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AP · Class 10 · 📘 Physical_Science · Chapter 9

Light: Reflection & Refraction

కాంతి పరావర్తనం నియమాలుగోళాకార దర్పణాల రకాలుపుటాకార దర్పణం ద్వారా ప్రతిబింబం ఏర్పడటంకుంభాకార దర్పణం ద్వారా ప్రతిబింబం ఏర్పడటందర్పణ సూత్రం మరియు ఆవర్ధనంకాంతి వక్రీభవనం నియమాలు

ఈ అధ్యాయం కాంతి యొక్క ప్రాథమిక లక్షణాలను, ముఖ్యంగా పరావర్తనం మరియు వక్రీభవనం అనే దృగ్విషయాలను వివరిస్తుంది. సమతల దర్పణాలు, గోళాకార దర్పణాలు (పుటాకార మరియు కుంభాకార), మరియు గోళాకార కటకాలు (కుంభాకార మరియు పుటాకార) ద్వారా ప్రతిబింబాలు ఎలా ఏర్పడతాయో విద్యార్థులు నేర్చుకుంటారు. దర్పణ సూత్రం, కటక సూత్రం, ఆవర్ధనం మరియు కటకాల శక్తి వంటి ముఖ్యమైన భావనలు వివరించబడ్డాయి. ఇది రోజువారీ జీవితంలో కాంతి అనువర్తనాలను అర్థం చేసుకోవడానికి పునాదిని అందిస్తుంది.

प्रकाश का परावर्तन: नियम और समतल दर्पण

प्रकाश का परावर्तन वह परिघटना है जिसमें प्रकाश किरणें किसी सतह से टकराकर उसी माध्यम में वापस लौट आती हैं।

परावर्तन के नियम

  • पहला नियम: आपतन कोण (\(i\)) हमेशा परावर्तन कोण (\(r\)) के बराबर होता है। अर्थात्, \(i = r\).
  • दूसरा नियम: आपतित किरण, परावर्तित किरण और आपतन बिंदु पर अभिलंब (normal) तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं।

समतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब निर्माण

समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की विशेषताएँ:

  • आभासी (Virtual) और सीधा (Erect): प्रतिबिंब को पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  • पार्श्व परिवर्तित (Laterally Inverted): वस्तु का दायाँ भाग प्रतिबिंब में बायाँ और बायाँ भाग दायाँ दिखाई देता है।
  • समान आकार (Same Size): प्रतिबिंब का आकार वस्तु के आकार के बराबर होता है।
  • समान दूरी (Equidistant): प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने होती है।

अनुप्रयोग

  • दैनिक जीवन में उपयोग (जैसे ड्रेसिंग टेबल में)।
  • पेरिस्कोप और कैलाइडोस्कोप में।
ముఖ్యమైనది

प्रकाश की गति में परिवर्तन के कारण परावर्तन नहीं होता, बल्कि दिशा में परिवर्तन होता है।

गोलीय दर्पण: अवतल और उत्तल दर्पण

गोलीय दर्पण वे दर्पण होते हैं जिनकी परावर्तक सतह किसी खोखले गोले का एक भाग होती है। ये दो प्रकार के होते हैं:

अवतल दर्पण (Concave Mirror)

  • जिसका परावर्तक पृष्ठ अंदर की ओर (गोले के केंद्र की ओर) वक्रित होता है।
  • यह प्रकाश किरणों को अभिसारित (converge) करता है, इसलिए इसे अभिसारी दर्पण (Converging Mirror) भी कहते हैं।

उत्तल दर्पण (Convex Mirror)

  • जिसका परावर्तक पृष्ठ बाहर की ओर वक्रित होता है।
  • यह प्रकाश किरणों को अपसारित (diverge) करता है, इसलिए इसे अपसारी दर्पण (Diverging Mirror) भी कहते हैं।

