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AP · Class 8 · 🧮 Maths · Chapter 1

Rational Numbers

అకరణీయ సంఖ్యల పరిచయంసంవరిత ధర్మంవినిమయ ధర్మంసహచర ధర్మంసున్నా మరియు ఒకటి పాత్రవిభాగ న్యాయం

ఈ అధ్యాయం అకరణీయ సంఖ్యల ప్రాథమిక భావనలను పరిచయం చేస్తుంది. సహజ సంఖ్యలు, పూర్ణాంకాలు మరియు పూర్ణ సంఖ్యల నుండి అకరణీయ సంఖ్యలు ఎలా భిన్నంగా ఉంటాయో విద్యార్థులు నేర్చుకుంటారు. సంకలనం, వ్యవకలనం, గుణకారం మరియు భాగహారం వంటి ప్రాథమిక గణిత ప్రక్రియలలో అకరణీయ సంఖ్యల యొక్క సంవరిత, వినిమయ మరియు సహచర ధర్మాలను అన్వేషిస్తారు. సున్నా మరియు ఒకటి యొక్క పాత్ర, అలాగే గుణకారంపై సంకలనం యొక్క విభాగ న్యాయం కూడా వివరించబడతాయి. ఈ భావనలు గణితంలో మరింత సంక్లిష్టమైన సమస్యలను పరిష్కరించడానికి పునాదిని ఏర్పరుస్తాయి.

परिमेय संख्याओं का परिचय

संख्या प्रणालियों का पुनरीक्षण

  • प्राकृत संख्याएँ (Natural Numbers): गिनती वाली संख्याएँ। \(N = \{1, 2, 3, ...\}\)
  • पूर्ण संख्याएँ (Whole Numbers): प्राकृत संख्याएँ और शून्य। \(W = \{0, 1, 2, 3, ...\}\)
  • पूर्णांक (Integers): पूर्ण संख्याएँ और ऋणात्मक प्राकृत संख्याएँ। \(Z = \{..., -3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, ...\}\)

परिमेय संख्याएँ क्या हैं?

  • एक संख्या जिसे \(p/q\) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, जहाँ \(p\) और \(q\) पूर्णांक हैं और \(q \neq 0\), उसे परिमेय संख्या कहते हैं।
  • उदाहरण: \(1/2, -3/4, 5, 0, -7/1\)
  • सभी प्राकृत संख्याएँ, पूर्ण संख्याएँ और पूर्णांक परिमेय संख्याएँ हैं क्योंकि उन्हें \(q=1\) के साथ \(p/q\) के रूप में लिखा जा सकता है।
  • \(5 = 5/1\)
  • \(0 = 0/1\)
  • \(-3 = -3/1\)

परिमेय संख्याओं के प्रकार

  • धनात्मक परिमेय संख्याएँ: वे परिमेय संख्याएँ जिनमें अंश और हर दोनों धनात्मक या दोनों ऋणात्मक होते हैं।
  • उदाहरण: \(3/4, -2/-5\)
  • ऋणात्मक परिमेय संख्याएँ: वे परिमेय संख्याएँ जिनमें अंश और हर में से कोई एक ऋणात्मक होता है।
  • उदाहरण: \(-3/4, 2/-5\)
  • शून्य: न तो धनात्मक और न ही ऋणात्मक परिमेय संख्या है।

समतुल्य परिमेय संख्याएँ

  • यदि हम किसी परिमेय संख्या के अंश और हर को एक ही गैर-शून्य पूर्णांक से गुणा या भाग करते हैं, तो हमें एक समतुल्य परिमेय संख्या प्राप्त होती है।
  • उदाहरण: \(2/3 = (2 \times 2)/(3 \times 2) = 4/6\)
  • \(10/15 = (10 \div 5)/(15 \div 5) = 2/3\)

मानक रूप में परिमेय संख्याएँ

  • एक परिमेय संख्या को मानक रूप में कहा जाता है यदि उसका हर धनात्मक पूर्णांक हो और अंश और हर में 1 के अलावा कोई उभयनिष्ठ गुणनखंड न हो।
  • किसी परिमेय संख्या को मानक रूप में बदलने के लिए:
  1. हर को धनात्मक बनाएँ (यदि आवश्यक हो)।
  2. अंश और हर को उनके महत्तम समापवर्तक (HCF) से भाग दें।

