LOCAL SELF GOVERNMENT
ఈ అధ్యాయం స్థానిక స్వపరిపాలన యొక్క ప్రాముఖ్యతను మరియు భారతదేశంలో దాని పరిణామాన్ని వివరిస్తుంది. గ్రామీణ మరియు పట్టణ ప్రాంతాలలో స్థానిక స్వపరిపాలన సంస్థలైన గ్రామ పంచాయతీలు, మండల పరిషత్లు, జిల్లా పరిషత్లు, నగర పంచాయతీలు, మున్సిపల్ కౌన్సిల్లు మరియు మున్సిపల్ కార్పొరేషన్ల నిర్మాణం, విధులు మరియు నిధుల వనరులను వివరిస్తుంది. ఓటర్ల జాబితా, వార్డులు, ఎన్నికలు, రిజర్వేషన్లు మరియు సర్పంచ్, ఉపసర్పంచ్ వంటి పదవుల పాత్ర గురించి కూడా చర్చిస్తుంది. స్థానిక స్థాయిలో పరిపాలన ఎలా పనిచేస్తుందో మరియు ప్రజల భాగస్వామ్యం ఎలా ఉంటుందో అర్థం చేసుకోవడానికి ఇది సహాయపడుతుంది.
स्थानीय स्वशासन: परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्थानीय स्वशासन का अर्थ है राज्य स्तर से नीचे की सरकारी इकाइयाँ जो स्थानीय स्तर पर शासन करती हैं।
- उद्देश्य: स्थानीय लोगों की भागीदारी से स्थानीय समस्याओं का समाधान करना और सार्वजनिक सुविधाओं (जैसे सड़कें, पानी, स्वच्छता, शिक्षा) का प्रबंधन करना।
- संवैधानिक प्रावधान:
- संविधान का अनुच्छेद 40 स्थानीय स्वशासन से संबंधित है।
- यह महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित था, जिन्होंने ग्राम स्वराज की वकालत की थी।
- महत्वपूर्ण संशोधन:
- 73वाँ संवैधानिक संशोधन (1992): ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज) की स्थापना की।
- 74वाँ संवैधानिक संशोधन (1992): शहरी क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन (नगर पालिका) की स्थापना की।
- आंध्र प्रदेश में कार्यान्वयन:
- इन संशोधनों के आधार पर, आंध्र प्रदेश सरकार ने पंचायती राज अधिनियम 1994 बनाया।
- इस अधिनियम ने राज्य में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन निकायों का गठन किया।
- ऐतिहासिक संदर्भ:
- चोल राजवंश अपने उत्कृष्ट स्थानीय स्वशासन के लिए प्रसिद्ध था।
- राजस्थान (1959) भारत का पहला राज्य था जिसने पंचायती राज प्रणाली को लागू किया, इसके बाद उसी वर्ष आंध्र प्रदेश ने भी इसे अपनाया।
सार्वजनिक सुविधाएँ (Public Amenities): सड़कें, हैंडपंप, स्ट्रीट लाइट, पानी की आपूर्ति, स्वच्छता, शिक्षा आदि जैसी सुविधाएँ जो सरकार लोगों को प्रदान करती है।
चोल राजवंश प्राचीन भारत में स्थानीय स्वशासन का एक उत्कृष्ट उदाहरण था।
ग्रामीण स्थानीय स्वशासन: त्रि-स्तरीय प्रणाली
आंध्र प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1994 ने ग्रामीण क्षेत्रों में त्रि-स्तरीय स्थानीय स्वशासन प्रणाली की स्थापना की है:
- ग्राम पंचायत: ग्राम स्तर पर।
- मंडल प्रजा परिषद: मंडल स्तर पर।
- जिला प्रजा परिषद: जिला स्तर पर।
ग्राम स्तर पर कार्यप्रणाली
ग्राम स्तर पर दो प्रमुख निकाय कार्य करते हैं:
- ग्राम सभा
- ग्राम पंचायत
ग्राम सभा
- ग्राम स्तर पर सामान्य निकाय है।
- इसमें गाँव के सभी मतदाता शामिल होते हैं।
- यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का प्रतीक है।
- कार्य:
- ग्राम पंचायत के कामकाज की समीक्षा करना।
- गाँव के कल्याण के बारे में निर्णय लेने में भाग लेना।
- अध्यक्षता: गाँव के अध्यक्ष/सरपंच द्वारा की जाती है।
ग्राम पंचायत
- सरपंच और वार्ड सदस्यों से मिलकर बनती है।
- चुनावों के माध्यम से गठित होती है।
- अध्यक्षता: गाँव के अध्यक्ष या सरपंच द्वारा की जाती है।
ग्राम पंचायत का गठन
- मतदाता सूची:
- गाँव के सभी निवासी जिनकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है, उन्हें मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना होता है।
- बूथ स्तर के अधिकारी (B.L.O.) सूची में बदलाव की जाँच करते हैं और परिवर्धन या विलोपन के लिए सुझाव आमंत्रित करते हैं।
- वार्ड:
- गाँव को 'वार्डों' (गलियों या कॉलोनियों) में विभाजित किया जाता है, जिसमें लगभग समान संख्या में मतदाता होते हैं।
- प्रत्येक वार्ड एक सदस्य को ग्राम पंचायत के लिए चुनता है, जिसे 'वार्ड सदस्य' कहा जाता है।