गोलीय दर्पणों से संबंधित महत्वपूर्ण पद

  • ध्रुव (Pole, P): दर्पण के परावर्तक पृष्ठ का केंद्र बिंदु।
  • वक्रता केंद्र (Centre of Curvature, C): उस खोखले गोले का केंद्र जिसका दर्पण एक भाग है।
  • अवतल दर्पण के लिए C दर्पण के सामने होता है।
  • उत्तल दर्पण के लिए C दर्पण के पीछे होता है।
  • वक्रता त्रिज्या (Radius of Curvature, R): ध्रुव और वक्रता केंद्र के बीच की दूरी। \(R = 2f\).
  • मुख्य अक्ष (Principal Axis): ध्रुव और वक्रता केंद्र से होकर गुजरने वाली सीधी काल्पनिक रेखा।
  • मुख्य फोकस (Principal Focus, F): मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली प्रकाश किरणें परावर्तन के बाद मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु पर मिलती हैं (अवतल दर्पण) या मिलती हुई प्रतीत होती हैं (उत्तल दर्पण), वह बिंदु मुख्य फोकस कहलाता है।
  • अवतल दर्पण का फोकस वास्तविक होता है और दर्पण के सामने होता है।
  • उत्तल दर्पण का फोकस आभासी होता है और दर्पण के पीछे होता है।
  • फोकस दूरी (Focal Length, f): ध्रुव और मुख्य फोकस के बीच की दूरी।
  • द्वारक (Aperture): दर्पण के परावर्तक पृष्ठ का प्रभावी व्यास।
📖నిర్వచనం

अभिसारी (Converging): प्रकाश किरणों को एक बिंदु पर केंद्रित करना। अपसारी (Diverging): प्रकाश किरणों को एक बिंदु से फैलाना।

🧮సూత్రం

\(R = 2f\) या \(f = R/2\) वक्रता त्रिज्या फोकस दूरी की दोगुनी होती है।

गोलीय दर्पणों द्वारा प्रतिबिंब निर्माण (किरण आरेख)

प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार निर्धारित करने के लिए किरण आरेखों का उपयोग किया जाता है। कम से कम दो परावर्तित किरणों के प्रतिच्छेदन बिंदु से प्रतिबिंब बनता है।

किरण आरेख बनाने के नियम

  1. मुख्य अक्ष के समानांतर किरण: मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली किरण अवतल दर्पण से परावर्तन के बाद फोकस (F) से होकर गुजरती है, और उत्तल दर्पण में फोकस से अपसरित होती हुई प्रतीत होती है।
  2. फोकस से होकर गुजरने वाली किरण: फोकस से होकर गुजरने वाली किरण (अवतल दर्पण) या फोकस की ओर निर्देशित किरण (उत्तल दर्पण) परावर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
  3. वक्रता केंद्र से होकर गुजरने वाली किरण: वक्रता केंद्र (C) से होकर गुजरने वाली किरण (अवतल दर्पण) या वक्रता केंद्र की ओर निर्देशित किरण (उत्तल दर्पण) परावर्तन के बाद उसी पथ पर वापस लौट जाती है।
  4. ध्रुव पर आपतित किरण: ध्रुव (P) पर मुख्य अक्ष के साथ एक कोण पर आपतित किरण, मुख्य अक्ष के साथ समान कोण बनाते हुए परावर्तित होती है।

अवतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब निर्माण (विभिन्न स्थितियों के लिए)

| वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---| | अनंत पर | F पर | अत्यधिक छोटा (बिंदु आकार) | वास्तविक, उल्टा | | C से परे | F और C के बीच | छोटा | वास्तविक, उल्टा | | C पर | C पर | समान आकार | वास्तविक, उल्टा | | C और F के बीच | C से परे | बड़ा | वास्तविक, उल्टा | | F पर | अनंत पर | अत्यधिक बड़ा | वास्तविक, उल्टा | | P और F के बीच | दर्पण के पीछे | बड़ा | आभासी, सीधा |

उत्तल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब निर्माण (विभिन्न स्थितियों के लिए)

| वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---| | अनंत पर | F पर (दर्पण के पीछे) | अत्यधिक छोटा (बिंदु आकार) | आभासी, सीधा | | अनंत और P के बीच | P और F के बीच (दर्पण के पीछे) | छोटा | आभासी, सीधा |