उदाहरण:

  • \(-15/20\) को मानक रूप में बदलें।
  1. हर पहले से धनात्मक है।
  2. 15 और 20 का HCF 5 है।
  3. \(-15/20 = (-15 \div 5)/(20 \div 5) = -3/4\)
📖నిర్వచనం

एक संख्या जिसे \(p/q\) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, जहाँ \(p\) और \(q\) पूर्णांक हैं और \(q \neq 0\), उसे परिमेय संख्या कहते हैं।

ముఖ్యమైనది

सभी प्राकृत संख्याएँ, पूर्ण संख्याएँ और पूर्णांक परिमेय संख्याएँ हैं।

संख्या प्रणालियों के गुणधर्म: संवरक, क्रमविनिमेयता, साहचर्य

संवरक गुणधर्म (Closure Property)

  • यदि दो संख्याओं पर एक संक्रिया (जैसे जोड़ना) करने पर परिणाम उसी संख्या प्रणाली में आता है, तो वह प्रणाली उस संक्रिया के तहत संवरक होती है।

| संख्या प्रणाली | जोड़ (+) | घटाव (-) | गुणा (×) | भाग (÷) | |---|---|---|---|---| | पूर्ण संख्याएँ | हाँ | नहीं | हाँ | नहीं | | पूर्णांक | हाँ | हाँ | हाँ | नहीं | | परिमेय संख्याएँ | हाँ | हाँ | हाँ | नहीं (शून्य से भाग को छोड़कर) |

स्पष्टीकरण:

  • पूर्ण संख्याएँ:
  • जोड़: \(2 + 3 = 5\) (पूर्ण संख्या) - संवरक
  • घटाव: \(2 - 3 = -1\) (पूर्ण संख्या नहीं) - संवरक नहीं
  • गुणा: \(2 \times 3 = 6\) (पूर्ण संख्या) - संवरक
  • भाग: \(2 \div 3 = 2/3\) (पूर्ण संख्या नहीं) - संवरक नहीं
  • पूर्णांक:
  • जोड़: \(-2 + 5 = 3\) (पूर्णांक) - संवरक
  • घटाव: \(-2 - 5 = -7\) (पूर्णांक) - संवरक
  • गुणा: \(-2 \times 5 = -10\) (पूर्णांक) - संवरक
  • भाग: \(-2 \div 5 = -2/5\) (पूर्णांक नहीं) - संवरक नहीं
  • परिमेय संख्याएँ:
  • जोड़: \(1/2 + 3/4 = 5/4\) (परिमेय संख्या) - संवरक
  • घटाव: \(1/2 - 3/4 = -1/4\) (परिमेय संख्या) - संवरक
  • गुणा: \(1/2 \times 3/4 = 3/8\) (परिमेय संख्या) - संवरक
  • भाग: \(1/2 \div 0\) अपरिभाषित है। इसलिए, परिमेय संख्याएँ भाग के तहत संवरक नहीं हैं। - संवरक नहीं

क्रमविनिमेयता गुणधर्म (Commutativity Property)

  • किसी संक्रिया में संख्याओं का क्रम बदलने पर भी परिणाम वही रहता है, तो वह संक्रिया क्रमविनिमेय होती है।
  • \(a + b = b + a\) (जोड़)
  • \(a \times b = b \times a\) (गुणा)

| संख्या प्रणाली | जोड़ (+) | घटाव (-) | गुणा (×) | भाग (÷) | |---|---|---|---|---| | पूर्ण संख्याएँ | हाँ | नहीं | हाँ | नहीं | | पूर्णांक | हाँ | नहीं | हाँ | नहीं | | परिमेय संख्याएँ | हाँ | नहीं | हाँ | नहीं |

स्पष्टीकरण:

  • पूर्ण संख्याएँ:
  • जोड़: \(2 + 3 = 5\), \(3 + 2 = 5\) - क्रमविनिमेय
  • घटाव: \(2 - 3 = -1\), \(3 - 2 = 1\) (असमान) - क्रमविनिमेय नहीं
  • पूर्णांक:
  • जोड़: \(-2 + 5 = 3\), \(5 + (-2) = 3\) - क्रमविनिमेय
  • घटाव: \(-2 - 5 = -7\), \(5 - (-2) = 7\) (असमान) - क्रमविनिमेय नहीं
  • परिमेय संख्याएँ:
  • जोड़: \(1/2 + 3/4 = 5/4\), \(3/4 + 1/2 = 5/4\) - क्रमविनिमेय
  • घटाव: \(1/2 - 3/4 = -1/4\), \(3/4 - 1/2 = 1/4\) (असमान) - क्रमविनिमेय नहीं
  • गुणा: \(1/2 \times 3/4 = 3/8\), \(3/4 \times 1/2 = 3/8\) - क्रमविनिमेय
  • भाग: \(1/2 \div 3/4 = 2/3\), \(3/4 \div 1/2 = 3/2\) (असमान) - क्रमविनिमेय नहीं

साहचर्य गुणधर्म (Associativity Property)

  • तीन या अधिक संख्याओं पर एक संक्रिया करते समय, संख्याओं के समूहन का तरीका बदलने पर भी परिणाम वही रहता है, तो वह संक्रिया साहचर्य होती है।
  • \((a + b) + c = a + (b + c)\) (जोड़)
  • \((a \times b) \times c = a \times (b \times c)\) (गुणा)

| संख्या प्रणाली | जोड़ (+) | घटाव (-) | गुणा (×) | भाग (÷) | |---|---|---|---|---| | पूर्ण संख्याएँ | हाँ | नहीं | हाँ | नहीं | | पूर्णांक | हाँ | नहीं | हाँ | नहीं | | परिमेय संख्याएँ | हाँ | नहीं | हाँ | नहीं |

स्पष्टीकरण:

  • पूर्ण संख्याएँ:
  • जोड़: \((2 + 3) + 4 = 5 + 4 = 9\), \(2 + (3 + 4) = 2 + 7 = 9\) - साहचर्य
  • घटाव: \((5 - 3) - 1 = 2 - 1 = 1\), \(5 - (3 - 1) = 5 - 2 = 3\) (असमान) - साहचर्य नहीं
  • पूर्णांक:
  • जोड़: \((-2 + 3) + 4 = 1 + 4 = 5\), \(-2 + (3 + 4) = -2 + 7 = 5\) - साहचर्य
  • घटाव: \((-2 - 3) - 4 = -5 - 4 = -9\), \(-2 - (3 - 4) = -2 - (-1) = -1\) (असमान) - साहचर्य नहीं
  • परिमेय संख्याएँ:
  • जोड़: \((1/2 + 1/3) + 1/4 = 5/6 + 1/4 = 13/12\), \(1/2 + (1/3 + 1/4) = 1/2 + 7/12 = 13/12\) - साहचर्य
  • घटाव: \((1/2 - 1/3) - 1/4 = 1/6 - 1/4 = -1/12\), \(1/2 - (1/3 - 1/4) = 1/2 - 1/12 = 5/12\) (असमान) - साहचर्य नहीं
  • गुणा: \((1/2 \times 1/3) \times 1/4 = 1/6 \times 1/4 = 1/24\), \(1/2 \times (1/3 \times 1/4) = 1/2 \times 1/12 = 1/24\) - साहचर्य
  • भाग: \((1/2 \div 1/3) \div 1/4 = 3/2 \div 1/4 = 6\), \(1/2 \div (1/3 \div 1/4) = 1/2 \div 4/3 = 3/8\) (असमान) - साहचर्य नहीं
గుర్తుంచుకోండి

घटाव और भाग न तो क्रमविनिमेय हैं और न ही साहचर्य किसी भी संख्या प्रणाली में (प्राकृत, पूर्ण, पूर्णांक, परिमेय)।

शून्य और एक की भूमिका

शून्य (0) - योज्य तत्समक (Additive Identity)