- एक पंचायत में कम से कम पाँच वार्ड सदस्य और अधिकतम इक्कीस वार्ड सदस्य हो सकते हैं।
- कोई भी व्यक्ति जिसकी आयु इक्कीस वर्ष या उससे अधिक है, चुनाव लड़ सकता है।
- आरक्षण:
- पहले महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम था। अब, एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं (आंध्र प्रदेश में 50% तक विस्तारित)।
- अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), और पिछड़ा वर्ग (BC) के लिए भी आरक्षण प्रदान किया जाता है ताकि समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
- चुनाव:
- ग्राम पंचायतों के चुनाव आमतौर पर हर पाँच साल में होते हैं।
- प्रत्येक मतदाता दो वोट डालता है: एक वार्ड सदस्य के लिए और दूसरा सरपंच के लिए।
- जिसे अधिकतम वोट मिलते हैं, उसे निर्वाचित घोषित किया जाता है।
सरपंच
- ग्राम पंचायत का प्रमुख होता है।
- जिम्मेदारियाँ:
- पंचायत के सभी निर्णयों को लागू करना।
- पंचायत के दिन-प्रतिदिन के कार्यों की देखभाल करना।
- पंचायत की आय और व्यय के लिए जिम्मेदार।
उप-सरपंच
- सरपंच और वार्ड सदस्य अप्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से वार्ड सदस्यों में से एक को उप-सरपंच चुनते हैं।
- सरपंच की अनुपस्थिति में उप-सरपंच, सरपंच के रूप में कार्य करता है।
ग्राम सभा: गाँव के सभी मतदाताओं का निकाय, जो प्रत्यक्ष लोकतंत्र का प्रतीक है।
ग्राम सभा और ग्राम पंचायत के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। ग्राम सभा में सभी मतदाता होते हैं, जबकि ग्राम पंचायत निर्वाचित सदस्यों का निकाय है।
ग्राम पंचायत के कार्य और धन के स्रोत
ग्राम पंचायत के कार्य
ग्राम पंचायतें गाँव के विकास और सार्वजनिक सुविधाओं के प्रावधान के लिए जिम्मेदार होती हैं।
- निर्माण और रखरखाव:
- पानी के स्रोत (कुएँ, हैंडपंप) का निर्माण और रखरखाव।
- सड़कें, नालियाँ, स्कूल भवन और अन्य सामान्य संपत्ति संसाधनों का निर्माण और रखरखाव।
- कर लगाना और एकत्र करना:
- स्थानीय कर लगाना और एकत्र करना।
- सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन:
- गाँव में रोजगार सृजन से संबंधित सरकारी योजनाओं को लागू करना।
पंचायत के लिए धन के स्रोत
ग्राम पंचायतों को अपने कार्यों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से धन प्राप्त होता है।
- स्थानीय कर:
- घरों, बाजारों आदि पर करों का संग्रह।
- सरकारी अनुदान और ऋण:
- राज्य सरकारों, जिला परिषद और मंडल परिषद से अनुदान-सहायता और ऋण।
- दान:
- स्थानीय लोगों से दान।
मंडल और जिला परिषद
मंडल प्रजा परिषद
- एक मंडल परिषद में 20-40 ग्राम पंचायतें शामिल होती हैं।
- सदस्य: मंडल प्रजा परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (MPTCs) के सदस्य मतदाताओं द्वारा सीधे चुने जाते हैं।
- अध्यक्ष: MPTCs अपने में से एक सदस्य को मंडल प्रजा परिषद अध्यक्ष (MPP) और एक को उपाध्यक्ष के रूप में अप्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से चुनते हैं।
- कुछ सदस्य नामांकित (सह-विकल्पित सदस्य) होते हैं।
जिला प्रजा परिषद
- जिले की सभी मंडल परिषदें जिला प्रजा परिषद के अधीन आती हैं।
- सदस्य: जिला प्रजा परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (ZPTCs) के सदस्य मतदाताओं द्वारा सीधे चुने जाते हैं।
- अध्यक्ष: ZPTCs अपने में से एक सदस्य को जिला प्रजा परिषद अध्यक्ष और एक को उपाध्यक्ष के रूप में अप्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से चुनते हैं।
- कुछ सदस्य नामांकित (सह-विकल्पित सदस्य) होते हैं।
छात्र अक्सर ग्राम पंचायत के कार्यों और धन के स्रोतों को भ्रमित कर देते हैं। कार्यों में 'क्या किया जाता है' शामिल है, जबकि धन के स्रोतों में 'पैसा कहाँ से आता है' शामिल है।
शहरी स्थानीय स्वशासन
शहरी क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन जनसंख्या के आकार के आधार पर तीन प्रकार के होते हैं:
- नगर पंचायत (Nagar Panchayat): संक्रमणकालीन क्षेत्रों के लिए (ग्रामीण से शहरी में परिवर्तित हो रहे)।
- नगर पालिका परिषद (Municipal Council): छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए।
- नगर निगम (Municipal Corporation): बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए।
नगर पंचायत
- एक अध्यक्ष और वार्ड पार्षदों वाली समिति होती है।
- सदस्यता: न्यूनतम दस निर्वाचित वार्ड सदस्य और तीन नामांकित सदस्य।
- चुनाव: वार्ड सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर पाँच साल के कार्यकाल के लिए सीधे चुने जाते हैं।
- आरक्षण: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होती हैं।
नगर पालिका परिषद
- एक नगर पालिका परिषद में निर्वाचित सदस्य होते हैं जिन्हें 'पार्षद' कहा जाता है, और नामांकित सदस्य।
- गठन: नगर पालिका क्षेत्र को वार्डों में विभाजित किया जाता है।
- चुनाव: वार्ड पार्षद हर पाँच साल में सीधे चुने जाते हैं।
- अध्यक्ष: ये पार्षद और परिषद के अन्य सदस्य मिलकर नगर पालिका अध्यक्ष को अप्रत्यक्ष रूप से चुनते हैं।
नगर निगम
- प्रत्येक नगर निगम में निर्वाचित सदस्य होते हैं जिन्हें 'कॉर्पोरेटर' कहा जाता है, और नामांकित सदस्य।
- गठन: नगर निगम क्षेत्र को डिवीजनों में विभाजित किया जाता है।
- चुनाव: वार्ड कॉर्पोरेटर हर पाँच साल में सीधे चुने जाते हैं।
- महापौर: ये कॉर्पोरेटर और निगम के अन्य सदस्य मिलकर नगर निगम के महापौर को अप्रत्यक्ष रूप से चुनते हैं।
शहरी स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली
- कार्य: पानी की आपूर्ति, स्ट्रीट लाइटिंग, सड़कों का रखरखाव और निर्माण, जल निकासी और कचरा निपटान, स्कूल चलाना, राशन की दुकानें, अस्पताल आदि।
- विभाग: प्रत्येक नगर पालिका में कई विभाग होते हैं (जैसे जल आपूर्ति, बिजली, शिक्षा, कचरा निपटान), प्रत्येक का नेतृत्व एक अधिकारी करता है।
- पार्षदों की भूमिका:
- अपने वार्ड के लोगों की जरूरतों और समस्याओं को समझना।
- नगर पालिका बैठकों में उन पर चर्चा करना।
- विभिन्न समितियों में कार्य करना, जो नगर पालिका के कामकाज की समीक्षा करती हैं और नई परियोजनाओं की योजना बनाती हैं।
- प्रस्ताव तैयार करना जो बैठकों में चर्चा और पारित किए जाते हैं।
- कार्यान्वयन: इन निर्णयों को नगर पालिका के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा लागू किया जाता है।
शहरी स्थानीय निकायों के लिए धन
- करों का संग्रह:
- नगर पालिकाएँ घरों, पानी और स्ट्रीट लाइट, दुकानों, फिल्म टिकटों आदि पर कई कर लगाती हैं।
- सरकारी अनुदान:
- इन करों से प्राप्त आय अक्सर पर्याप्त नहीं होती है, इसलिए नगर पालिकाएँ सरकारी अनुदानों पर निर्भर करती हैं।
- सरकार विभिन्न परियोजनाओं (जैसे सड़क निर्माण) और नगर पालिकाओं के नियमित कार्यों के लिए धन आवंटित करती है।
आंध्र प्रदेश में सबसे पुरानी नगर पालिका भीमुनिपटनम (1861) है, जो विशाखापत्तनम जिले में स्थित है।
ग्राम सचिवालयम प्रणाली
आंध्र प्रदेश में 2 अक्टूबर, 2019 को ग्राम सचिवालयम प्रणाली शुरू की गई थी।
- उद्देश्य: सार्वजनिक सेवाओं को प्रभावी ढंग से, पारदर्शी रूप से और जवाबदेही के साथ लोगों तक पहुँचाना।
- संरचना:
- प्रत्येक 2000 लोगों पर एक ग्राम सचिवालयम स्थापित किया जाता है।
- प्रत्येक ग्राम सचिवालयम में ग्यारह ग्राम सचिवालयम कार्यपालक (कर्मचारी) होते हैं।
- सेवा वितरण: सेवा वितरण ग्राम स्वयंसेवकों के माध्यम से किया जाता है, जिन्हें प्रत्येक घर के लिए नियुक्त किया जाता है।
- यह प्रणाली सरकार को लोगों के करीब लाने और विभिन्न सरकारी सेवाओं को एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराने में मदद करती है।
ग्राम सचिवालयम प्रणाली का मुख्य उद्देश्य सरकारी सेवाओं को प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से जनता तक पहुँचाना है।