अवतल दर्पण के उपयोग

  • टॉर्च, सर्चलाइट और वाहनों की हेडलाइट में प्रकाश की शक्तिशाली समानांतर किरण पुंज प्राप्त करने के लिए।
  • दाढ़ी बनाने वाले दर्पणों में (बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए)।
  • दंत चिकित्सकों द्वारा दांतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए।
  • सौर भट्टियों में सूर्य के प्रकाश को केंद्रित करने के लिए।

उत्तल दर्पण के उपयोग

  • वाहनों में पश्च-दृश्य दर्पण (rear-view mirrors) के रूप में, क्योंकि ये हमेशा सीधा और छोटा प्रतिबिंब बनाते हैं तथा इनका दृष्टि क्षेत्र (field of view) बड़ा होता है।
  • दुकानों में सुरक्षा दर्पणों के रूप में।
💡సూచన

किरण आरेख बनाते समय स्केल और पेंसिल का उपयोग करें। तीरों की दिशा सही होनी चाहिए। कम से कम दो किरणों का उपयोग करें।

గుర్తుంచుకోండి

अवतल दर्पण वास्तविक और आभासी दोनों प्रकार के प्रतिबिंब बना सकता है, जबकि उत्तल दर्पण हमेशा आभासी प्रतिबिंब बनाता है।

गोलीय दर्पणों के लिए चिन्ह परिपाटी, दर्पण सूत्र और आवर्धन

संख्यात्मक प्रश्नों को हल करने के लिए नई कार्तीय चिन्ह परिपाटी (New Cartesian Sign Convention) का पालन करना महत्वपूर्ण है।

नई कार्तीय चिन्ह परिपाटी

  1. ध्रुव को मूल बिंदु मानें: दर्पण के ध्रुव (P) को मूल बिंदु (0,0) मानें।
  2. मुख्य अक्ष को X-अक्ष मानें: मुख्य अक्ष को X-अक्ष मानें।
  3. आपतित प्रकाश की दिशा: आपतित प्रकाश की दिशा में मापी गई सभी दूरियाँ धनात्मक ली जाती हैं।
  4. आपतित प्रकाश के विपरीत दिशा: आपतित प्रकाश के विपरीत दिशा में मापी गई सभी दूरियाँ ऋणात्मक ली जाती हैं।
  5. मुख्य अक्ष के ऊपर: मुख्य अक्ष के लंबवत और ऊपर की ओर मापी गई ऊँचाइयाँ धनात्मक ली जाती हैं।
  6. मुख्य अक्ष के नीचे: मुख्य अक्ष के लंबवत और नीचे की ओर मापी गई ऊँचाइयाँ ऋणात्मक ली जाती हैं।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • वस्तु की दूरी (u): हमेशा ऋणात्मक (क्योंकि वस्तु हमेशा दर्पण के बाईं ओर रखी जाती है)।
  • अवतल दर्पण की फोकस दूरी (f): ऋणात्मक।
  • उत्तल दर्पण की फोकस दूरी (f): धनात्मक।
  • वास्तविक प्रतिबिंब की दूरी (v): ऋणात्मक।
  • आभासी प्रतिबिंब की दूरी (v): धनात्मक।

दर्पण सूत्र (Mirror Formula)

यह वस्तु की दूरी (u), प्रतिबिंब की दूरी (v) और फोकस दूरी (f) के बीच संबंध बताता है।

\(\frac{1}{v} + \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\)

यह सूत्र सभी गोलीय दर्पणों और सभी वस्तु स्थितियों के लिए मान्य है।

आवर्धन (Magnification, m)

आवर्धन यह बताता है कि प्रतिबिंब वस्तु की तुलना में कितना बड़ा या छोटा है। इसे प्रतिबिंब की ऊँचाई (\(h'\)) और वस्तु की ऊँचाई (\(h\)) के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है।