  • जब किसी परिमेय संख्या में शून्य जोड़ा जाता है, तो परिणाम वही परिमेय संख्या होती है।
  • \(a + 0 = 0 + a = a\)
  • उदाहरण:
  • \(5 + 0 = 5\)
  • \(-7 + 0 = -7\)
  • \(3/4 + 0 = 3/4\)
  • शून्य को योज्य तत्समक कहते हैं क्योंकि यह जोड़ संक्रिया के तहत संख्या की पहचान को नहीं बदलता है।

एक (1) - गुणात्मक तत्समक (Multiplicative Identity)

  • जब किसी परिमेय संख्या को एक से गुणा किया जाता है, तो परिणाम वही परिमेय संख्या होती है।
  • \(a \times 1 = 1 \times a = a\)
  • उदाहरण:
  • \(5 \times 1 = 5\)
  • \(-7 \times 1 = -7\)
  • \(3/4 \times 1 = 3/4\)
  • एक को गुणात्मक तत्समक कहते हैं क्योंकि यह गुणा संक्रिया के तहत संख्या की पहचान को नहीं बदलता है।
📖నిర్వచనం

योज्य तत्समक: वह संख्या जिसे किसी भी संख्या में जोड़ने पर वही संख्या प्राप्त होती है। परिमेय संख्याओं के लिए यह शून्य (0) है।

📖నిర్వచనం

गुणात्मक तत्समक: वह संख्या जिसे किसी भी संख्या से गुणा करने पर वही संख्या प्राप्त होती है। परिमेय संख्याओं के लिए यह एक (1) है।

ऋणात्मक (योज्य प्रतिलोम)

ऋणात्मक या योज्य प्रतिलोम

  • किसी परिमेय संख्या \(a/b\) का ऋणात्मक या योज्य प्रतिलोम वह संख्या है जिसे \(a/b\) में जोड़ने पर शून्य प्राप्त होता है।
  • \(a/b + (-a/b) = 0\)
  • इसलिए, \(a/b\) का योज्य प्रतिलोम \(-a/b\) है, और \(-a/b\) का योज्य प्रतिलोम \(a/b\) है।
  • उदाहरण:
  • \(5\) का योज्य प्रतिलोम \(-5\) है क्योंकि \(5 + (-5) = 0\)
  • \(-7\) का योज्य प्रतिलोम \(7\) है क्योंकि \(-7 + 7 = 0\)
  • \(3/4\) का योज्य प्रतिलोम \(-3/4\) है क्योंकि \(3/4 + (-3/4) = 0\)
  • \(-2/5\) का योज्य प्रतिलोम \(2/5\) है क्योंकि \(-2/5 + 2/5 = 0\)
📖నిర్వచనం

योज्य प्रतिलोम: किसी संख्या का योज्य प्रतिलोम वह संख्या है जिसे मूल संख्या में जोड़ने पर योज्य तत्समक (शून्य) प्राप्त होता है। \(a\) का योज्य प्रतिलोम \(-a\) है।

व्युत्क्रम (गुणात्मक प्रतिलोम)

व्युत्क्रम या गुणात्मक प्रतिलोम

  • किसी गैर-शून्य परिमेय संख्या \(a/b\) का व्युत्क्रम या गुणात्मक प्रतिलोम वह संख्या है जिसे \(a/b\) से गुणा करने पर एक प्राप्त होता है।
  • \(a/b \times (b/a) = 1\)
  • इसलिए, \(a/b\) का व्युत्क्रम \(b/a\) है।
  • उदाहरण:
  • \(5\) का व्युत्क्रम \(1/5\) है क्योंकि \(5 \times 1/5 = 1\)
  • \(-7\) का व्युत्क्रम \(-1/7\) है क्योंकि \(-7 \times (-1/7) = 1\)
  • \(3/4\) का व्युत्क्रम \(4/3\) है क्योंकि \(3/4 \times 4/3 = 1\)
  • \(-2/5\) का व्युत्क्रम \(-5/2\) है क्योंकि \(-2/5 \times (-5/2) = 1\)
  • महत्वपूर्ण: शून्य \((0)\) का कोई व्युत्क्रम नहीं होता क्योंकि \(1/0\) अपरिभाषित है।
📖నిర్వచనం

