) (Ministers of State with Independent Charge): ये छोटे मंत्रालयों के प्रभारी होते हैं और कैबिनेट मंत्रियों के अधीन काम नहीं करते। ये कैबिनेट की बैठकों में तभी भाग लेते हैं जब उनके मंत्रालय से संबंधित कोई विशेष मुद्दा चर्चा में हो।
- राज्य मंत्री (Ministers of State): ये कैबिनेट मंत्रियों की सहायता के लिए नियुक्त किए जाते हैं और उनके अधीन काम करते हैं।
- कैबिनेट: मंत्रिपरिषद के भीतर एक छोटा समूह होता है जिसमें शीर्ष 20-25 मंत्री शामिल होते हैं। सभी महत्वपूर्ण निर्णय कैबिनेट द्वारा लिए जाते हैं।
- सामूहिक उत्तरदायित्व: मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इसका अर्थ है कि यदि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पूरी सरकार (प्रधानमंत्री सहित) को इस्तीफा देना पड़ता है।
भारत में संसदीय प्रणाली है, जहाँ प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है और राष्ट्रपति नाममात्र का प्रमुख।
राष्ट्रपति
राष्ट्रपति भारत का राज्य प्रमुख होता है और भारतीय संघ की कार्यपालिका शक्ति उसमें निहित होती है। वह देश का प्रथम नागरिक होता है।
- राष्ट्रपति का चुनाव:
- राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं होता, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा किया जाता है।
- निर्वाचक मंडल में शामिल होते हैं:
- संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य।
- राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
- दिल्ली और पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
- चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
- कार्यकाल: 5 वर्ष।
- राष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य:
- कार्यकारी शक्तियाँ:
- सभी सरकारी गतिविधियाँ राष्ट्रपति के नाम पर की जाती हैं।
- प्रधानमंत्री, अन्य मंत्रियों, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, राज्यपालों, मुख्य चुनाव आयुक्त, राजदूतों आदि की नियुक्ति करता है।
- रक्षा बलों का सर्वोच्च कमांडर होता है।
- विधायी शक्तियाँ:
- संसद के सत्र बुलाता है, सत्रावसान करता है और लोकसभा को भंग कर सकता है।
- दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर करता है ताकि वे कानून बन सकें।
- संसद के सत्र में न होने पर अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है, जिनकी कानून के समान शक्ति होती है।
- राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करता है।
- न्यायिक शक्तियाँ:
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
- किसी दोषी की सजा को क्षमा, निलंबित या कम कर सकता है (क्षमादान की शक्ति)।
- वित्तीय शक्तियाँ:
- धन विधेयक उसकी पूर्व अनुमति से ही लोकसभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
- वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) संसद के समक्ष प्रस्तुत करवाता है।
- आपातकालीन शक्तियाँ:
- राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352): युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में।
- राज्य आपातकाल (अनुच्छेद 356): राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर (राष्ट्रपति शासन)।
- वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360): देश में वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा होने पर।
- राष्ट्रपति की नाममात्र की शक्तियाँ:
- भारत में राष्ट्रपति की शक्तियाँ नाममात्र की होती हैं। वह प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है।
- वह किसी विधेयक को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, लेकिन यदि संसद उसे दोबारा पारित कर देती है, तो उसे स्वीकृति देनी होती है।
- यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कार्य करे।
निर्वाचक मंडल (Electoral College): राष्ट्रपति के चुनाव के लिए गठित विशेष निर्वाचित सदस्यों का समूह।
राष्ट्रपति भारत के संवैधानिक प्रमुख हैं, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी प्रमुख हैं।
न्यायपालिका
भारत में एक स्वतंत्र और एकीकृत न्यायपालिका है, जिसका कार्य कानूनों की व्याख्या करना, न्याय प्रदान करना और संविधान की रक्षा करना है।
- स्वतंत्र न्यायपालिका:
- इसका अर्थ है कि न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त है।
- न्यायाधीशों को सरकार के अन्य अंगों के दबाव के बिना निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है।
- स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उपाय:
- न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप कम होता है।
- न्यायाधीशों का कार्यकाल सुरक्षित होता है और उन्हें आसानी से हटाया नहीं जा सकता (महाभियोग की जटिल प्रक्रिया)।
- न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते संसद द्वारा निर्धारित होते हैं, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान कम नहीं किए जा सकते।
- न्यायाधीशों के आचरण पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती, सिवाय महाभियोग प्रक्रिया के।
- एकीकृत न्यायपालिका:
- भारत में न्यायपालिका की एक पिरामिडनुमा संरचना है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है, उसके नीचे उच्च न्यायालय और फिर जिला न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court):
- भारत का सर्वोच्च न्यायिक निकाय।
- मुख्य न्यायाधीश: राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त। अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- शक्तियाँ और कार्य:
- मौलिक क्षेत्राधिकार: केंद्र और राज्यों के बीच, या विभिन्न राज्यों के बीच विवादों का निपटारा।
- अपीलीय क्षेत्राधिकार: उच्च न्यायालयों के निर्णयों के खिलाफ अपील सुनता है।
- सलाहकारी क्षेत्राधिकार: राष्ट्रपति को सार्वजनिक महत्व के मामलों पर सलाह दे सकता है।
- संविधान का संरक्षक: संविधान की व्याख्या करता है और उसकी रक्षा करता है।
- मौलिक अधिकारों का संरक्षक: नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए रिट जारी कर सकता है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकता है यदि वह संविधान का उल्लंघन करता हो।
- उच्च न्यायालय (High Courts):
- राज्यों के सर्वोच्च न्यायालय।
- अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों की सुनवाई करते हैं और अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण रखते हैं।
- जिला न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय:
- जिलों और निचले स्तर पर कार्य करते हैं।
- दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई करते हैं।
- न्यायपालिका की भूमिका:
- विवाद समाधान: नागरिकों के बीच, नागरिकों और सरकार के बीच, दो राज्य सरकारों के बीच, और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच विवादों को सुलझाती है।
- कानूनों की व्याख्या: कानूनों और संविधान की व्याख्या करती है।
- मौलिक अधिकारों की रक्षा: नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लागू करती है।
- संविधान का संरक्षक: यह सुनिश्चित करती है कि सरकार संविधान के दायरे में काम करे।
- न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism): कभी-कभी न्यायपालिका जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाती है, जैसे जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): न्यायपालिका की वह शक्ति जिसके तहत वह विधायिका द्वारा पारित कानूनों या कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिकता की जांच करती है।
भारत में स्वतंत्र और एकीकृत न्यायपालिका लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।