\(m = \frac{\text{प्रतिबिंब की ऊँचाई (h')}}{\text{वस्तु की ऊँचाई (h)}} = -\frac{\text{प्रतिबिंब की दूरी (v)}}{\text{वस्तु की दूरी (u)}}\)

आवर्धन के चिन्ह का महत्व

  • m > 0 (धनात्मक): प्रतिबिंब आभासी और सीधा।
  • m < 0 (ऋणात्मक): प्रतिबिंब वास्तविक और उल्टा।
  • |m| > 1: प्रतिबिंब आवर्धित (बड़ा)।
  • |m| < 1: प्रतिबिंब छोटा।
  • |m| = 1: प्रतिबिंब समान आकार का।
🧮సూత్రం

दर्पण सूत्र: \(\frac{1}{v} + \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\) आवर्धन सूत्र: \(m = \frac{h'}{h} = -\frac{v}{u}\)

🚧తప్పుడు అభిప్రాయం

चिन्ह परिपाटी का सही ढंग से उपयोग न करना संख्यात्मक प्रश्नों में सबसे आम गलती है। प्रत्येक मान (u, v, f, h, h') के लिए सही चिन्ह लगाना सुनिश्चित करें।

प्रकाश का अपवर्तन: नियम और अपवर्तनांक

प्रकाश का अपवर्तन वह परिघटना है जिसमें प्रकाश किरण एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में प्रवेश करने पर अपनी दिशा बदल लेती है (मुड़ जाती है)। यह प्रकाश की गति में परिवर्तन के कारण होता है।

अपवर्तन के नियम

  1. पहला नियम: आपतित किरण, अपवर्तित किरण और दो माध्यमों को पृथक करने वाले पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभिलंब तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं।
  2. स्नेल का नियम (Snell's Law): प्रकाश के किसी दिए गए रंग तथा माध्यमों के किसी दिए गए युग्म के लिए, आपतन कोण की ज्या (sine) और अपवर्तन कोण की ज्या का अनुपात स्थिर होता है।

\(\frac{\sin i}{\sin r} = \text{स्थिरांक (constant)}\) इस स्थिरांक को पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक (refractive index) कहते हैं।

अपवर्तनांक (Refractive Index, n)

यह दो माध्यमों में प्रकाश की गति के अनुपात को दर्शाता है।

  • निरपेक्ष अपवर्तनांक (Absolute Refractive Index): यदि पहला माध्यम निर्वात या वायु हो, तो दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक उसका निरपेक्ष अपवर्तनांक कहलाता है।

\(n_m = \frac{\text{निर्वात में प्रकाश की चाल (c)}}{\text{माध्यम में प्रकाश की चाल (v)}}\)

  • निर्वात में प्रकाश की चाल \(c = 3 \times 10^8 \text{ m/s}\).
  • सापेक्ष अपवर्तनांक (Relative Refractive Index): पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक।

\(n_{21} = \frac{\text{माध्यम 1 में प्रकाश की चाल (v_1)}}{\text{माध्यम 2 में प्रकाश की चाल (v_2)}}\)

  • \(n_{21}\) को \(n_2/n_1\) के रूप में भी लिखा जा सकता है।

अपवर्तनांक और प्रकाश का मुड़ना

  • विरल से सघन माध्यम: जब प्रकाश विरल माध्यम (जैसे वायु) से सघन माध्यम (जैसे काँच) में प्रवेश करता है, तो यह अभिलंब की ओर मुड़ता है। (\(v_1 > v_2\), \(i > r\))
  • सघन से विरल माध्यम: जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करता है, तो यह अभिलंब से दूर मुड़ता है। (\(v_1 < v_2\), \(i < r\))
  • सामान्य आपतन: यदि प्रकाश किरण अभिलंब के अनुदिश (यानी \(i = 0^\circ\)) आपतित होती है, तो वह बिना मुड़े सीधी निकल जाती है।

अपवर्तन के अनुप्रयोग

  • पानी में डूबी पेंसिल का मुड़ा हुआ दिखना।
  • पानी से भरे बर्तन का तल ऊपर उठा हुआ दिखना।
  • सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद सूर्य का दिखाई देना।
  • तारों का टिमटिमाना।
🧮సూత్రం