गुणात्मक प्रतिलोम (व्युत्क्रम): किसी गैर-शून्य संख्या का गुणात्मक प्रतिलोम वह संख्या है जिसे मूल संख्या से गुणा करने पर गुणात्मक तत्समक (एक) प्राप्त होता है। \(a/b\) का गुणात्मक प्रतिलोम \(b/a\) है।

🚧తప్పుడు అభిప్రాయం

शून्य का कोई गुणात्मक प्रतिलोम नहीं होता। छात्र अक्सर \(1/0\) को शून्य मान लेते हैं, जो गलत है।

वितरण गुणधर्म (Distributivity Property)

गुणन का योग पर वितरण गुणधर्म

  • यह गुणधर्म बताता है कि गुणन संक्रिया योग या घटाव संक्रिया पर वितरित हो सकती है।
  • \(a \times (b + c) = (a \times b) + (a \times c)\)
  • \(a \times (b - c) = (a \times b) - (a \times c)\)
  • यह गुणधर्म गणनाओं को सरल बनाने में बहुत उपयोगी है।

उदाहरण:

  • \(2 \times (5 + 7) = 2 \times 12 = 24\)
  • वितरण गुणधर्म का उपयोग करके: \((2 \times 5) + (2 \times 7) = 10 + 14 = 24\)
  • परिमेय संख्याओं के लिए:
  • \(1/2 \times (3/4 + 1/5)\)
  • \(= (1/2 \times 3/4) + (1/2 \times 1/5)\)
  • \(= 3/8 + 1/10\)
  • \(= 15/40 + 4/40 = 19/40\)

गुणन का घटाव पर वितरण गुणधर्म

  • \(a \times (b - c) = (a \times b) - (a \times c)\)
  • उदाहरण:
  • \(2/3 \times (4/5 - 1/2)\)
  • \(= (2/3 \times 4/5) - (2/3 \times 1/2)\)
  • \(= 8/15 - 2/6\)
  • \(= 8/15 - 1/3\)
  • \(= 8/15 - 5/15 = 3/15 = 1/5\)
🧮సూత్రం

वितरण गुणधर्म:

  • \(a \times (b + c) = (a \times b) + (a \times c)\)
  • \(a \times (b - c) = (a \times b) - (a \times c)\)
💡సూచన

जटिल अभिव्यक्तियों को सरल बनाने के लिए वितरण गुणधर्म का उपयोग करना सीखें। यह अक्सर गणनाओं को आसान बनाता है।

संख्या रेखा पर परिमेय संख्याओं का निरूपण

संख्या रेखा क्या है?

  • एक सीधी रेखा जिस पर संख्याओं को समान दूरी पर चिह्नित किया जाता है।
  • शून्य केंद्र में होता है। धनात्मक संख्याएँ दाईं ओर और ऋणात्मक संख्याएँ बाईं ओर होती हैं।

परिमेय संख्याओं का निरूपण कैसे करें?

  • चरण 1: एक संख्या रेखा खींचें और उस पर पूर्णांकों को चिह्नित करें।
  • चरण 2: दी गई परिमेय संख्या के हर को देखें। यह दर्शाता है कि प्रत्येक इकाई खंड (जैसे 0 से 1, 1 से 2) को कितने समान भागों में विभाजित किया जाना है।
  • चरण 3: अंश को देखें। यह दर्शाता है कि शून्य से शुरू होकर हर द्वारा निर्धारित भागों में से कितने भाग लेने हैं।

उदाहरण 1: \(3/4\) का निरूपण करें

  1. \(3/4\) 0 और 1 के बीच है।
  2. हर 4 है, इसलिए 0 और 1 के बीच के खंड को 4 समान भागों में विभाजित करें।
  3. अंश 3 है, इसलिए 0 से शुरू होकर तीसरे विभाजन को चिह्नित करें। यह बिंदु \(3/4\) को दर्शाता है।

उदाहरण 2: \(-5/6\) का निरूपण करें

  1. \(-5/6\) 0 और -1 के बीच है।
  2. हर 6 है, इसलिए 0 और -1 के बीच के खंड को 6 समान भागों में विभाजित करें।
  3. अंश 5 है (ऋणात्मक दिशा में), इसलिए 0 से शुरू होकर बाईं ओर पाँचवें विभाजन को चिह्नित करें। यह बिंदु \(-5/6\) को दर्शाता है।
💡సూచన

संख्या रेखा पर परिमेय संख्याएँ निरूपित करते समय, हमेशा हर पर ध्यान दें। यह इकाई खंड के विभाजनों की संख्या निर्धारित करता है।

दो परिमेय संख्याओं के बीच परिमेय संख्याएँ

दो परिमेय संख्याओं के बीच कितनी परिमेय संख्याएँ होती हैं?

