Federalism
ఈ అధ్యాయం ఫెడరలిజం యొక్క భావనను, దాని ముఖ్య లక్షణాలను మరియు ప్రపంచవ్యాప్తంగా, ముఖ్యంగా భారతదేశంలో దాని ఆచరణను వివరిస్తుంది. అధికార విభజన, వివిధ స్థాయిల ప్రభుత్వాలు, లిస్ట్లు (కేంద్ర, రాష్ట్ర, ఉమ్మడి), భాషా విధానం మరియు వికేంద్రీకరణ వంటి అంశాలు చర్చించబడ్డాయి. ఇది భారతదేశంలో ప్రజాస్వామ్య రాజకీయాలు సమాఖ్య స్ఫూర్తిని ఎలా బలోపేతం చేశాయో కూడా వివరిస్తుంది.
संघवाद क्या है?
संघवाद एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें शक्ति को केंद्रीय प्राधिकरण और देश की विभिन्न घटक इकाइयों के बीच विभाजित किया जाता है।
- संघीय व्यवस्था में आमतौर पर सरकार के दो स्तर होते हैं:
- पूरे देश के लिए सरकार: जो राष्ट्रीय महत्व के कुछ विषयों के लिए जिम्मेदार होती है।
- प्रांतों या राज्यों के स्तर पर सरकारें: जो अपने-अपने राज्यों के दिन-प्रतिदिन के प्रशासन का ध्यान रखती हैं।
- एकात्मक व्यवस्था में:
- या तो सरकार का केवल एक ही स्तर होता है।
- या उप-इकाइयाँ केंद्रीय सरकार के अधीनस्थ होती हैं।
- केंद्रीय सरकार प्रांतीय या स्थानीय सरकार को आदेश दे सकती है।
- संघीय व्यवस्था में:
- केंद्रीय सरकार राज्य सरकार को कुछ भी करने का आदेश नहीं दे सकती।
- राज्य सरकार के पास अपनी शक्तियाँ होती हैं जिसके लिए वह केंद्रीय सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं होती।
- दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने कार्यों के लिए लोगों के प्रति जवाबदेह होती हैं।
उदाहरण:
- बेल्जियम: ने एकात्मक से संघीय व्यवस्था में परिवर्तन किया, क्षेत्रीय सरकारों को संवैधानिक शक्तियाँ दीं (1993 में)।
- श्रीलंका: एकात्मक व्यवस्था का पालन करता है, जहाँ राष्ट्रीय सरकार के पास सभी शक्तियाँ हैं, जिससे तमिलों और सिंहलियों के बीच संघर्ष हुआ।
संघवाद के लिए महत्वपूर्ण पहलू:
- शक्ति-साझाकरण के नियमों पर सहमति: विभिन्न स्तरों पर सरकारों को शक्ति-साझाकरण के कुछ नियमों पर सहमत होना चाहिए।
- आपसी विश्वास: उन्हें यह भी विश्वास होना चाहिए कि प्रत्येक पक्ष समझौते के अपने हिस्से का पालन करेगा।
- एक आदर्श संघीय व्यवस्था में ये दोनों पहलू होते हैं: आपसी विश्वास और एक साथ रहने का समझौता।
संघवाद (Federalism): एक ऐसी शासन प्रणाली जिसमें शक्ति को केंद्रीय प्राधिकरण और देश की विभिन्न घटक इकाइयों के बीच विभाजित किया जाता है।
दुनिया के 193 देशों में से केवल 25 देशों में संघीय राजनीतिक व्यवस्था है, लेकिन उनके नागरिक दुनिया की 40% आबादी बनाते हैं। दुनिया के अधिकांश बड़े देश संघीय हैं।
संघवाद की प्रमुख विशेषताएँ
संघीय व्यवस्था की पहचान करने वाली सात प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- सरकार के दो या अधिक स्तर: संघीय व्यवस्था में सरकार के दो या अधिक स्तर (या सोपान) होते हैं।
- समान नागरिक, भिन्न क्षेत्राधिकार: सरकार के विभिन्न स्तर एक ही नागरिक समूह पर शासन करते हैं, लेकिन प्रत्येक स्तर का कानून बनाने, कराधान और प्रशासन के विशिष्ट मामलों में अपना अलग क्षेत्राधिकार होता है।
- संवैधानिक रूप से गारंटीकृत क्षेत्राधिकार: सरकार के संबंधित स्तरों या सोपानों के क्षेत्राधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होते हैं। इस प्रकार, सरकार के प्रत्येक स्तर का अस्तित्व और अधिकार संवैधानिक रूप से गारंटीकृत होता है।