स्नेल का नियम: \(n = \frac{\sin i}{\sin r}\) निरपेक्ष अपवर्तनांक: \(n_m = \frac{c}{v}\)

ముఖ్యమైనది

अपवर्तनांक की कोई इकाई नहीं होती क्योंकि यह समान राशियों का अनुपात है।

आयताकार काँच के स्लैब से अपवर्तन

जब प्रकाश किरण एक आयताकार काँच के स्लैब से होकर गुजरती है, तो यह दो बार अपवर्तन से गुजरती है: एक बार वायु-काँच इंटरफ़ेस पर और दूसरी बार काँच-वायु इंटरफ़ेस पर।

प्रक्रिया

  1. वायु से काँच में: प्रकाश किरण विरल माध्यम (वायु) से सघन माध्यम (काँच) में प्रवेश करती है, इसलिए यह अभिलंब की ओर मुड़ती है।
  2. काँच से वायु में: प्रकाश किरण सघन माध्यम (काँच) से विरल माध्यम (वायु) में प्रवेश करती है, इसलिए यह अभिलंब से दूर मुड़ती है।

परिणाम

  • निर्गत किरण (Emergent Ray): काँच के स्लैब से बाहर निकलने वाली किरण को निर्गत किरण कहते हैं।
  • समानांतर विस्थापन (Lateral Displacement): निर्गत किरण आपतित किरण के समानांतर होती है, लेकिन मूल पथ से थोड़ी विस्थापित (shifted) होती है। इस विस्थापन को पार्श्व विस्थापन कहते हैं।
  • कोणों का संबंध: आपतन कोण (वायु-काँच इंटरफ़ेस पर) निर्गत कोण (काँच-वायु इंटरफ़ेस पर) के बराबर होता है।
ముఖ్యమైనది

पार्श्व विस्थापन काँच के स्लैब की मोटाई और आपतन कोण पर निर्भर करता है।

गोलीय लेंस: उत्तल और अवतल लेंस

लेंस एक पारदर्शी सामग्री है जो दो सतहों से घिरा होता है, जिनमें से एक या दोनों सतहें गोलीय होती हैं।

उत्तल लेंस (Convex Lens)

  • बीच में मोटा और किनारों पर पतला होता है।
  • प्रकाश किरणों को अभिसारित (converge) करता है, इसलिए इसे अभिसारी लेंस (Converging Lens) भी कहते हैं।
  • यह वास्तविक और आभासी दोनों प्रकार के प्रतिबिंब बना सकता है।

अवतल लेंस (Concave Lens)

  • बीच में पतला और किनारों पर मोटा होता है।
  • प्रकाश किरणों को अपसारित (diverge) करता है, इसलिए इसे अपसारी लेंस (Diverging Lens) भी कहते हैं।
  • यह हमेशा आभासी, सीधा और छोटा प्रतिबिंब बनाता है।

गोलीय लेंसों से संबंधित महत्वपूर्ण पद

  • प्रकाशिक केंद्र (Optical Centre, O): लेंस का केंद्रीय बिंदु। इससे होकर गुजरने वाली प्रकाश किरण बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती है।
  • वक्रता केंद्र (Centre of Curvature, C1, C2): लेंस की प्रत्येक गोलीय सतह एक गोले का हिस्सा होती है, और इन गोलों के केंद्र वक्रता केंद्र कहलाते हैं। एक लेंस के दो वक्रता केंद्र होते हैं।
  • मुख्य अक्ष (Principal Axis): दोनों वक्रता केंद्रों से होकर गुजरने वाली काल्पनिक सीधी रेखा।
  • मुख्य फोकस (Principal Focus, F1, F2): लेंस के भी दो मुख्य फोकस होते हैं।
  • उत्तल लेंस: मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली किरणें अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु पर मिलती हैं (F2)।
  • अवतल लेंस: मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली किरणें अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु से अपसरित होती हुई प्रतीत होती हैं (F1)।
  • फोकस दूरी (Focal Length, f): प्रकाशिक केंद्र और मुख्य फोकस के बीच की दूरी।
  • द्वारक (Aperture): लेंस के वृत्ताकार परिरेखा का प्रभावी व्यास।
📖నిర్వచనం

