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AP · Class 6 · 🔬 Science · Chapter 8

REPRODUCTION IN PLANTS

అలైంగిక ప్రత్యుత్పత్తిలైంగిక ప్రత్యుత్పత్తిశాఖీయ వ్యాప్తిపరాగసంపర్కంవిత్తన వ్యాప్తి

ఈ అధ్యాయం మొక్కలు ఎలా ప్రత్యుత్పత్తి చేస్తాయో వివరిస్తుంది. అలైంగిక మరియు లైంగిక ప్రత్యుత్పత్తి పద్ధతులు, వాటి ఉదాహరణలు, పువ్వుల నిర్మాణం మరియు వాటి ప్రత్యుత్పత్తి పాత్ర, అలాగే విత్తనాలు ఎలా ఏర్పడతాయి మరియు వ్యాప్తి చెందుతాయి అనే అంశాలను ఇది వివరిస్తుంది. ఈ జ్ఞానం మొక్కల జీవిత చక్రం మరియు పర్యావరణ వ్యవస్థలో వాటి ప్రాముఖ్యతను అర్థం చేసుకోవడానికి సహాయపడుతుంది.

प्रजनन के तरीके (Modes of Reproduction)

सभी सजीवों का एक मुख्य लक्षण है अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करना, जिसे प्रजनन (Reproduction) कहते हैं। पौधों में प्रजनन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:

  1. अलैंगिक प्रजनन (Asexual Reproduction):
  • नए पौधे बिना बीज के उत्पन्न होते हैं।
  • इसमें केवल एक जनक (parent) शामिल होता है।
  • उत्पन्न हुए नए पौधे आनुवंशिक रूप से जनक पौधे के समान (exact copies) होते हैं।
  1. लैंगिक प्रजनन (Sexual Reproduction):
  • नए पौधे बीजों से उत्पन्न होते हैं।
  • इसमें आमतौर पर दो जनक (male and female) शामिल होते हैं।
  • उत्पन्न हुए नए पौधों में दोनों जनकों के गुण होते हैं।

प्रजनन का महत्व

  • जाति की निरंतरता (Continuity of species): यह सुनिश्चित करता है कि जीव पृथ्वी पर बने रहें।
  • संख्या में वृद्धि (Increase in number): जीवों की आबादी को बढ़ाता है।
  • विविधता (Variation): लैंगिक प्रजनन से उत्पन्न विविधताएं जीवों को बदलते वातावरण के अनुकूल बनाने में मदद करती हैं।
ముఖ్యమైనది

पौधों में पुष्प (Flowers) प्रजनन अंग होते हैं। जड़, तना और पत्तियां कायिक अंग (Vegetative parts) होते हैं।

अलैंगिक प्रजनन (Asexual Reproduction)

अलैंगिक प्रजनन में, नए पौधे बिना बीज या बीजाणु (spores) के उत्पन्न होते हैं। यह कई तरीकों से होता है:

1. कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation)

  • यह अलैंगिक प्रजनन का एक प्रकार है जिसमें नए पौधे पौधे के कायिक भागों (जड़, तना, पत्तियां और कलियां) से उत्पन्न होते हैं।
  • लाभ:
  • कम समय में नए पौधे तैयार होते हैं।
  • पुष्प और फल बीजों से उगने वाले पौधों की तुलना में जल्दी आते हैं।
  • नए पौधे आनुवंशिक रूप से जनक पौधे के समान होते हैं।
  • ऐसे पौधे भी उगाए जा सकते हैं जो बीज उत्पन्न नहीं करते (जैसे केला, गुलाब)।
  • विभिन्न तरीके:
  • तने द्वारा:
  • कटिंग (Cutting): गुलाब, चंपा, गन्ने को तने के टुकड़े (कटिंग) से उगाया जाता है। नोड (गांठ) वाले हिस्से को मिट्टी में दबाने पर जड़ें और पत्तियां निकल आती हैं।
  • भूमिगत तने (Underground Stems): आलू में 'आँखें' (buds) होती हैं जो नए पौधे को जन्म दे सकती हैं। अदरक और हल्दी भी भूमिगत तने से उगते हैं।
  • पत्तियों द्वारा:
  • ब्रायोफिलम (Bryophyllum): इसकी पत्तियों के किनारों पर कलियां होती हैं। यदि पत्ती नम मिट्टी पर गिर जाए, तो प्रत्येक कली से नया पौधा विकसित हो सकता है।
  • जड़ों द्वारा:
  • शकरकंद (Sweet potato) और डहेलिया (Dahlia) जैसे पौधों की जड़ें नए पौधे उत्पन्न कर सकती हैं।
  • अन्य:
  • कैक्टस जैसे पौधे शरीर के अलग हुए भागों से नए पौधे उत्पन्न करते हैं।

2. मुकुलन (Budding)

  • यह विधि मुख्य रूप से यीस्ट (Yeast) जैसे एककोशिकीय जीवों में पाई जाती है।
  • प्रक्रिया:
  1. यीस्ट कोशिका से एक छोटा बल्ब जैसी संरचना निकलती है, जिसे मुकुल (Bud) कहते हैं।
  2. मुकुल धीरे-धीरे बढ़ता है और जनक कोशिका से अलग हो जाता है।
  3. यह एक नई यीस्ट कोशिका बनाता है।
  4. कभी-कभी, एक मुकुल से दूसरा मुकुल निकल आता है, जिससे मुकुलों की एक श्रृंखला बन जाती है।
  5. यह प्रक्रिया जारी रहने पर थोड़े समय में बड़ी संख्या में यीस्ट कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं।

3. खंडन (Fragmentation)

  • यह विधि मुख्य रूप से शैवाल (Algae) जैसे स्पाइरोगाइरा (Spirogyra) में पाई जाती है।
  • प्रक्रिया:
  1. शैवाल दो या अधिक टुकड़ों (fragments) में टूट जाता है।
  2. प्रत्येक टुकड़ा एक नए जीव में विकसित होता है।
  3. पर्याप्त पानी और पोषक तत्व उपलब्ध होने पर यह प्रक्रिया तेजी से होती है, जिससे शैवाल थोड़े समय में बड़े क्षेत्र को ढक लेते हैं।

4. बीजाणु निर्माण (Spore Formation)

  • यह विधि कवक (Fungi) जैसे ब्रेड मोल्ड (Bread mould), और फर्न (Ferns) तथा मॉस (Moss) जैसे पौधों में पाई जाती है।
  • प्रक्रिया:
  1. बीजाणु अलैंगिक प्रजनन करने वाली संरचनाएं होती हैं।
  2. प्रत्येक बीजाणु एक कठोर सुरक्षात्मक आवरण से ढका होता है जो इसे प्रतिकूल परिस्थितियों (जैसे उच्च तापमान, कम आर्द्रता) से बचाता है।
  3. यह उन्हें लंबे समय तक जीवित रहने में मदद करता है।
  4. अनुकूल परिस्थितियों में (नमी और उचित तापमान), बीजाणु अंकुरित होते हैं और एक नए जीव में विकसित होते हैं।
  5. बीजाणु हवा में हल्के होने के कारण लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
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