- संविधान के मौलिक प्रावधानों में परिवर्तन: संविधान के मौलिक प्रावधानों को सरकार का कोई एक स्तर एकतरफा नहीं बदल सकता। ऐसे परिवर्तनों के लिए सरकार के दोनों स्तरों की सहमति आवश्यक होती है।
- न्यायालयों की भूमिका: न्यायालयों के पास संविधान और सरकार के विभिन्न स्तरों की शक्तियों की व्याख्या करने की शक्ति होती है। यदि शक्तियों के प्रयोग में सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच विवाद उत्पन्न होता है, तो उच्चतम न्यायालय एक अंपायर के रूप में कार्य करता है।
- राजस्व के स्रोत: सरकार के प्रत्येक स्तर के लिए राजस्व के स्रोत स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होते हैं ताकि उसकी वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित हो सके।
- दोहरे उद्देश्य: संघीय व्यवस्था के दोहरे उद्देश्य होते हैं: देश की एकता को सुरक्षित रखना और बढ़ावा देना, साथ ही क्षेत्रीय विविधता को समायोजित करना।
- क्षेत्राधिकार (Jurisdiction): वह क्षेत्र जिस पर किसी को कानूनी अधिकार प्राप्त होता है। यह क्षेत्र भौगोलिक सीमाओं या कुछ प्रकार के विषयों के संदर्भ में परिभाषित किया जा सकता है।
संघवाद की 7 विशेषताओं को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अक्सर बोर्ड परीक्षाओं में 5 अंकों का प्रश्न होता है। प्रत्येक विशेषता को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से समझाएँ।
संघीय शासन व्यवस्था के प्रकार: 'एक साथ आकर' और 'साथ मिलकर रहने' वाले संघ
संघीय व्यवस्थाओं के गठन के दो मुख्य मार्ग हैं:
1. 'एक साथ आकर' संघ (Coming Together Federations)
- परिभाषा: इस मार्ग में स्वतंत्र राज्य अपनी इच्छा से एक बड़ी इकाई बनाने के लिए एक साथ आते हैं।
- उद्देश्य: संप्रभुता को एक साथ मिलाकर और अपनी पहचान बनाए रखकर, वे अपनी सुरक्षा बढ़ा सकते हैं।
- विशेषताएँ:
- सभी घटक इकाइयों के पास आमतौर पर समान शक्ति होती है।
- केंद्र सरकार की तुलना में घटक इकाइयाँ अधिक शक्तिशाली होती हैं।
- उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया।
2. 'साथ मिलकर रहने' वाले संघ (Holding Together Federations)
- परिभाषा: इस मार्ग में एक बड़ा देश अपनी शक्ति को घटक राज्यों और राष्ट्रीय सरकार के बीच विभाजित करने का निर्णय लेता है।
- उद्देश्य: आंतरिक विविधता को समायोजित करना और क्षेत्रीय स्वायत्तता प्रदान करना।
- विशेषताएँ:
- केंद्र सरकार की तुलना में घटक इकाइयों के पास अक्सर असमान शक्तियाँ होती हैं।
- केंद्र सरकार अधिक शक्तिशाली होती है।
- कुछ इकाइयों को विशेष दर्जा दिया जा सकता है।
- उदाहरण: भारत, स्पेन, बेल्जियम।
तुलनात्मक तालिका:
भारत 'साथ मिलकर रहने' वाले संघ का एक उदाहरण है, जहाँ केंद्र सरकार राज्यों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है और कुछ राज्यों को विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं।
भारत में संघवाद
भारत का संविधान भारत को 'राज्यों का संघ' घोषित करता है। हालाँकि इसमें 'संघीय' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, भारतीय संघ संघवाद के सिद्धांतों पर आधारित है।
भारत में संघीय व्यवस्था के स्तर:
- मूल रूप से: संविधान ने सरकार की दो-स्तरीय प्रणाली प्रदान की थी: संघ सरकार (केंद्र सरकार) और राज्य सरकारें।
- बाद में: संघवाद का तीसरा स्तर पंचायतों और नगरपालिकाओं के रूप में जोड़ा गया।
केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों का त्रि-स्तरीय वितरण:
संविधान स्पष्ट रूप से संघ सरकार और राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों का तीन-स्तरीय वितरण प्रदान करता है। इसमें तीन सूचियाँ शामिल हैं:
- संघ सूची (Union List):
- विषय: राष्ट्रीय महत्व के विषय, जैसे देश की रक्षा, विदेश मामले, बैंकिंग, संचार और मुद्रा।
- कानून बनाने का अधिकार: केवल संघ सरकार इन विषयों पर कानून बना सकती है।
- राज्य सूची (State List):
- विषय: राज्य और स्थानीय महत्व के विषय, जैसे पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि और सिंचाई।
- कानून बनाने का अधिकार: केवल राज्य सरकारें इन विषयों पर कानून बना सकती हैं।
- समवर्ती सूची (Concurrent List):
- विषय: संघ सरकार और राज्य सरकारों दोनों के लिए समान रुचि के विषय, जैसे शिक्षा, वन, ट्रेड यूनियन, विवाह, गोद लेना और उत्तराधिकार।
- कानून बनाने का अधिकार: संघ और राज्य सरकारें दोनों इन विषयों पर कानून बना सकती हैं।
- टकराव की स्थिति: यदि उनके कानूनों में टकराव होता है, तो संघ सरकार द्वारा बनाया गया कानून मान्य होगा।
- अवशिष्ट विषय (Residuary Subjects): वे विषय जो इन तीनों सूचियों में से किसी में भी नहीं आते हैं (जैसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर), उन पर कानून बनाने का अधिकार संघ सरकार के पास है।
विशेष दर्जा और केंद्र शासित प्रदेश:
- कुछ राज्यों को विशेष शक्तियाँ: भारतीय संघ के सभी राज्यों के पास समान शक्तियाँ नहीं हैं। असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम जैसे कुछ राज्य भारतीय संविधान के कुछ प्रावधानों (अनुच्छेद 371) के तहत विशेष शक्तियों का आनंद लेते हैं।
- केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories): भारतीय संघ में कुछ ऐसी इकाइयाँ हैं जिनके पास बहुत कम शक्तियाँ हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं जो एक स्वतंत्र राज्य बनने के लिए बहुत छोटे हैं लेकिन जिन्हें किसी भी मौजूदा राज्य में विलय नहीं किया जा सकता है।
- उदाहरण: चंडीगढ़, लक्षद्वीप, दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)।
- इन क्षेत्रों के पास राज्य की शक्तियाँ नहीं होती हैं।
- केंद्रीय सरकार के पास इन क्षेत्रों के प्रशासन में विशेष शक्तियाँ होती हैं।
शक्ति-साझाकरण व्यवस्था में परिवर्तन:
- भारत की संसद अपनी मर्जी से शक्ति-साझाकरण व्यवस्था को नहीं बदल सकती।
- इसमें किसी भी बदलाव को पहले संसद के दोनों सदनों द्वारा कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित किया जाना चाहिए।
- फिर इसे कुल राज्यों के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।
न्यायपालिका की भूमिका:
- न्यायपालिका संवैधानिक प्रावधानों और प्रक्रियाओं के कार्यान्वयन की देखरेख में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- शक्तियों के विभाजन के बारे में किसी भी विवाद की स्थिति में, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय निर्णय लेते हैं।
संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों के विषयों के उदाहरण याद रखें। यह अक्सर बहुविकल्पीय प्रश्नों या 3-अंकों के प्रश्नों में पूछा जाता है।
अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधान वाले राज्यों को याद रखें: असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम।