अभिसारी लेंस: उत्तल लेंस, जो प्रकाश को एक बिंदु पर केंद्रित करता है। अपसारी लेंस: अवतल लेंस, जो प्रकाश को फैलाता है।

गोलीय लेंसों द्वारा प्रतिबिंब निर्माण (किरण आरेख)

लेंसों द्वारा प्रतिबिंब निर्माण के लिए भी किरण आरेखों का उपयोग किया जाता है।

किरण आरेख बनाने के नियम

  1. मुख्य अक्ष के समानांतर किरण: मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली किरण उत्तल लेंस से अपवर्तन के बाद F2 से होकर गुजरती है, और अवतल लेंस में F1 से अपसरित होती हुई प्रतीत होती है।
  2. फोकस से होकर गुजरने वाली किरण: F1 से होकर गुजरने वाली किरण (उत्तल लेंस) या F2 की ओर निर्देशित किरण (अवतल लेंस) अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
  3. प्रकाशिक केंद्र से होकर गुजरने वाली किरण: प्रकाशिक केंद्र (O) से होकर गुजरने वाली किरण बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती है।

उत्तल लेंस द्वारा प्रतिबिंब निर्माण (विभिन्न स्थितियों के लिए)

| वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---| | अनंत पर | F2 पर | अत्यधिक छोटा (बिंदु आकार) | वास्तविक, उल्टा | | 2F1 से परे | F2 और 2F2 के बीच | छोटा | वास्तविक, उल्टा | | 2F1 पर | 2F2 पर | समान आकार | वास्तविक, उल्टा | | F1 और 2F1 के बीच | 2F2 से परे | बड़ा | वास्तविक, उल्टा | | F1 पर | अनंत पर | अत्यधिक बड़ा | वास्तविक, उल्टा | | F1 और O के बीच | वस्तु की ओर (लेंस के उसी तरफ) | बड़ा | आभासी, सीधा |

अवतल लेंस द्वारा प्रतिबिंब निर्माण (विभिन्न स्थितियों के लिए)

| वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---| | अनंत पर | F1 पर (लेंस के उसी तरफ) | अत्यधिक छोटा (बिंदु आकार) | आभासी, सीधा | | अनंत और O के बीच | F1 और O के बीच (लेंस के उसी तरफ) | छोटा | आभासी, सीधा |

उत्तल लेंस के उपयोग

  • आवर्धक लेंस (magnifying glass) के रूप में।
  • सूक्ष्मदर्शी, दूरबीन और कैमरे में।
  • दीर्घदृष्टि दोष (hypermetropia) के सुधार में।

अवतल लेंस के उपयोग

  • दूरबीन और गैलीलियन दूरबीन में।
  • निकटदृष्टि दोष (myopia) के सुधार में।
  • पीपहोल (peep-hole) में।
💡సూచన

लेंस के किरण आरेख बनाते समय, अपवर्तन को लेंस के प्रकाशिक केंद्र से गुजरने वाली काल्पनिक रेखा पर केंद्रित करें, न कि लेंस की सतहों पर।

गोलीय लेंसों के लिए चिन्ह परिपाटी, लेंस सूत्र, आवर्धन और लेंस की शक्ति

लेंसों के लिए भी दर्पणों के समान नई कार्तीय चिन्ह परिपाटी का उपयोग किया जाता है, लेकिन कुछ अंतरों के साथ।

नई कार्तीय चिन्ह परिपाटी (लेंसों के लिए)