  • किन्हीं भी दो परिमेय संख्याओं के बीच अनंत परिमेय संख्याएँ होती हैं।

दो परिमेय संख्याओं के बीच परिमेय संख्याएँ ज्ञात करने की विधियाँ

विधि 1: समान हर बनाना (LCM विधि)

  1. दी गई परिमेय संख्याओं के हरों का लघुत्तम समापवर्त्य (LCM) ज्ञात करें।
  2. दोनों परिमेय संख्याओं को समतुल्य परिमेय संख्याओं में बदलें जिनका हर LCM हो।
  3. यदि आवश्यक संख्याएँ अभी भी नहीं मिलती हैं, तो अंश और हर को एक बड़ी संख्या (जैसे 10) से गुणा करें ताकि उनके बीच अधिक संख्याएँ मिल सकें।

उदाहरण: \(1/3\) और \(1/2\) के बीच 5 परिमेय संख्याएँ ज्ञात करें।

  1. हर 3 और 2 का LCM 6 है।
  2. \(1/3 = (1 \times 2)/(3 \times 2) = 2/6\)
  3. \(1/2 = (1 \times 3)/(2 \times 3) = 3/6\)
  4. \(2/6\) और \(3/6\) के बीच कोई पूर्णांक अंश वाली संख्या नहीं है।
  5. अंश और हर को 10 से गुणा करें (या किसी बड़ी संख्या से):
  • \(2/6 = 20/60\)
  • \(3/6 = 30/60\)
  1. अब, \(20/60\) और \(30/60\) के बीच की संख्याएँ हैं: \(21/60, 22/60, 23/60, 24/60, 25/60\) आदि।

विधि 2: माध्य विधि (Mean Method)

  • दो परिमेय संख्याओं \(a\) और \(b\) के बीच एक परिमेय संख्या \((a+b)/2\) होती है।
  • इस प्रक्रिया को दोहराकर अधिक संख्याएँ ज्ञात की जा सकती हैं।

उदाहरण: \(1/3\) और \(1/2\) के बीच 3 परिमेय संख्याएँ ज्ञात करें।

  1. पहली संख्या: \((1/3 + 1/2)/2 = ( (2+3)/6 )/2 = (5/6)/2 = 5/12\)
  2. दूसरी संख्या (\(1/3\) और \(5/12\) के बीच): \((1/3 + 5/12)/2 = ( (4+5)/12 )/2 = (9/12)/2 = 9/24 = 3/8\)
  3. तीसरी संख्या (\(5/12\) और \(1/2\) के बीच): \((5/12 + 1/2)/2 = ( (5+6)/12 )/2 = (11/12)/2 = 11/24\)
  • तो, \(1/3\) और \(1/2\) के बीच की तीन संख्याएँ \(3/8, 5/12, 11/24\) हैं।

कौन सी विधि बेहतर है?

  • यदि आपको कुछ संख्याएँ (जैसे 2 या 3) ज्ञात करनी हैं, तो माध्य विधि आसान हो सकती है।
  • यदि आपको अधिक संख्याएँ (जैसे 5 या 10) ज्ञात करनी हैं, तो समान हर बनाने की विधि अक्सर अधिक कुशल होती है।
ముఖ్యమైనది

किन्हीं भी दो परिमेय संख्याओं के बीच अनंत परिमेय संख्याएँ होती हैं।

💡సూచన

परीक्षा में, आपको अक्सर एक विशिष्ट संख्या में परिमेय संख्याएँ ज्ञात करने के लिए कहा जाएगा। LCM विधि आमतौर पर अधिक व्यवस्थित होती है।

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