भारत में संघवाद का अभ्यास
भारत में संघवाद की वास्तविक सफलता का श्रेय हमारे देश की लोकतांत्रिक राजनीति की प्रकृति को दिया जा सकता है। इसने सुनिश्चित किया कि संघवाद की भावना, विविधता के प्रति सम्मान और एक साथ रहने की इच्छा हमारे देश में साझा आदर्श बन गए।
1. भाषाई राज्य (Linguistic States):
- गठन: 1947 में, भारत के कई पुराने राज्यों की सीमाओं को नए राज्य बनाने के लिए बदल दिया गया था। यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि जो लोग एक ही भाषा बोलते थे, वे एक ही राज्य में रहें।
- कुछ राज्य: नागालैंड, उत्तराखंड और झारखंड जैसे कुछ राज्य भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि संस्कृति, जातीयता या भूगोल पर आधारित मतभेदों को पहचानने के लिए बनाए गए थे।
- प्रभाव: भाषाई राज्यों के गठन ने वास्तव में देश को अधिक एकजुट बनाया है और प्रशासन को भी आसान बना दिया है।
2. भाषा नीति (Language Policy):
- राष्ट्रीय भाषा का अभाव: हमारे संविधान ने किसी एक भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया।
- राजभाषा: हिंदी को राजभाषा के रूप में पहचाना गया था। लेकिन हिंदी केवल लगभग 40% भारतीयों की मातृभाषा है।
- अनुसूचित भाषाएँ: हिंदी के अलावा, संविधान द्वारा 21 अन्य भाषाओं को अनुसूचित भाषाओं के रूप में मान्यता दी गई है।
- अंग्रेजी का उपयोग: संविधान के अनुसार, आधिकारिक उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी का उपयोग 1965 में बंद होना था। हालाँकि, कई गैर-हिंदी भाषी राज्यों ने अंग्रेजी के उपयोग को जारी रखने की मांग की। तमिलनाडु में, इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया।
- विविधता: जनगणना में 1300 से अधिक विशिष्ट भाषाओं को दर्ज किया गया जिन्हें लोगों ने अपनी मातृभाषा बताया। भोजपुरी, मगही, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी और कई अन्य भाषाओं को 'हिंदी' के तहत समूहीकृत किया गया था।
3. केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations):
- पुनर्गठन: केंद्र-राज्य संबंधों का पुनर्गठन एक और तरीका है जिससे व्यवहार में संघवाद को मजबूत किया गया है।
- एक ही पार्टी का शासन: लंबे समय तक, केंद्र और अधिकांश राज्यों दोनों में एक ही पार्टी का शासन रहा। जब राज्य स्तर पर सत्तारूढ़ दल अलग होता था, तो केंद्र में शासन करने वाले दल राज्यों की शक्ति को कमजोर करने की कोशिश करते थे।
- गठबंधन सरकारें (Coalition Governments): 1990 के बाद यह सब महत्वपूर्ण रूप से बदल गया। इस अवधि में देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का उदय हुआ।
- परिभाषा: कम से कम दो राजनीतिक दलों के एक साथ आने से बनी सरकार।
- प्रभाव: केंद्र में गठबंधन सरकारों के युग की शुरुआत हुई। इससे केंद्र सरकार के लिए राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त करना मुश्किल हो गया। इसने शक्ति-साझाकरण और संघवाद की भावना का सम्मान करने में योगदान दिया।
अनुसूचित भाषाएँ (2011 की जनगणना के अनुसार):
छात्र अक्सर हिंदी को भारत की 'राष्ट्रीय भाषा' मान लेते हैं। याद रखें, संविधान ने किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया है; हिंदी केवल 'राजभाषा' है।
भारत में विकेंद्रीकरण
जब केंद्रीय और राज्य सरकारों से शक्ति लेकर स्थानीय सरकार को दी जाती है, तो इसे विकेंद्रीकरण कहा जाता है।