  1. प्रकाशिक केंद्र को मूल बिंदु मानें: लेंस के प्रकाशिक केंद्र (O) को मूल बिंदु (0,0) मानें।
  2. मुख्य अक्ष को X-अक्ष मानें: मुख्य अक्ष को X-अक्ष मानें।
  3. आपतित प्रकाश की दिशा: आपतित प्रकाश की दिशा में मापी गई सभी दूरियाँ धनात्मक ली जाती हैं।
  4. आपतित प्रकाश के विपरीत दिशा: आपतित प्रकाश के विपरीत दिशा में मापी गई सभी दूरियाँ ऋणात्मक ली जाती हैं।
  5. मुख्य अक्ष के ऊपर: मुख्य अक्ष के लंबवत और ऊपर की ओर मापी गई ऊँचाइयाँ धनात्मक ली जाती हैं।
  6. मुख्य अक्ष के नीचे: मुख्य अक्ष के लंबवत और नीचे की ओर मापी गई ऊँचाइयाँ ऋणात्मक ली जाती हैं।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • वस्तु की दूरी (u): हमेशा ऋणात्मक।
  • उत्तल लेंस की फोकस दूरी (f): धनात्मक।
  • अवतल लेंस की फोकस दूरी (f): ऋणात्मक।
  • वास्तविक प्रतिबिंब की दूरी (v): धनात्मक (लेंस के दूसरी ओर)।
  • आभासी प्रतिबिंब की दूरी (v): ऋणात्मक (लेंस के उसी ओर)।

लेंस सूत्र (Lens Formula)

यह वस्तु की दूरी (u), प्रतिबिंब की दूरी (v) और फोकस दूरी (f) के बीच संबंध बताता है।

\(\frac{1}{v} - \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\)

दर्पण सूत्र से अंतर पर ध्यान दें (बीच में ऋणात्मक चिन्ह)।

आवर्धन (Magnification, m)

लेंस द्वारा उत्पन्न आवर्धन प्रतिबिंब की ऊँचाई (\(h'\)) और वस्तु की ऊँचाई (\(h\)) के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है।

\(m = \frac{\text{प्रतिबिंब की ऊँचाई (h')}}{\text{वस्तु की ऊँचाई (h)}} = \frac{\text{प्रतिबिंब की दूरी (v)}}{\text{वस्तु की दूरी (u)}}\)

दर्पण के आवर्धन सूत्र से अंतर पर ध्यान दें (ऋणात्मक चिन्ह नहीं)।

आवर्धन के चिन्ह का महत्व (लेंसों के लिए)

  • m > 0 (धनात्मक): प्रतिबिंब आभासी और सीधा।
  • m < 0 (ऋणात्मक): प्रतिबिंब वास्तविक और उल्टा।

लेंस की शक्ति (Power of a Lens, P)

लेंस की शक्ति उसकी प्रकाश किरणों को अभिसारित या अपसरित करने की क्षमता का माप है। इसे लेंस की फोकस दूरी (मीटर में) के व्युत्क्रम के रूप में परिभाषित किया जाता है।

\(P = \frac{1}{f}\) (जहाँ f मीटर में है)

  • इकाई: लेंस की शक्ति की SI इकाई डायोप्टर (Dioptre, D) है। 1 डायोप्टर उस लेंस की शक्ति है जिसकी फोकस दूरी 1 मीटर है।
  • उत्तल लेंस की शक्ति: धनात्मक (क्योंकि f धनात्मक है)।
  • अवतल लेंस की शक्ति: ऋणात्मक (क्योंकि f ऋणात्मक है)।

लेंसों के संयोजन की शक्ति

यदि कई लेंसों को एक साथ रखा जाता है, तो संयुक्त लेंस की कुल शक्ति व्यक्तिगत लेंसों की शक्तियों के बीजगणितीय योग के बराबर होती है।

\(P_{कुल} = P_1 + P_2 + P_3 + ...\)

🧮సూత్రం

लेंस सूत्र: \(\frac{1}{v} - \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\) आवर्धन सूत्र: \(m = \frac{h'}{h} = \frac{v}{u}\) लेंस की शक्ति: \(P = \frac{1}{f}\) (f मीटर में)

💡సూచన

दर्पण सूत्र और लेंस सूत्र के बीच के अंतर को याद रखें। आवर्धन सूत्रों में भी चिन्ह का अंतर होता है।

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