- आवश्यकता: भारत जैसे विशाल देश में, केवल दो स्तरों की सरकारें (केंद्र और राज्य) पर्याप्त नहीं थीं। राज्यों का आकार भी बहुत बड़ा था, और कई राज्यों की आबादी दुनिया के कई स्वतंत्र देशों से भी अधिक थी। इसलिए, शक्ति को स्थानीय स्तर तक साझा करने की आवश्यकता महसूस की गई।
1992 का विकेंद्रीकरण का एक बड़ा कदम:
1992 में संविधान में संशोधन करके लोकतंत्र के तीसरे स्तर को अधिक शक्तिशाली और प्रभावी बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया। प्रमुख परिवर्तन इस प्रकार थे:
- नियमित चुनाव: स्थानीय सरकारी निकायों के लिए नियमित चुनाव कराना संवैधानिक रूप से अनिवार्य कर दिया गया।
- सीटों का आरक्षण: अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और अन्य पिछड़ा वर्गों (OBCs) के लिए निर्वाचित निकायों और इन संस्थानों के कार्यकारी प्रमुखों में सीटें आरक्षित की गईं।
- महिलाओं के लिए आरक्षण: सभी पदों में से कम से कम एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए।
- राज्य चुनाव आयोग: पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराने के लिए प्रत्येक राज्य में राज्य चुनाव आयोग नामक एक स्वतंत्र संस्था का गठन किया गया।
- शक्ति और राजस्व का साझाकरण: राज्य सरकारों को स्थानीय सरकारी निकायों के साथ कुछ शक्तियों और राजस्व को साझा करना अनिवार्य कर दिया गया।
स्थानीय स्वशासन के प्रकार:
- ग्रामीण स्थानीय सरकार (पंचायती राज):
- ग्राम पंचायत: प्रत्येक गाँव या गाँवों के समूह में एक ग्राम पंचायत होती है, जिसमें कई वार्ड सदस्य (पंच) और एक अध्यक्ष (सरपंच) होते हैं। सदस्य सीधे गाँव के सभी वयस्क निवासियों द्वारा चुने जाते हैं।
- ग्राम सभा: ग्राम पंचायत का निर्णय लेने वाला निकाय है, जिसमें गाँव के सभी मतदाता सदस्य होते हैं। इसे साल में कम से कम दो या तीन बार मिलना चाहिए ताकि ग्राम पंचायत के बजट को मंजूरी मिल सके और उसके प्रदर्शन की समीक्षा की जा सके।
- पंचायत समिति/ब्लॉक/मंडल: कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक पंचायत समिति या ब्लॉक या मंडल बनता है। इसके सदस्यों का चुनाव पंचायत के सदस्य करते हैं।
- जिला परिषद: एक जिले की सभी पंचायत समितियों को मिलाकर जिला परिषद बनती है। इसके अधिकांश सदस्य निर्वाचित होते हैं। जिला परिषद का राजनीतिक प्रमुख अध्यक्ष होता है।
- शहरी स्थानीय सरकार:
- नगरपालिकाएँ: छोटे शहरों के लिए नगरपालिकाएँ होती हैं।
- नगर निगम: बड़े शहरों के लिए नगर निगम होते हैं।
- निर्वाचन: नगरपालिका और नगर निगम दोनों का चुनाव लोगों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है।
- प्रमुख: नगरपालिका के प्रमुख को नगरपालिका अध्यक्ष कहा जाता है। नगर निगम के प्रमुख को महापौर (Mayor) कहा जाता है।
विकेंद्रीकरण के लाभ:
- स्थानीय मुद्दों को स्थानीय स्तर पर हल करना आसान हो जाता है।
- लोगों की सीधी भागीदारी संभव होती है।
- लोकतांत्रिक भागीदारी की आदत विकसित होती है।
- स्थानीय स्तर पर सुशासन को बढ़ावा मिलता है।
1992 के संवैधानिक संशोधन ने भारत में स्थानीय स्वशासन को एक मजबूत आधार प्रदान किया, जिससे दुनिया में स्थानीय स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की सबसे बड़ी संख्या (लगभग 36 लाख) बनी।
1992 के विकेंद्रीकरण के प्रमुख प्रावधानों को याद रखें, क्योंकि यह अक्सर एक महत्वपूर्ण प्रश्न होता है।